झोला छाप ख़बरी कांग्रेस और भाजपा कार्यलयों के बहार टर्र टर्र करते पत्रकारिता के देव .. …?
झोला छाप ख़बरी
कांग्रेस और भाजपा कार्यलयों के बहार टर्र टर्र करते पत्रकारिता के देव .. …?
वैसे तो राजनीति नाम ही ऐसा है जिसमे मान सम्मान अपमान , धन दौलत , पावर रौब सब है । इसके लिये हर आदमी की चाहत होती है ।
आज की राजनीति बदल गयी है किसी मे सेवा भाव नही बल्कि लूट का क्षेत्र बनता जा रहा है ।
राजनीति में सफल होना न होना ये तो जनता के ऊपर है , लेकिन राजनीतिक पत्रकारिता करने वाले पत्रकार चार निताओ के साथ चाय की चुस्की लेकर भगवान बन जाते है । वैसे इन्हें राजनेता बनने वाले हर कलाकार की ये सभी कला मालूम होती है ।
आपके पास धन हो
आपके बल हो
आपके पास झूठ बोलने की कला हो
आपको बेवकूफ बनाने के नए नए तरीके सीखना
अपने एरिया के सामाजिक कार्य मे भाग लेकर मठाधीस बनना
जो विरोध करे उसको बदनाम करो
लम्बी चौड़ी लम्पट लोगो की फौज बनाना
हर काम मे सबसे आगे रहना
अच्छा औऱ रोचक भाषण देना
जम कर वादा करो , पूरा हो या न हो
अपने नाम का खूब प्रचार करना ।
इस तरह एक सफल नेता बनने के सारे टिप्स इन पत्रकारों को मालूम होते है ।
कांग्रेस कार्यलय के बाहर बैठने वाला एक पत्रकार जो बुंदेलखंड के परिवेश से आता है । हालही में इसे 2 साल हुए होंगे पत्रकारिता में लेक़िन सहाब पत्रकारिता में राजनीति को ऐसे मिक्स करते है कि क्या कहने और अगर इनके बगल में कोई महिला पत्रकार हो तो ये इंद्र के दरबार के देवता हो जाते है ।
वैसे तो अगर राजनीतिक बीट की पत्रकारिता की बात की जाए तो
आजादी के पूर्व और उसके बाद के राजनीतिक परिवेशों में भारतीय पत्रकारिता ने अपनी पहचान और अस्मिता को किस रूप में स्थापित किया है, यह इस मूल विषय है। औपनिवेशिक काल की पत्रकारिता के गुणात्मक पहलुओं को उजागर करते हुए यह स्थापित करने का प्रयास किया जाता रहा कि भारतीय पत्रकारिता का उद्भव और विकास राष्ट्र की संप्रभुता, धर्म व संस्कृति तथा स्वतंत्रता की उत्कट भावनाओं से हुआ। स्वतंत्र भारत में (1947 से 2005 के कालखंड में) राजनीतिक और पत्रकारिता के अंतर्संबंधों का गहन विश्लेषण किया जाए तो । राजनीति और पत्रकारिता दोनों ही स्वतंत्र चेतनाओं की अलग-अलग अभिव्यक्ति होते हुए भी परस्पर निर्भर हैं। इस निर्भरता की प्रकृति, स्वरूप और सीमाओं में समय-समय पर परिवर्तन होता रहा है। राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, आर्थिक सुधारों जैसे प्रश्नों पर पत्रकारिता वैचारिक बहस का केवल उपकरण मात्र न होकर स्वयं भागीदार भी रही है। स्वतंत्र भारत के विभिन्न राजनीतिक कालखंडों में हुए संघर्षों, समन्वय, सहयोग और टकराव का शोधपरक लेखा-जोखा सुगम शैली में प्रस्तुत किया जाना ही उचित पत्रकारिता है। परिवर्तन के दौर से गुजर रही पत्रकारिता के उन आयामों को सामने लाने की जरूत है ।, जो इसके विकास और आत्मालोचन दोनों दृष्टिकोणों से महत्त्वपूर्ण हैं।
