हिंदी दिवस – उपस्थिति का उत्सव है, न कि पराभव का चिंतन

हिंदी दिवस –
उपस्थिति का उत्सव है, न कि पराभव का चिंतन
राजगढ़ के छोटे से कमरे में आयोजित हिंदी दिवस पर वैचारिक मंथन ने दिवस की उपयोगिता को एक नई दिशा दी।
एकत्रित चुनिंदा बुद्धिजीवियों ने हिंदी को लेकर अपनी-अपनी चिंताएं जरूर जाहिर करी। लेकिन हिंदी पर संकट को लेकर निश्चितता भी सामने आई।
कुछ लोगो का सोच था कि, हिंदी संकट में है । लेकिन कौन सी हिंदी संकट में है। संकट में वह क्लिष्ट हिंदी है । जो आम आदमी की समझ से हमेशा बाहर रही है।
गूगल रिकॉर्ड के अनुसार दुनिया में 7000 से ज्यादा भाषाएं बोली जाती हैं। हिंदी दुनिया की तीसरे नंबर की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। फिर इस भाषा पर संकट की बात करना आंकड़ों के अनुसार स्वतः ही आप्रासंगिकता हो जाता है।
हिंदी दिवस पर हिंदी की चिंता अक्सर वह लोग कर रहे हैं। जो स्वयं हिंदी भाषी हैं। आयोजन में श्री हरिशंकर परसाई की उन पंक्तियों का जिक्र भी हुआ। जिसमें उन्होंने कहा था कि,हिंदी दिवस वह दिवस है, जब हिंदी भाषी मिलकर एक दूसरे को यह समझते हैं कि, हमें हिंदी में बातचीत करना चाहिए। इसलिए हिंदी दिवस के ज्यादा आयोजन हिंदी के संकट पर केंद्रित होकर रह जाते हैं।
जब दुनिया के सारे देशों में भारतीय पहुंच रहे हैं। तो हिंदी भी उनके साथ दुनिया में भी पहुंच रही है। विदेश में बसे हुए भारतीय, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी के बोलचाल की भाषा सामान्य हिंदी है। चाहे लिखावट में अंतर हो।
दुनिया भर में भारतीय फिल्में, उसके गाने लोकप्रिय हो रहे हैं। कपिल शर्मा के शो, भारतीय मुशायरे, हिंदी भाषी बाबाओ के कार्यक्रम दुनिया भर में होने का मतलब है कि हिंदी पर संकट नहीं है।
भारत के किसी भी हिस्से में पहुंचकर आप हिंदी में बोलचाल कर सकते हैं। सभी लोग न भी समझे। पर कुछ लोग आपको समझने वाले मिल सकते हैं। इसके बावजूद भी कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ साहित्यकार श्री उमराव सिंह लखनोद साहब का कहना था कि हर भाषा समय के साथ-साथ विलुप्त होती है। जब कोई भाषा आम आदमी से निकलकर कुलीन लोगों के बीच पहुंच जाती है तो वह क्लिष्ट होने लगती है। उसमें व्याकरण देखा जाने लगता है। उसके बाद उसके पराभव की शुरुआत होती है।
हर भाषा को विलुप्त होना है। जैसे पाली, प्राकृत, अब संस्कृति विलुप्त होने वाली है। वैसे ही कभी हिंदी को भी समाप्त होना है। हमारी जिम्मेदारी यह है कि उसे कब तक बचा कर रख सकते हैं।
कई बार हिंदी पर चर्चा करते समय, हम अंग्रेजी का विरोध करने लगते हैं। जबकि हिंदी की किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं है। वरिष्ठ बुद्धिजीवी एवं पत्रकार श्री रघुनंदन शर्मा जी का कहना था ,आजादी के आंदोलन में सब को जोड़ने वाली भाषा हिंदी थी। आजादी के बाद जो भी कारण रहे हो, इसे संविधान की भाषा बनाने में समय लग गया। जिसके कारण भी हिंदी देश में दूसरे नंबर पर जाती रही।
हिंदी की असली सेवा विदेश में बसे हुए भारतीय कर रहे हैं। उनके माध्यम से दूसरी भाषाओं के बोलने वाले लोग भी हिंदी फिल्मों एवं गीत के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। वह हिंदी को समझने की कोशिश कर रहे हैं। एक वक्ता ने बताया कि उनके बच्चे फ्रांस के दो साथियों को हिंदी बोलना सीखा रहे हैं।
वर्तमान में सोशल मीडिया पर देखा जाए तो सबसे ज्यादा लाइक और कमेंट्स उन पोस्ट पर होते हैं जिन पर शायरी या कविता लगी हो। इसलिए अब वह लोग भी जो सोशल मीडिया के तिलिस्म की जद में है । हिंदी कविताओं एवं शायरी का उपयोग कर रहे हैं।
हिंदी जरूरत की भाषा है। जिसकी जितनी जरूरत है वह उतना बोल रहा है। फिर चाहे अमेरिका के राष्ट्रपति को भारत आकर नमस्ते ही क्यों ना बोलना पड़े। मल्टीनेशनल कंपनियां अपने विज्ञापन हिंदी में प्रसारित कर रही हैं। हॉलीवुड की फिल्में हिंदी में डब हो रही हैं। दुनिया भर में हिंदी फिल्में अलग-अलग भाषाओं में पहुंचकर वहां की भाषाओं में डब की जा रही हैं।
अंग्रेजी भाषा का गढ़ माने जाने वाला गूगल जब कुमार विश्वास को बुलाकर इंटरव्यू करता है। तो लगता है हिंदी के ब्रांड एंबेसडर बढ़ रहे हैं। जनाब राहत इंदौरी ने एक इंटरव्यू में कहा था वह 80 देश की यात्राएं कर चुके हैं। इतने देशों में अगर कोई मुशायरे को समझ रहा है। तो हिंदी की उपस्थिति बनी हुई है।
यह जरूर है की प्रेमचंद के गोदान के पढ़ने वाले कम हो रहे हैं। पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी अब “उसने कहा था ” आम चर्चा में नहीं है। मुक्तिबोध की कविताएं कोई नहीं पढ़ रहा है। आचार्य चतुरसेन के बारे में बच्चों को नहीं पता है। लेकिन तुलसीदास जी द्वारा रचित कालजई रचनाएं आज भी धार्मिक पंडालों में गूंज रही हैं।
मुरारी बापू को सऊदी अरब तक में सुना जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी गूंज रही है। व्याकरण से परे भी हिंदी है। असली हिंदी वही है। जो गांव से आया हुआ ग्रामीण शहर के व्यापारियों से संवाद में इस्तेमाल कर रहा है।
इसलिए हिंदी दिवस, हिंदी की उपस्थिति का उत्सव है ना की क्लिष्ट हिंदी के पतन का मातम। जैसी भी आपकी हिंदी है,उसे बनाये रखे। यही हिन्दी के प्रति आपके समर्पण का प्रदर्शन है।
