पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – यह सम्पूर्ण जगत एक ही परमात्मा की विविध रूपों में अभिव्यक्ति है। भारतीय संस्कृति में अंतर्निहित समानता व सह-अस्तित्त्व के दिव्य उदारवादी मूल्यों का लोक व्यापीकरण कर वैश्विकस्तर पर आर्थिक असमानता को कम किया जा सकता है। आइये ! उदारमना होकर अन्यों के सम्मान, स्वाभिमान और निजता की रक्षा करें।प्रत्येक मनुष्य को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के वैधानिक अधिकार प्राप्त है। “विश्व सामाजिक न्याय दिवस” की हार्दिक शुभकामनाएँ ..! जब हम अन्य की सेवा करेंगे तो अन्तःकरण में स्वयं के प्रति सम्मान व संतुष्टि का भाव जागृत होगा, जिससे हम भावनात्मक रूप से सशक्त व दृढ़ रहेंगे। यदि आर्थिक रूप से कुछ देने में असमर्थ हैं, तो उन्हें अपने विचार व व्यवहार के द्वार आनन्दित तो किया ही जा सकता है। अन्य के अधिकार, सम्मान, स्वाभिमान, स्वायत्तता और संवेदनाओं की रक्षा करना ही परमार्थ है। देव-कृपा, ईश्वरीय-अनुग्रह और सन्त-आशीष वहाँ फलीभूत होने लगते हैं – जहाँ परमार्थ है। अतः अंतःकरण में पारमार्थिक भाव सहेज कर रखें। परमार्थ ही आनन्द साम्राज्य की कुन्जी है। दूसरों से सम्मान पाना है तो सम्मान देना सीखें। सम्मान एक ऐसी चीज है, जो पहले हमें दूसरों को देनी होती है और बाद में हमें मिलती है। सम्मान उपहार में नहीं मिलता। इसे कमाया जाता है। यदि हम सम्मान चाहते हैं तो हमें दूसरों को सम्मान देना होगा। दूसरों के सम्मान-स्वाभिमान और अधिकारों की रक्षा करना सीखें, यही अध्यात्म का पहला पाठ है। ‘धन्यवाद’ और ‘क्षमा’ जैसे शब्दों का प्रयोग अधिक से अधिक करें और अपनी भाव-भंगिमा व बोलने के ढंग में विनम्रता लायें। आप जितना ज्यादा विनम्र होंगे, लोग आपका उतना ही सम्मान करेंगे। इस संसार की हर चीजें आपसे जुड़ी हुई है। वस्तुओं से ज्यादा सम्बन्धों को महत्त्व दें, क्योंकि वो आपके जीवन में कहीं अधिक मूल्य रखते हैं। सुख, शान्ति और प्रेम दूसरों को देने पर ही प्राप्त होता है। दूसरों के प्रति दया, करुणा, सद्भावना रखने से ही हमें चिरस्थायी प्रसन्नता की प्राप्ति होगी। हम जैसी दूसरों के प्रति भावना प्रकट करते हैं, लौटकर वही हमें प्राप्त होती है। यदि हम अपने जीवन को सुखी बनाना चाहते हैं तो पहले अपने से ही प्रारम्भ करना होगा। सम्मान व आदर चाहते हैं तो दूसरों को भी सम्मान व आदर देना होगा। जैसे हम होंगे वहीं तो हमें दर्पण में दिखाई देगा। अतः आप जो करते हैं वही चीज कई गुना होकर आपके ही पास आती है …।
पूज्य “प्रभुश्री जी” ने कहा – भक्ति मार्ग में ‘लोभ’ बाधक है। लोभ से भक्ति का नाश होता है। ज्ञान मार्ग में ‘क्रोध’ बाधक है। क्रोध से ज्ञान नष्ट हो जाता है। अंतःकरण को मलिन करने वाली स्वार्थ व संकीर्णता की सब क्षुद्र भावनाओं से हम सभी ऊपर उठें। स्थिर व शान्त अन्तःकरण में यथार्थ का बोध होता है। आदर-सत्कार को भारतीय संस्कृति में अधिक महत्व दिया गया है। प्रकृति का नियम है कि हर क्रिया की उसी अनुपात में प्रतिक्रिया होती है। यदि हम दूसरों को आदर देते हैं तो हमें भी आदर मिलेगा। मनुष्य आदर के प्रति अत्यधिक आसक्त होता है। वह सदैव आदर चाहता है। इसका कारण यह है कि उसके भीतर ईश्वर का अंश है। इसी कारण उसे स्वयं के लिए आदर-सम्मान की इच्छा जागृत होती है, इसलिए यदि आप आदर चाहते हैं तो आदर बोइए; क्योंकि आदरणीय वही होते हैं, जो दूसरों को आदर देते हैं। “पूज्य प्रभुश्री जी” कहा करते हैं कि बड़ों का आदर करने से यश, बुद्धि, विद्या और आयुष में वृद्धि होती है। भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण ने भी जब पृथ्वी पर अपनी लीलाएँ दिखाई तो उसमें भी उन्होंने सभी को एक-दूसरे का आदर करने की सीख दी है। महापुरुषों का जीवन-दर्शन हमें शिष्टाचार, सदाचार और अनुशासन का पाठ पढ़ाता है। हम अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी जीते हैं। अतः अपने लिए जीना स्वार्थयुक्त जीवन जीना होता है, जबकि दूसरों के लिए जीना परमार्थ युक्त-जीवन होगा। पूज्य “प्रभुश्री जी” ने कहा की अध्यात्म विद्या से परम सत्य का बोध ही विश्व में मानवीय एकता स्थापित कर सकता है जिससे संसार के समस्त समस्याओं का समाधान सम्भव है। भारतीय मूल चिन्तन सबके कल्याण का है। हमारे यहाँ दूसरों के लिये त्याग को आनन्द से जोड़ा है। जो दूसरों को आनन्द दे वही धर्म है। सुख तात्कालिक होते हैं, जबकि आनन्द स्थायी होता है। अपने आप में ऐसी कला विकसित करें कि दूसरों के मन की बात को समझें और अपने वचनों से दूसरों का मन जीतें। मानव-जीवन का यह परम कर्तव्य है कि हम श्रेष्ठता की ओर बढ़ें, सदमार्ग अपनाएँ और दूसरों को इस मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करें। शास्त्रों में भी यही कहा गया है कि बड़ों के प्रति आदर-सत्कार का पवित्र भाव रखें। इसका आध्यात्मिक महत्व यह है कि इससे जीवन का सर्वांगीण विकास होता है। धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति के परम साधन यही हैं। इसमें जीवन के सारे सद्गुण का सार समाहित है। दया, क्षमा, करुणा, सहनशीलता, परोपकार, अहिंसा, सत्य, प्रेम और सौहार्द आदि गुणों के ये प्रेरणा स्रोत कहे गए हैं। इसलिए सभी प्राणियों के सम्मान, स्वाभिमान और अधिकारों की रक्षा कीजिए; यही परमार्थ है। अतः परोपकार की प्रवृत्ति को अपनाकर हम एक प्रकार से ईश्वर की रची सृष्टि की सेवा करते हैं और ऐसा करने से हमें आत्म-संतोष एवं ईश्वरीय-अनुग्रह की अनुभूति होने लगती है …।