०प्रतिदिन विचार (21/02/2024)राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता-राकेश दुबे

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देश आम चुनाव की दहलीज़ तक पहुँच चुका है,चुनावी युद्ध और चंदे के बीच का गठबंधन किसी से छिपा नहीं है। पिछले आम चुनाव समेत कई सारे चुनाव इन्हीं गैरकानूनी फंड यानी चंदे पर लड़े गए हैं। इस मुद्दे पर पहले ही सुनवाई कर निर्णय देना कहीं ज्यादा उचित होता, लेकिन देश की अदालत ने ऐसा न करने का विकल्प चुना। राज्यसभा सीट से पुरस्कृत पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई से जब पूछा गया था कि उन्होंने इस मुद्दे पर फैसला देने में देरी क्यों की? तो उन्होंने कहा कि उन्हें याद नहीं है कि यह मुद्दा उनकी अदालत के सामने आया था।उन समेत कई लोगों को यह नहीं पता होगा कि चुनावी बॉन्ड का कारोबार कितना शरारतपूर्ण था।
कुछ ख़ास बातें – (1)इस योजना की घोषणा मोदी सरकार ने 2017 के आम बजट के दौरान की थी,और ऐलान किया था कि चुनावी बॉन्ड राजनीतिक दलों के लिए गुमनाम दानदाताओं से पैसा हासिल करने का एक तरीका होगा। बॉन्ड खरीदते समय दानकर्ता को बैंक को अपनी पहचान बतानी होगी, लेकिन बॉन्ड पर पहचान उजागर नहीं की जाएगी। राजनीतिक दलों को भी यह बताने की आवश्यकता नहीं होगी कि यह बॉन्ड उन्हें किसने दिया।मतदाताओं को यह नहीं पता चलेगा कि राजनीतिक दलों को कौन पैसा दे रहा है और किस हद तक प्रभावित कर रहा है। यह बदलाव विदेशी कंपनियों और यहां तक कि शेल कंपनियों (रहस्यमयी कंपनियां) को किसी को भी योगदान के बारे में सूचित किए बिना या अपना नाम उजागर किए बिना भारत की राजनीतिक पार्टियों को दान देने की अनुमति देगा।
(2)इस बॉन्ड के जरिए कंपनी अधिनियम के उस हिस्से को भी ख़त्म कर दिया गया जिसके तहत कॉरपोरेट्स या औद्योगिक घरानों और कंपनियों को अपने वार्षिक खातों के विवरण में अपने राजनीतिक दान का ब्योरा देना होता था। अब उन्हें ऐसा करने की आवश्यकता नहीं रही।
(3)बॉन्ड आने से पहले तक कॉर्पोरेट को पहले भी राजनीतिक दलों चंदा देने की इजाजत थी, लेकिन उसकी सीमा औसत तीन साल के शुद्ध लाभ के अधिकतम 7.5 प्रतिशत तक सीमित था। लेकिन बॉन्ड के बाद कोई रोकटोक नहीं, क्योंकि वे अब केवल चुनावी बॉन्ड के माध्यम से किसी भी राजनीतिक दल को कोई भी चंदा दे सरके थे, क्योंकि वह कानूनी सीमा हटा दी गई थी।
(4)एक तरह से किसी भी राजनीतिक दल को गुप्त रूप से पैसे देने की प्रक्रिया को आसान बना दिया गया। बॉन्ड 29 शहरों में भारतीय स्टेट बैंक की शाखाओं में 1 करोड़ रुपये मूल्य तक उपलब्ध थे। कोई भी व्यक्ति या कंपनी चंदा देने के लिए अपने अपने बैंक खाते के माध्यम से इन बॉन्ड को खरीद सकता था और उन्हें अपनी पसंद की पार्टी या व्यक्ति को सौंप सकता था, जो उन्हें जारी होने के 15 दिन के अंदर कैश करा सकता था।
30 जनवरी 2017 को आरबीआई ने कहा कि यह एक बहुत खराब विचार है क्योंकि “इससे रिजर्व बैंक के उस अधिकार का उल्लंघन होता जिसमें बियरर इंस्ट्रमेंट यानी कोई भी ऐसा बॉन्ड, जिसे कैश कराया जा सके, सिर्फ रिजर्व बैंक ही जारी कर सकता है। चूंकि यह बॉन्ड गुमनाम होंगे तो ऐसे में ये एक तरह से करेंसी बन जाएंगे जोकि भारत की नकदी में भरोसे को कम करेंगे।“इस बिंदु पर, आरबीआई की राय स्पष्ट थी: इसे सुविधाजनक बनाने के लिए कानून में संशोधन करना ‘केंद्रीय बैंकिंग कानून के मूल सिद्धांत को गंभीर रूप से कमजोर कर देगा और ऐसा करने से एक बुरी मिसाल कायम होगी।’
रिजर्व बैंक की दूसरी आपत्ति यह थी कि ‘पारदर्शिता का इच्छित उद्देश्य भी प्राप्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि इंस्ट्रूमेंट (बॉन्ड) के मूल खरीदार को पार्टी का वास्तविक योगदानकर्ता होना जरूरी नहीं है।’ यदि व्यक्ति ‘ए’ ने बांड खरीदा और फिर उसे अंकित मूल्य या उससे अधिक पर किसी विदेशी सरकार सहित किसी अन्य इकाई को बेच दिया, तो वह इकाई इसे किसी पार्टी को उपहार में दे सकती है।
इसके अलावा एक और संस्था चुनाव आयोग ने भी कहा कि चुनावी बॉन्ड एक खतरनाक स्कीम है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में आयोग ने कहा कि राजनीतिक दलों को इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए चंदा देने वालों के नाम छिपाने से राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता के पहलू पर गंभीर नतीजे होंगे।

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