सुख का अर्थ प्रतिकूल परिस्थितियों की अनुपस्थिति या दुःख नहीं है

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स्वजन प्रणाम
सुविचार
सुख का अर्थ प्रतिकूल परिस्थितियों की अनुपस्थिति या दुःख नहीं है।जीवन धूप-छांव का खेल है।जब तक जीवन का खेल चलता है, कठिनाइयां और बाधाऐं रहती ही और रहेंगी, इसे स्वीकार करना होगा,कोई इससे अछूता नहीं है। बाधाओं का स्वरुप- संपन्न किये जा रहे कार्य की प्रवृत्ति पर निर्भर करता है। किसी कवि ने कहा है, जिस प्रकार प्रकृति नायक की भूमिका निभाने के लिए तत्पर करती है,उसके मार्ग में भारी, उग्र अवरोध प्रस्तुत करती है, कड़ी, दुस्कर परिस्थितियों से गुजरने पर वह तराशा और निखारा और संवारा जाता है। इसीलिए सुधी और जिज्ञासु जन प्रभु से सहज,निर्बाध जीवन का नहीं,बल्कि कठिनाईयों और चुनौतियों से निपटने की शक्ति और धैर्य की याचना करते हैं। हम समस्याओं को ही ‘दुःख’ मान लेते हैं, और असली दुःख आने से पहले ही खुद को ‘उदास’ और ज़िन्दगी को ‘अरूचिकर’ बना लेते हैं क्योंकि समस्याएँ आती हैं तो युक्तियों से उनका ‘समाधान’ भी हो सकता है। बस, दुःखों को हमें धैर्य से, संयम से और ‘प्रभु की मर्जी’ समझकर ‘सहन’ करना होगा।
🙏🏾जय हिन्द🙏🏾
🌳🌳विजय राघव गढ़ 🌳🌳

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