जंसम्पर्क में टीवी चैनल विज्ञापन और नियम की धज्जियां ?

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जंसम्पर्क गाथा

जंसम्पर्क में टीवी चैनल विज्ञापन और नियम की धज्जियां ?

विभाग कोई भी हो, नाम चाहे जितना पवित्र क्यों न हो, लेकिन राजनीति और कमीशनखोरी की बीमारी ऐसी है जो किसी को नहीं छोड़ती। फर्क बस इतना है कि कहीं यह बीमारी दबे पांव चलती है और कहीं पूरे तामझाम के साथ सरकारी विज्ञापन की शक्ल में सामने आती है। जनसम्पर्क विभाग आज उसी बीमारी का उन्नत संस्करण बन चुका है, जहां नियम लिखे तो गए हैं, लेकिन सिर्फ इसलिए कि जरूरत पड़ने पर किसी को डराया या रोका जा सके।

सूत्रों के अनुसार नियम बिल्कुल स्पष्ट है। अगर कोई कंपनी अपने अलग–अलग नामों से प्रकाशन या प्रसारण करती है, लेकिन कंपनी मूल रूप से एक ही है, तो राज्य शासन द्वारा दिया जाने वाला विज्ञापन केवल किसी एक प्रकाशन या एक प्रसारण को ही दिया जा सकता है। यह नियम इसलिए बनाया गया था ताकि सरकारी धन का दुरुपयोग न हो और बड़े मीडिया समूह अपने ही अलग–अलग नामों से पूरी विज्ञापन राशि न समेट लें। लेकिन यह नियम सिर्फ कागजों तक सीमित होकर रह गया है।

जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। अगर आप जरा भी छानबीन करेंगे, तो पाएंगे कि अडाणी, अम्बानी समेत तथाकथित “मोदी मीडिया” से जुड़ी कंपनियों के हर प्रकाशन और हर प्रसारण पर सरकारी विज्ञापनों की रेवड़ी बंट रही है। एक कंपनी, कई नाम, कई चैनल और हर चैनल पर विज्ञापन मानो नियम इनके लिए बने ही न हों। नियम छोटे और असहज सवाल पूछने वालों के लिए हैं, बड़े और सत्ता–अनुकूल मीडिया के लिए नहीं।

सूत्र यह भी बताते हैं कि एक समय ऐसा था जब अधिकारी नियमों के अनुसार चलने की कोशिश कर रहे थे। फाइलों में आपत्तियां लगती थीं, जांच की बात होती थी और नियमों का हवाला दिया जाता था। लेकिन सत्ता परिवर्तन ने सब कुछ परिवर्तित कर दिया। जो नियम पहले तलवार बने हुए थे, वे अब तख्त पर रख दिए गए हैं। अधिकारी वही हैं, फाइलें वही हैं, लेकिन अब नियमों की आत्मा बदल चुकी है।

राज्य पर कर्ज बढ़ता जा रहा है। सरकार खुद मानती है कि आर्थिक स्थिति चिंताजनक है। लेकिन जनसम्पर्क विभाग की विज्ञापन नीति पर इसका कोई असर नहीं दिखता। यहां रेवड़ी में कमी नहीं आई है, बल्कि बढ़ोतरी ही हो रही है। सवाल यह है कि जब कर्ज बढ़ रहा है, तब विज्ञापन किस आधार पर बढ़ रहे हैं? क्या यह जनहित है या सत्ता के प्रति निष्ठा का इनाम?

कई टीवी चैनल आज भी कतार में खड़े हैं। उन्हें भरोसा दिलाया जाता है कि “आपका नंबर आएगा।” उन्हें उम्मीद दी जाती है कि थोड़ा सब्र रखिए, आपको भी चना–चिरौंजी मिल जाएगी। लेकिन जब वे नियमों की बात करते हैं, तो अधिकारियों द्वारा ऐसा नियम–मंत्र फूंका जाता है कि उनकी आंखें नियम पढ़ते–पढ़ते थक जाएं। और अगर वे दोनों तरफ देखने की कोशिश करें यानी नियम भी देखें और हकीकत भी तो उनकी आंखें लाल हो जाती हैं।

फिर उन्हें समझाया जाता है कि इस सिस्टम में आंखें खोलकर नहीं, बल्कि आंखों में काजल लगाकर चला जाता है। घी का दीपक जलाइए, गणेश जी की कृपा से तैयार किया गया काजल आंखों में लगाइए और किसी न किसी खेमे में शामिल हो जाइए। क्योंकि बिना खेमेबाजी के इस जनसम्पर्क तंत्र में कृपा नहीं बरसती। जो खेमे में है, वही खेल में है।

विडंबना यह है कि छोटे मीडिया संस्थानों को कमेटी का पाठ पढ़ाया जाता है। उनसे कहा जाता है कि तीन लोगों की कमेटी बनेगी, उसमें पास होंगे, तब जाकर विज्ञापन मिलेगा। लेकिन यह कमेटी सिर्फ प्रिंट मीडिया के लिए बनाई गई है। टीवी मीडिया के लिए कोई कमेटी नहीं, कोई जांच नहीं आयुक्त जनसम्पर्क का आदेश ही पर्याप्त है। यह दोहरा मापदंड साफ दिखाता है कि नियम समान नहीं हैं, सिर्फ दिखावे के लिए हैं।

कई महीनों से यह खेल निरंतर चल रहा है। आयुक्त द्वारा फाइल पास होने के बाद भी विज्ञापन जारी नहीं किए जाते। जानबूझकर तकनीकी आपत्तियां लगाई जाती हैं, नए–नए नियम खोजे जाते हैं और प्रक्रिया को इतना उलझा दिया जाता है कि सामने वाला थककर चुप हो जाए। यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं लगती, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है।

नियम नंबर एक साफ कहता है कि एक ही परिवार या संस्था के एक से अधिक प्रकाशनों में से केवल एक को ही विज्ञापन दिया जा सकता है। नियम नंबर दो स्थानीय चैनलों की बात करता है। नियम नंबर तीन डीएवीपी दरों को सीमा में रखता है। नियम नंबर चार और पांच सजीव प्रसारण और विज्ञापन आवृत्ति को नियंत्रित करने की बात करते हैं। लेकिन इन नियमों का पालन सिर्फ वहीं होता है, जहां सत्ता की सहमति नहीं होती।

जनसम्पर्क विभाग का मूल उद्देश्य सरकार की योजनाओं और निर्णयों को जनता तक पहुंचाना था। लेकिन आज यह विभाग सत्ता के लिए पुरस्कार वितरण प्रणाली बन चुका है। जो चैनल सत्ता के सुर में सुर मिलाते हैं, उन्हें विज्ञापन की मलाई मिलती है। जो सवाल पूछते हैं, उन्हें नियमों का डंडा दिखाया जाता है।

यह गाथा सिर्फ विज्ञापनों की नहीं है। यह सत्ता, पूंजी और मीडिया के गठजोड़ की कहानी है। यह उस लोकतंत्र की कहानी है, जहां सूचना का अधिकार धीरे–धीरे विज्ञापन के अधिकार में बदलता जा रहा है। और जहां नियम जनता के लिए होते हैं, सत्ता के लिए नहीं।

क्रमशः जारी…

क्योंकि यह कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। अगले हिस्से में एक ऐसा बड़ा खुलासा, जो बताएगा कि जनसम्पर्क सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि सत्ता का सबसे प्रभावी हथियार कैसे बन चुका है।

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