पन्ना छतरपुर के सीमावर्ती इलाके मड़ला की एक घटना लगातार चर्चित हो रही है

अभी हाल पन्ना छतरपुर के सीमावर्ती इलाके मड़ला की एक घटना लगातार चर्चित हो रही है जिसमें अपने जमाने के ईमानदार, रौबदार एवं सेवाभावी सेवानिवृत पुलिस अधिकारी श्री भारत सिंह चौहान और उनकी पत्नी श्रीमती राजश्री चौहान के साथ पहले थाने के एक आरक्षक एवं तदुपरांत एक सब इंस्पेक्टर ने दुर्व्यवहार किया और बाद में पन्ना एसपी को गलत जानकारी देकर उन्हें गिरफ्तार करा दिया गया।
वह तो भला हो पन्ना के उस जज का जिसने चौहान दंपति की वयोवृद्धता एवं भलमानसता के मद्देनजर उन्हें पांच मिनट के अंदर जमानत दे दी नहीं तो पुलिस वालों की अपने विभाग के ही सेवानिवृत डीएसपी को उनकी पत्नी सहित जेल भेजने की पूरी तैयारी थी।
चौहान साहब के दो बेटे हैं जिनमें बड़ा अबू धाबी में डाॅक्टर है और छोटा बड़ौदा में एक नामचीन यूनिवर्सिटी में अधिकारी है। लिहाजा यहां पन्ना में उस नाजुक समय में उनका कोई सहायक नहीं था । वह तो अच्छा हुआ कि जिला उपभोक्ता भंडार के पूर्व अध्यक्ष रवींद्र शुक्ला वहां पहुंच गए और उन्होंने वकील से लेकर हर तरह की मदद की।
अपराध सीट बेल्ट न बांधने का था।
यह सीमावर्ती मड़ला थाना अपनी महत्वपूर्ण क्षेत्रीय स्थिति की वजह से पिछले एक अरसे से पुलिस विभाग के खाऊ-कमाऊ थाने के रूप में कुख्यात हो चला है । खासतौर से केन नदी की ‘खजुराहो बालू’ की तस्करी इसी थाने की शह पर होती है।
यहां की वर्तमान थाना प्रभारी (उपनिरीक्षक) रचना पटेल मड़ला के आगे केन नदी के उस पार गांव चंद्रनगर की रहने वाली हैं और थाने के रूटीन कामों के लिए कांस्टेबल बाबूलाल पर निर्भर हैं।
“चालान काटो इनका” यदि यहां के पुलिस वालों की तरफ से सुनाई पड़े तो इसका मतलब यही है कि हजार दो हजार के चालान के बदले चार-छह सौ की रिश्वत देकर निकल जाओ।
मैंने सुना है कि चौहान साहब और ड्राइवर दोनों सीट बेल्ट लगाए हुए थे मगर पीछे बैठीं राजश्री चौहान सीट बेल्ट नहीं लगाए थीं। आगे-पीछे दोनों सीटों पर बैठे यात्रियों के लिए बेल्ट का नियम लागू जरूर है परंतु पीछे बैठे लोग प्रायः बेल्ट नहीं लगाते। कोई बड़ी बात नहीं थी यदि अपने ही विभाग में उप पुलिस अधीक्षक रहे वयोवृद्ध बीमार व्यक्ति को उनके बारे में जानने के बाद उन्हें उनके गंतव्य की ओर निकल जाने दिया जाता।
लेकिन मड़ला थाने में हावी आरक्षक बाबूलाल साहू संभवतः गाड़ी में बैठे हुए क्षत्रिय परिवार का नाम सुनकर भड़क गये। शायद उन्हें अपने समाज पर “शताब्दियों से हो रहे अत्याचार” का ध्यान आ गया होगा ! आजकल यह बेदिमागी बीमारी समाज में बड़ी उथल-पुथल मचा रही है। “सदियों के शोषण” का यह मानसिक जीवाणु इन जातियों को भयंकर भ्रष्ट, उद्दंड एवं जातीय घृणा से ओत-प्रोत बना रहा है।
जब 7 अप्रैल की शाम यह प्रकरण मैंने पहली बार सुना था, तभी मेरे मस्तिष्क में यह बात आई थी कि हो ना हो वाहन चेकिंग वाले पुलिस में आरक्षण वाली टीम रही होगी जो एक सवर्ण परिवार को देखते ही भड़क गए होंगे और यही बात सामने आई।
चौहान साहब की धर्मपत्नी श्रीमती राजश्री चौहान जो पन्ना के ही पवई की जनपद अध्यक्ष रहीं थी उन्होंने बाबूलाल को समझाने की कोशिश की मगर बाबूलाल तैश में आ गये जबकि चौहान साहब ने गाड़ी से निकलकर इतना ही पूछा था कि ऐसी कौन सी बड़ी बात हो गई। मैं भी डीएसपी रहा हूं।
सबसे बेहूदा निर्णय एसपी पन्ना निवेदिता नायडू का रहा कि उन्होंने जैसे ही सुना कि राजश्री चौहान पूर्व विधायक दिवंगत अशोकवीर विक्रम सिंह (भैया राजा) की बहन एवं चौहान साहब उनके बहनोई हैं वैसे ही उन्होंने पत्रकार वार्ता बुलाकर ऐसे बात की जैसे उन्होंने खतरनाक आतंकवादियों को पकड़ लिया हो। लाइसेंसी बंदूक, वाहन जप्त कर लिया और जानबूझकर कोर्ट में एकदम आखिर में, बंद होने के क्षणों में पेश किया लेकिन समझदार जज ने स्थिति- परिस्थिति देखकर अतिरिक्त समय लेकर सुनवाई की और चौहान दंपति को जेल जाने से बचा लिया।
श्री भारत सिंह चौहान साहब को मैं तब से जानता हूं जब वे 35-36 साल पहले नागौद थाने में टीआई थे। आखिरी बार मैं उनसे भैया राजा के अंतिम संस्कार में ईसानगर रतनगढ़ी में मिला था। वे अत्यंत मिलनसार, मितभाषी व गरिमापूर्ण व्यक्तित्व वाले शख्स हैं जिन्होंने अपने जीवन के चालीस साल पुलिस को दिए हैं। वे आज भी अपने सहकर्मियों एवं समाज के बीच अत्यंत सम्मान के साथ याद किए जाते हैं। उन्होंने अपने जीवन में अनगिनत लोगों की सहायता की, न्याय की रक्षा की और पुलिस विभाग की गरिमा को ऊंचाई प्रदान की।
यह जानकर अच्छा लगा कि मध्य प्रदेश के सभी सेवानिवृत पुलिस अधिकारियों ने इस घटना को गंभीरता से लिया और प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को तुरंत ध्यान देने तथा चौहान साहब पर लगाए गए केस को वापस लेने और मामले की जांच सीआईडी को सौंपने की मांग की गई। ज्ञापन देने वालों में सूबेदार सब इंस्पेक्टर्स बैच 83-84 के रिटायर्ड ऑफिसर एवं अनेक सेवानिवृत्त आईपीएस शामिल हैं।
प्रदेश के हर प्रमुख शहर में इस आशय के ज्ञापन सौंपे गए हैं।
इस पोस्ट में संलग्न तस्वीर में हमारी पत्रकारिता के जमाने के तीन टीआई दिख रहे हैं जिनमें सफेद कोट पहने भारत सिंह चौहान, मध्य में थोड़ा हंसते हुए हेमंत शर्मा एवं कुछ कहते हुए विपिन सिंह दृष्टव्य हैं।
वह भी क्या जमाना था।
पुलिस का; टीआइयों का कितना गरिमा पूर्ण स्तर था !
