प्रतिनिधि मंडल से पूछा कि क्या ये बेईमान भी है ?

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जब मैं गृह विभाग का राज्य मंत्री था तो एक दिन एक जनपद में नियुक्त एक पुलिस इंस्पेक्टर को लेकर संगठन के दो अलग अलग प्रतिनिधि मंडल मुझसे आकर मिले. एक ने कहा कि इस इंस्पेक्टर ने गदर मचा रखा है . जनता त्राहि त्राहि कर रही है.इसका तत्काल हटना आवश्यक है. दूसरे प्रतिनिधि मंडल का कहना था कि ये बहुत दबंग इंस्पेक्टर है . इस के कारण गुंडे डरे रहते हैं . कानून व्यवस्था के लिए इसका जिले में रहना बहुत आवश्यक है.
मैने प्रतिनिधि मंडल से पूछा कि क्या ये बेईमान भी है ? उन्होंने कहा कि हां ये रिश्वत तो लेता है लेकिन अपराधियों पर कहर बनकर टूटता है. मैने कहा कि अगर यह बेईमान है और साहसी ( दुसाहसी )भी है तो यह किसी डाकू से ज्यादा खतरनाक है. डाकू बड़े दुस्साहसी होते हैं , दूसरे का माल लूटने के लिए उसके घर पर धावा बोलते हैं और अगर वे किसी को उस लूट में बाधा समझते हैं तो उसे मारने में जरा भी संकोच नहीं करते. उनके मन में जरा भी दया नहीं होती. जो बेईमान है , लुटेरा है , दूसरे की संपति पर बुरी नजर रखता है तो उसके लिए किसी भी सीमा तक गिर सकता है. साथ ही अगर उसके पास सरकारी वर्दी है और सरकारी रिवॉल्वर है तो उसकी लूट की क्षमता कई गुणा बढ़ जाती है. उसके दुस्साहस में भी वृद्धि होती है और संरक्षण भी मिल जाता है. इसलिए अगर कोई इंस्पेक्टर बहादुर भी है और बेईमान भी है तो वह सामान्य इंस्पेक्टर से ज्यादा खतरनाक है.
जब गुंडे अपराधी लुटेरे राजनीति में स्थान पाते हैं तो वो कोई अच्छा काम नहीं कर सकते. आप पीतल के बर्तन में नीबू की शिकंजी को सुरक्षित नहीं रख सकते हैं.किसी वस्तु को संरक्षित करने के लिए पात्र का भी महत्व है. जैसे पवित्र साध्य के लिए साधन की पवित्रता भी आवश्यक है , वैसे ही लोक कल्याण के कार्यों के लिए श्रेष्ठ जनप्रतिनिधियों का चयन आवश्यक है .जब गलत व्यक्ति राजनीति में जनप्रतिनिधि बन कर सत्ता का संरक्षण पा लेता है तो उसके जुल्म करने की शक्ति में कई गुणा वृद्धि हो जाती है. उत्तर प्रदेश और बिहार में कई ऐसे नेताओं के उदाहरण सबके सामने हैं जिन्होंने सत्ता के संरक्षण में न केवल आम आदमी पर अत्याचार किया बल्कि अपना आर्थिक साम्राज्य भी खड़ा कर लिया.अपराध के साथ भ्रष्टाचार भी एक बड़ा माध्यम है जिससे लोगों की अन्याय और अत्याचार करने की क्षमता में असीमित वृद्धि होती है. बहुत बड़ी संख्या में राजनीति में भ्रष्टाचार आम लोगों के हितों को खा जा रहा है.ये बात ठीक है कि वर्तमान सरकार ने डायरेक्ट बेनिफिट स्कीम जैसे माध्यमों से दलाली पर बड़ा अंकुश लगाया है लेकिन नौकरशाही और राजनेताओं के भ्रष्टाचार पर अभी अंकुश नहीं लगे हैं. नौकरशाही में राजनैतिक हस्तक्षेप रोकने के नाम पर नौकरशाही में स्वेच्छाचारिता बढ़ी है. आम लोगों को प्रताड़ित करने के अवसर बढ़े हैं इसलिए भ्रष्टाचार के अवसरों में वृद्धि हुई है. ऐसे ही जीत सुनिश्चित करने के प्रयासों ने राजनीति में गुंडे अपराधी भ्रष्टाचारियों की संख्या बढ़ी है. ऐसे जनप्रतिनिधियों से किसी अच्छे परिणाम की अपेक्षा बेमानी है. सरकारी कामों में कमीशन बढ़ा है . जिन कार्यों में जनप्रतिनिधियों की कोई भूमिका नहीं है , उन क्षेत्रों में भी शिकायत करने के उनके अधिकार के कारण अवैध वसूली के अवसर बढ़े हैं . उदाहरण के तौर पर विकास प्राधिकरणों के क्षेत्रों में अवैध निर्माण में पुलिस के साथ साथ जनप्रतिनिधियों का भी हिस्सा हो गया है. बड़े बड़े जनप्रतिनिधियों के संरक्षण में शहरी क्षेत्रों में अवैध कॉलोनाइजेशन हो रहा है. कानून के लंबे हाथ होने के दावे केवल फिल्मी डायलॉग तक सीमित होते जा रहे हैं.
भाजपा के लिए ये चुनौतियां हैं . भाजपा जनप्रतिनिधियों के चयन के समय चाल चरित्र और चेहरे के महत्व की बात करती रही है. भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी जी का पार्टी विद ए डिफरेंस पर बड़ा बल रहा है.मुझे याद है जब उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार थी तो आडवाणी जी ने मंत्रिमंडल के सभी सदस्यों को निर्देशित किया था कि वे अपनी सम्पत्ति का विवरण उनके कार्यालय में जमा करें. राजनीति की वर्तमान चुनौतियों को स्वीकार करने के लिए भाजपा को अपने निर्णयों को डाइल्यूट करने की आवश्यकता नहीं है.सारा देश स्वीकार करता है कि श्री नरेंद्र मोदी जी की ईमानदारी उनके कार्यकाल के सारे कार्यों पर भारी है. भाजपा को भी अपने इस व्यवस्था में कुछ डाइल्यूशन की आवश्यकता नहीं है.अच्छा व्यक्ति ही अच्छा परिणाम दे सकता है. हेडिंग जब गुंडे अपराधी लुटेरे राजनीति में स्थान पाते हैं तो अच्छा काम नहीं करते बालेश्वर त्यागी

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