प्रीपेड मृत्यु 🙏🙏

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प्रीपेड मृत्यु 🙏🙏

Pune के एक बड़े श्मशान घाट में दोपहर के 3 बजे थे।

‘रोहन’ (उम्र 35 वर्ष),

जो अमेरिका की एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था,

अभी-अभी फ्लाइट से उतरकर सीधे श्मशान घाट पहुँचा था।

उसके पिता,

‘सदाशिवराव’ (उम्र 75 वर्ष),

कल रात गुजर गए थे।

रोहन के हाथ में महंगा लैपटॉप बैग था और आँखों पर रेबैन का चश्मा।

उसे पसीना आ रहा था और वह बार-बार घड़ी देख रहा था।

वहाँ ‘मोक्ष इवेंट मैनेजमेंट’ (अंतिम संस्कार करने वाली एजेंसी) का कर्मचारी

‘सुमित’ खड़ा था।

सुमित ने सारी तैयारी कर रखी थी।

लकड़ियाँ सजा दी थीं,

पंडित बुला लिया था, और सदाशिवराव के पार्थिव शरीर को स्नान कराकर तैयार रखा था।

रोहन आया।

उसने पिता के चेहरे की ओर एक नजर डाली।

आँखों से एक-दो आँसू निकल आए।

उसने सुमित से पूछा:

“मिस्टर सुमित,

सब तैयार है ना?

मुझे 6 बजे की रिटर्न फ्लाइट पकड़नी है।

कल मेरी बहुत जरूरी मीटिंग है।

प्लीज़ जल्दी कराइए।”

सुमित को आश्चर्य हुआ।

जिस पिता ने इस बेटे को पाल-पोशकर बड़ा किया,

उस पिता की चिता के पास रुकने के लिए इस बेटे के पास तीन घंटे भी नहीं थे।

सुमित ने शांत होकर सिर हिलाया।

विधि पूरी हुई।

रोहन ने मुखाग्नि दी।

धुएँ के गुबार आसमान में उठ गए।

रोहन ने सुमित को अलग ले जाकर चेकबुक निकाली।

“सुमित, धन्यवाद।

आपने अच्छी व्यवस्था की।

आपका बिल कितना हुआ? 50 हजार? 1 लाख?

राशि बताइए,

मैं अभी चेक दे देता हूँ।

मैं दोबारा नहीं आ पाऊँगा,

अस्थि विसर्जन भी आप ही करवा दीजिए।”

सुमित ने रोहन की ओर देखा।

उसके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी।

उसने जेब से एक पुरानी फाइल निकाली और रोहन के हाथ में दी।

“साहब, बिल देने की जरूरत नहीं है।

आपका बिल ‘पेड’ है।”

रोहन चौंक गया।

“पेड?

किसने भरा पैसा?

क्या मेरे चाचा ने?”

सुमित बोला:

“नहीं साहब।

पाँच साल पहले सदाशिवराव जी (आपके पिता) हमारे ऑफिस आए थे।

वे बहुत बीमार थे, ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे।

उन्होंने मुझसे पूछा था —

‘आपका पैकेज क्या है?

मेरे बेटे को तकलीफ न हो, सब इंतज़ाम कर देंगे ना?’

हमने उन्हें पैकेज बताया।

उन्होंने उसी दिन 50,000 रुपये एडवांस जमा कर दिए थे।

और यह ‘चिट्ठी’ मुझे देकर कहा था —

‘मेरा बेटा आए तो उसे यह दे देना।

और अगर वह न आ सके,

तो आप ही मेरा अंतिम संस्कार कर देना।’”

सुमित ने वह चिट्ठी रोहन को दी।

रोहन ने काँपते हाथों से चिट्ठी खोली।

उसमें सदाशिवराव के काँपते अक्षरों में लिखा था:

“प्रिय रोहन,

बेटा,

मुझे पता है तुम बहुत व्यस्त हो।

अमेरिका में तुम्हें साँस लेने की भी फुर्सत नहीं होती।

मुझे मालूम है कि

मेरी मृत्यु की खबर सुनकर तुम्हें चिंता होगी।

‘छुट्टी मिलेगी या नहीं?

टिकट मिलेगा या नहीं?

मीटिंग का क्या होगा?’

ये सवाल तुम्हारे मन में आएँगे।

बेटा, तुम्हारा समय और तुम्हारा करियर बहुत महत्वपूर्ण है।

मैंने तुम्हें इसलिए पाला है कि तुम दुनिया जीत सको।

एक बूढ़े की लाश के लिए तुम अपना नुकसान मत करना।

इसलिए मैंने अपनी मृत्यु की व्यवस्था पहले ही कर दी है।

एजेंसी को पैसे दे दिए हैं।

वे सब कर देंगे।

तुम आ सको तो अच्छा है,

न आ सको तो भी मुझे कोई शिकायत नहीं।

बस एक विनती है —

जब मैं तुम्हें बचपन में स्कूल छोड़ने जाता था,

तो तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ा था।

आज जब तुम मुझे अग्नि दो,

तो तुम्हारा हाथ काँपना नहीं चाहिए।

जल्दी वापस चले जाना।

तुम्हारी पत्नी इंतज़ार कर रही होगी।

तुम्हारा,

पापा।”

चिट्ठी पढ़ते ही रोहन के हाथ से चेकबुक कीचड़ में गिर गई।

उस श्मशान में,

जहाँ लकड़ियों के जलने की आवाज आ रही थी…

वहाँ अब रोहन का अहंकार और करियर का घमंड जलकर राख हो चुका था।

वह घुटनों के बल बैठ गया।

चिल्लाया —

“पापा…!! मुझे माफ कर दीजिए!”

उसने सुमित के पैर पकड़ लिए।

“सुमित,

मुझे अमेरिका नहीं जाना।

मुझे अपने पापा के साथ रहना है!

मैंने करोड़ों रुपये कमाए,

पर मैं तो असली भिखारी निकला!

मेरे पापा ने मरते समय भी मेरी मीटिंग की चिंता की…

और मैं उनके अंतिम दर्शन का भी हिसाब लगा रहा था?”

उस दिन रोहन फ्लाइट नहीं पकड़ सका।

वह वहीं,

जलती चिता के सामने रात भर बैठा रहा।

क्योंकि उसे समझ आ गया था —

‘प्री-पेड’ सिर्फ सिम कार्ड हो सकता है,

पिता का प्रेम नहीं।

पिता का प्रेम ‘अनलिमिटेड’ होता है,

और उसकी कीमत दुनिया की कोई भी करंसी नहीं चुका सकती।

आप दुनिया में कितने भी बड़े बन जाएँ,

कितना भी पैसा कमा लें…

लेकिन जिन माता-पिता ने आपका बचपन सँवारा,

उनके अंतिम सफर में साथ देने से कभी पीछे मत हटिए।

एजेंसी अंतिम संस्कार कर सकती है,

लेकिन आँसू एजेंसी के नहीं होते —

वे अपने खून के रिश्तों के ही होते हैं।

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