जिसे पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे सम्मान मिलने चाहिए, उसे दो गज जमीन भी नसीब नहीं…?*
*जिसे पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे सम्मान मिलने चाहिए, उसे दो गज जमीन भी नसीब नहीं…?*
व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन
कभी-कभी इस देश में इंसान की कीमत उसकी नीयत से नहीं, बल्कि उसकी हैसियत से तय होती है। एक तरफ वो लोग हैं जो जिंदा इंसानों का सौदा करते-करते इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि अब उन्हें लाशों में भी मुनाफा दिखाई देता है… और दूसरी तरफ एक 80 साल का बुजुर्ग राधेश्याम अग्रवाल जो लावारिस लाशों के ढेर के बीच खड़ा होकर सरकार से बस इतनी सी गुहार लगा रहा है कि “साहब, दो गज जमीन दे दो… ताकि इनको सम्मान से विदा कर सकूं।”
अब जरा इस तस्वीर के दूसरे फ्रेम में आइए… वहां बैठे हैं विवेक कुमार पोरवाल, राजस्व विभाग के मुखिया। सरकारी जमीन का ऐसा पहरा मानो हर इंच में उनका निजी इतिहास दफन हो। जमीन देने का सवाल आते ही नियम, फाइल, प्रक्रिया और ‘विचाराधीन’ का ऐसा जाल बुन दिया जाता है कि नेक नीयत भी दम तोड़ दे।
व्यवस्था का यह विरोधाभास बड़ा अजीब है। एक आदमी है जो जीवनभर उन लाशों को कंधा देता रहा, जिनके अपने उन्हें पहचानने तक नहीं आए। ऐसे कितने ही मामले होंगे, जहां बड़े-बड़े अफसर जिनमें आईपीएस, आईएएस तक शामिल इस दुनिया से चुपचाप विदा हो गए, और अंतिम संस्कार का जिम्मा इसी बुजुर्ग ने उठाया। जिनके बच्चे विदेशों में “सेटल” हैं, उनके माता-पिता यहां “अनक्लेम्ड” हो जाते हैं। और तब यही राधेश्याम अग्रवाल इंसानियत की आखिरी रस्म निभाते हैं।
*लेकिन सरकार के पास उनके लिए क्या है? ना जमीन… ना स्थायी व्यवस्था… ना कोई सम्मान।*
कभी-कभी लगता है कि जमीन सिर्फ उन्हीं के लिए सुरक्षित है जिनके पास पहले से बहुत कुछ है। बड़े उद्योगपति, बड़े प्रोजेक्ट, बड़ी घोषणाएं… वहां जमीन भी है, रास्ता भी है, और नियम भी लचीले हैं। लेकिन जहां बात एक सामाजिक कार्य की आती है, वहां पूरी व्यवस्था अचानक ‘कानूनी अनुशासन’ का प्रतीक बन जाती है।
आप दीनारपुर, ग्वालियर के उस मामले को ही देख लीजिए, जहां मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने 18,880 वर्गमीटर जमीन से जुड़े विवाद में सरकार की देरी पर नाराजगी जताई। 1788 दिन की देरी… और फिर अवमानना नोटिस। यह सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि उस सुस्त तंत्र का आईना है जिसमें जिम्मेदारी अक्सर फाइलों के नीचे दब जाती है।
दूसरी तरफ खरगापुर तहसील का मामला… 60 एकड़ सरकारी जमीन फर्जी दस्तावेजों के जरिए निजी नाम पर ट्रांसफर। लोकायुक्त तक को दखल देना पड़ा। समन जारी हुए, चेतावनियां दी गईं… लेकिन नतीजा? वही ढाक के तीन पात।
यहां गौर करने वाली बात यह है कि इन मामलों में विवेक कुमार पोरवाल सीधे आरोपी नहीं हैं, लेकिन विभागीय जिम्मेदारी का बोझ उनके कंधों पर जरूर है। शायद यही वजह है कि अब हर फैसला “फूंक-फूंक कर” लिया जा रहा है। पर सवाल यह है कि क्या यह सतर्कता सिर्फ नेक कामों के रास्ते में ही दीवार बनती है?
व्यवस्था का यह डर समझ में आता है, लेकिन यह चयनात्मक क्यों है? जहां जमीन हड़पने की साजिश हो, वहां सिस्टम धीमा… और जहां जमीन मांगने वाला एक समाजसेवी हो, वहां सिस्टम कठोर।
राधेश्याम अग्रवाल जैसे लोग इस देश की अनकही आत्मा हैं। वो किसी योजना का हिस्सा नहीं, किसी बजट का आंकड़ा नहीं, लेकिन इंसानियत की उस आखिरी कड़ी को जोड़ते हैं जो समाज को समाज बनाती है। वो उन लोगों को सम्मान देते हैं जिन्हें जीते जी भुला दिया गया, और मरने के बाद भी कोई अपना नहीं मिला।
ऐसे व्यक्ति को अगर जमीन देना भी सरकार के लिए कठिन फैसला है, तो फिर हमें यह मान लेना चाहिए कि हमारी प्राथमिकताएं कहीं गड़बड़ा गई हैं।
सम्मान सिर्फ पुरस्कारों से नहीं मिलता, लेकिन यह भी सच है कि कुछ लोग उन पुरस्कारों से कहीं ज्यादा बड़े होते हैं। पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे सम्मान जिनके नाम पर गर्व करते हैं, अगर ऐसे लोगों तक नहीं पहुंचते, तो उन सम्मानों की गरिमा पर भी सवाल उठना लाजमी है।
सरकार चाहे तो बहुत कुछ कर सकती है। दो गज जमीन देना कोई असंभव काम नहीं है। सवाल बस नीयत का है, प्राथमिकता का है, और उस नजर का है जिससे हम समाजसेवा को देखते हैं।
जिस देश में लावारिस लाशों को कंधा देने वाला आदमी जमीन के लिए तरस जाए, वहां विकास के आंकड़े चाहे जितने चमकदार क्यों न हों, इंसानियत कहीं न कहीं अधूरी ही रहती है…।
