नकली पंजीयन बेचने वाले रजिस्ट्रार से प्रदेश भर के फार्मासिस्ट परेशान

मध्यप्रदेश के दवा उद्योग में फर्जी फार्मासिस्टों का बोलबाला
नकली पंजीयन बेचने वाले रजिस्ट्रार से प्रदेश भर के फार्मासिस्ट परेशान
भोपाल,26 मार्च। मध्यप्रदेश में नकली फार्मासिस्ट आम जनता के स्वास्थ्य के साथ सरेआम धोखाघड़ी कर रहे हैं। नकली मार्कशीट के आधार पर फर्जी पंजीयन प्रमाण पत्र जारी करने वाले गिरोह को संरक्षण देने वाले मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल के रजिस्ट्रार की वजह से ये गोरखधंधा खूब फलफूल रहा है। इस गिरोह की वजह से आम फार्मासिस्ट परेशान है लेकिन शासन ये सब जानकर भी खामोश रहकर किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहा है।लगभग तीन हजार फार्मासिस्ट अभी अपने पंजीयन का इंतजार कर रहे हैं। लगभग दो हजार से बाईस सौ पंजीकृत फार्मासिस्टों के पंजीयनों का नवीनीकरण किया जाना है लेकिन वे काऊंसिल के ढर्रे से परेशान घूम रहे हैं।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक शासन ने मध्यप्रदेश फार्मेसी काऊंसिल को योग्य फार्मासिस्टों के हवाले कर रखा है लेकिन शासन का भेजा हुआ एक रजिस्ट्रार वहां फर्जी पंजीयन प्रमाण पत्र जारी करने का गिरोह चला रहा है। एसडीएम स्तर के इस अधिकारी की वजह से काऊंसिल में दलालों का बोलबाला है। इंदौर की विजय नगर पुलिस ने जिस फर्जी मार्कशीट बनाने वाले गिरोह का भांडा फोड़ा था उसने पुलिस को जानकारी दी थी कि काऊंसिल के कतिपय कर्मचारी और अधिकारी यहां फर्जी मार्कशीट के आधार पर फार्मासिस्टों का पंजीयन कर रहे हैं। लाखों रुपयों के कालेधन की उगाही से जहां ये गिरोह फल फूल रहा है वहीं शासन को भारी राजस्व क्षति पहुंच रही है।
विजय नगर पुलिस ने फर्जी मार्कशीट के आधार पर फार्मासिस्ट का पंजीयन करने वाले जिस गिरोह का भांडा फोड़ा था उसमें से तीन बाबुओं को पुलिस ने गिरफ्तार करके प्रकरण कायम कर लिया था। एक अन्य बाबू की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई थी। इस गिरोह की ओर से प्रस्तुत किये जाने वाले दस्तावेजों को काऊंसिल का रजिस्ट्रार शैलेन्द्र हिनोतिया बाकायदा स्वीकार करके पंजीयन प्रमाण पत्र जारी कर देता था। पिछले दो सालों में गिरोह ने जो प्रमाण पत्र जारी किए हैं उनके आधार पर उसने लगभग एक करोड़ रुपयों की अवैध वसूली की है। रजिस्ट्रार की इन करतूतों की शिकायत स्वास्थ्य संचालक और स्वास्थ्य सचिव के अलावा मुख्य सचिव तक भी पहुंच चुकी है लेकिन शासन की लापरवाही की वजह से रजिस्ट्रार और गिरोह के सदस्य अपना कारोबार बदस्तूर चला रहे हैं। जिन बाबुओं को दोषी पाया गया है रजिस्ट्रार उन्हीं के सहारे ये गोरखधंधा चला रहा है।काऊंसिल के अध्यक्ष संजय जैन और शासन के आला अधिकारियों की कृपा से रजिस्ट्रार की गिरफ्तारी नहीं हो सकी थी लेकिन इसके बावजूद उसके संरक्षण में गिरोह का काला कारोबार लगातार जारी है।
राज्य की भाजपा सरकार कोअपदस्थ करने का षड़यंत्र चलाकर इस गिरोह ने शासन को खुली चुनौती भी दी लेकिन चुनावी हेरफेर की वजह से इसकी हरकतें राजनेताओं की निगाहों में नहीं आ सकी हैं। पूर्ववर्ती सरकार के स्वास्थ्य मंत्री प्रभुराम चौधरी ने इंदौर पुलिस की कार्यवाई के बाद मामले पर केवल इसीलिए पर्दा पड़ा रहने दिया था कि इससे शासन की बदनामी होती लेकिन चुनाव के बाद विभाग उनके हाथ से चला गया और वे कोई सख्त कार्रवाई नहीं कर पाए। नए स्वास्थ्य मंत्री की निगाह अभी तक इस गोरखधंधे तक नहीं पहुंची है।
इंदौर पुलिस ने फार्मेसी काऊंसिल के जिन तीन बाबुओं को गिरफ्तार किया था और रजिस्ट्रार से पूछताछ की थी उसने पाया कि इस गिरोह ने डी फार्मा, बी फार्मा और एम फार्मा के लगभग दो सौ से अधिक नकली फार्मासिस्टों को फर्जी मार्कशीटों के आधार पर मैदान में उतार दिया है। ये सभी फार्मासिस्ट आज या तो मेडीकल स्टोर चला रहे हैं या फिर उद्योगों और सरकार में फार्मासिस्ट के रूप में नौकरी कर रहे हैं। कई नकली फार्मासिस्ट यहां से पंजीयन प्रमाण पत्र खरीदकर विदेश भी जा चुके हैं। जिस एलडीसी विजय शर्मा ,संजय तिलकवार और यूडीसी सत्यनारायण पांडे को पुलिस ने गिरफ्तार किया था वे लगभग बीस सालों से काऊंसिल में नौकरी कर रहे हैं। आन लाईन भरे जाने वाले इन आवेदनों को ये दिल्ली में रिया नाम की महिला के पास भेजते थे। वह फर्जी प्रमाण पत्रों के साथ इन आवेदनों को पूरा करती थी और रिश्वत की राशि भी अपने खाते में वसूल लेती थी। इसी में से निश्चित प्रतिशत रकम बाबुओं और रजिस्ट्रार के पास भेज दी जाती थी।
शिवराज सरकार के मंत्री प्रभुराम चौधरी के प्रयासों से जिस फार्मेसी काऊंसिल ने कार्यभार संभाला उसने इस गोरखधंधे पर लगाम लगाने के कई प्रयास किए लेकिन वह भी नाकाम रही है। काऊंसिल के कई प्रतिष्ठित सदस्यों ने शासन के पास तक इस काले कारोबार की जानकारी भी पहुंचाई है लेकिन अब तक शासन ने कोई कार्रवाई नहीं की है।पंजीयन प्रमाण पत्र जारी करने वाली इस स्वतंत्र काऊंसिल की सुविधा के लिए शासन ने इस रजिस्ट्रार के सचिव बनाकर भेजा है । इसे काऊंसिल की ही रकम से हर महीने दो लाख रुपये से अधिक की वेतनराशि और भत्ते दिए जाते हैं। यही वजह है कि शासन का दबदबा बनाए रखने के लिए रजिस्ट्रार ने मनोनीत काऊंसिल को भी ताक पर धर दिया है।
सूत्र बताते हैं कि काऊंसिल के अध्यक्ष और सद्सयों ने भी कई बार शासन से अनुरोध किया कि नकली फार्मासिस्टों के माध्यम से जनता के साथ की जा रही इस धोखाघड़ी को रोकने के लिए वह हस्तक्षेप करे लेकिन शासन के नक्कार खाने में तूती की तरह ये आवाज गुम हो जाती है। काऊंसिल के संसाधन बढ़ाने में भी रजिस्ट्रार हिनोतिया पूरी तरह असफल रहे हैं। वे स्वयं शासन से अनुरोध कर चुके हैं कि उन्हें यहां से हटाकर फील्ड में पदस्थ किया जाए लेकिन शासन इस खोटे सिक्के का कहीं और उपयोग नहीं करना चाहता है।
