सिर उठाने पर थप्पड़, 24 घंटे एक सी ड्रेस

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कृपया कोई भी दीवार पर कुछ न लिखे। सम्मान सबका है, चाहे सीनियर हो या जूनियर। सौजन्य से बांडा सर…

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सागर के बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल में दाखिल होते ही पहला मैसेज यही मिलेगा। ऐसा क्यों लिखा है… यह पूछने की भी जरूरत नहीं पड़ती। आगे बढ़ने पर लगभग सभी दरवाजों और दीवारों पर तरह-तरह की पंक्तियां लिखी हुई हैं। जिनकी शब्दावली इतनी असामाजिक है कि खबर में लिखना संभव नहीं है।

दरअसल, पिछली रिपोर्ट में हमने मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के स्तर को उजागर किया था। इसके बाद दैनिक भास्कर ने जानने का प्रयास किया कि मेडिकल स्टूडेंट्स किन हालात में रहते हैं?

हम सागर के बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल पहुंचे। यहां कई अव्यवस्थाएं मिलीं। जूनियर्स न केवल हॉस्टल में बल्कि बाहर भी सीनियर्स के बनाए रूल्स फॉलो करते देखे जाते हैं। उन्हें 24 घंटे एक ही ड्रेस में रहना पड़ता है। पहले 6 महीने थर्ड बटन पर नजर रखते हुए चलना अनिवार्य है।

सिर उठाने या सीनियर्स के दिए टास्क में गलती होने पर 100-100 थप्पड़ आम बात है। हॉस्टल में गंदगी और अव्यवस्थाओं का आलम ऐसा है कि जिन थालियों में छात्र खाना खाते हैं, उनमें ही आवारा कुत्ते बचा हुआ खाना खाते दिख जाएंगे। पढ़िए, रिपोर्ट…

फर्स्ट ईयर स्टूडेंट्स को हमेशा थर्ड बटन रूल फॉलो करना पड़ता है।
फर्स्ट ईयर स्टूडेंट्स को हमेशा थर्ड बटन रूल फॉलो करना पड़ता है।

सीनियर्स कहीं भी मिलें, विश करना जरूरी मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल में नए स्टूडेंट्स से कैसा व्यवहार होता है, यह जानने के लिए हमने एक मेडिकल स्टूडेंट से बात की। वह पहचान छुपाने की शर्त पर सबकुछ बयान करने के लिए तैयार हो गया।

उसने बताया- फर्स्ट ईयर स्टूडेंट्स को शुरूआती 6 महीने सिर नीचे कर थर्ड बटन रूल फॉलो करके रहना पड़ता है यानी निगाहें शर्ट के तीसरे बटन या जूते पर ही रहनी चाहिए। यदि सीनियर कहीं भी नजर आएं तो उन्हें विश करना पड़ता है। इन 6 माह में हमेशा एक तरह की ड्रेस पहननी होती है।

बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में हॉस्टल के अंदर कपड़े नहीं बदल सकते हैं। कई बार सीनियर्स बुलाकर उन्हें रात-रात भर लाइन में खड़ा रखते हैं। यह स्थिति तब बनती है, जब सीनियर्स शराब के नशे में होते हैं। वे अपने मनोरंजन के लिए जूनियर्स को सुबह के 4 से 5 बजे तक खड़ा करते हैं।

इस दौरान उनसे तरह-तरह की गतिविधि कराई जाती हैं। यदि किसी जूनियर ने कोई गलती कर दी या किसी बात का सही जबाव नहीं दिया तो उन्हें मारा जाता है। कई स्टूडेंट्स को 100 से अधिक चांटे पड़ते हैं।

गलती किसी और की भी होने पर मार सबको पड़ती है। इससे यह मैसेज दिया जाता है कि आपके बैच में कोई एक गलती करेगा तो मार सबको पड़ेगी। इसके बाद जूनियर्स बिना सोए अगले दिन कॉलेज भी जाते हैं। कई बार ऐसा भी हुआ कि कान के परदे तक में गहरी चोट आईं। लेकिन, यह केस रिपोर्ट नहीं होते हैं। मेडिकल कॉलेजों के हॉस्टल में यह एक परंपरा बन चुकी है।

नए स्टूडेंट्स को 32 से 36 घंटे तक की ड्यूटी करनी पड़ती है।
नए स्टूडेंट्स को 32 से 36 घंटे तक की ड्यूटी करनी पड़ती है।

करनी पड़ रही 32 से 36 घंटे तक की ड्यूटी मेडिकल स्टूडेंट के अनुसार, जूनियर डॉक्टर को हमेशा लेबर की तरह पुश किया जाता है। उसको 32 से 36 घंटे की लगातार ड्यूटी करनी पड़ती है। इस ड्यूटी के दौरान जो समस्याएं आती हैं, उनका सामना भी उसे ही करना पड़ता है।

फिर चाहे वो अटेंडर का गुस्सा हो या मेडिकल पेशे से जुड़ी कोई समस्या हो। जो ऑन फ्लोर कंसल्टेंट होते हैं, वे ओपीडी टाइम के बाद अस्पताल से चले जाते हैं। कोई गंभीर स्थिति बनने पर जो रिपोर्ट तैयार होती है, उसमें भी जूनियर्स पर सब कुछ डाल दिया जाता है। मरीज की मौत की स्थिति में सीनियर फैकल्टी पहुंचती ही नहीं है।

वॉशरूम इतने गंदे कि पीरियड्स में काम मुश्किल बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज की तीसरे साल की एक पीजी स्टूडेंट ने बताया कि वॉशरूम की स्थिति हमारी समस्या को और बढ़ा देती है। वॉशरूम इतने गंदे हैं कि हमारे पास कोई विकल्प हो तो हम उन्हें कभी यूज न करें। जो वॉशरूम हैं, वो न केवल पीजी स्टूडेंट्स बल्कि नर्सिंग स्टाफ से लेकर गार्ड और अन्य कर्मचारी तक इस्तेमाल करते हैं।

इतने सारे स्टाफ पर एक वॉशरूम होने के कारण वो इतना गंदा रहता है कि यहां अक्सर इन्फेक्शन का खतरा बना रहता है। फीमेल पीजी स्टूडेंट्स 36 घंटे लगातार ड्यूटी करती हैं। वो अगर पीरियड्स में हैं तो यह समस्या कितनी बड़ी हो जाती है, यह बताना भी मुश्किल है।

इस स्थिति की वजह से त्वचा के संक्रमण, एलर्जी के साथ पेट से जुड़ी बीमारियां जैसे दस्त और फूड पॉइजनिंग का खतरा बना रहता है। इनके अलावा यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) और टाइफाइड या हैपेटाइटिस ए जैसे गंभीर बैक्टीरियल और वायरल संक्रमण होने का भी खतरा बना रहता है।

हॉस्टल के गलियारे में इस तरह कुत्तों का जमावड़ा रहता है।
हॉस्टल के गलियारे में इस तरह कुत्तों का जमावड़ा रहता है।

इस स्थिति में रह रहे मेडिकल स्टूडेंट्स

  • हॉस्टल की थाली में कुत्ते भी खाते हैं खाना : बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल में गेट से लेकर छत तक हर जगह कुत्ते नजर आते हैं। नए मेडिकल स्टूडेंट्स को इनसे बचकर रहना पड़ता है। शुरुआत में यह उन्हें बाहरी समझ पर उन पर भौंकने भी लगते हैं। हॉस्टल में रहने वाले सीनियर्स अपने कमरे में जूनियर्स से खाना मंगाते हैं। इसके बाद थाली कमरे के बाहर रख देते हैं। जिसमें बचा हुआ खाना वहां मौजूद कुत्ते खाते हैं। बाद में इन्हीं थाली को धोकर मेस में इस्तेमाल किया जाता है।
  • अस्पताल में वॉशरूम की स्थिति खराब : बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज का अस्पताल हो या सतना मेडिकल कॉलेज से संबंध डिस्ट्रिक्ट अस्पताल, दोनों ही जगह वॉशरूम की स्थिति बेहद खराब है। वॉश बेसिन में पानी जमा है। हर तरफ गंदगी है। ऐसी स्थिति है कि इस्तेमाल तक न किए जा सकें। इसके अलावा हॉस्टल में भी चारों ओर सिर्फ गंदगी नजर आती है।
  • कमरे के सामने ही लगा मधुमक्खी का छत्ता : बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के बॉयज हॉस्टल की तीसरी मंजिल पर रूम के सामने ही मधुमक्खी का छत्ता लगा हुआ है। स्टूडेंट बताते हैं कि हमेशा डर लगा रहता है कि यदि यह किसी गलती से टूट गया तो बचना मुश्किल हो जाएगा।
  • अक्सर लिफ्ट में बंद हो जाते हैं स्टूडेंट्स : सतना मेडिकल कॉलेज का इन्फ्रास्ट्रक्चर तो बढ़िया है। लेकिन, यहां बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। अक्सर बिजली चली जाती है। पानी का सप्लाई रुक जाती है। क्लास से पहले ब्रश के लिए भी कॉलेज के गेट के सामने मौजूद दुकान में जाना पड़ता है। जहां लगे नल से वे ब्रश और मुंह धोकर क्लास जाते हैं। यही नहीं, अचानक पावर कट होने पर बच्चे कई बार हॉस्टल की लिफ्ट में फंस जाते हैं।

कॉलेजों में टॉक्सिक माहौल, मिली थी मास सुसाइड की धमकी 2 साल पहले भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज के 300 से ज्यादा छात्रों ने कॉलेज में टॉक्सिक माहौल की बात कर मास सुसाइड की धमकी दी थी। अब फाइमा के सर्वे में भी यह बात सामने आई है। सर्वे के मुताबिक, छात्रों का मानना है कि 40 फीसदी कॉलेजों में टॉक्सिक माहौल है।

सीनियर्स, टीचर्स का व्यवहार, काम के घंटे तय न होने से उनके मानसिक और शारीरिक स्तर पर नकारात्मक असर पड़ता है। 71.5 फीसदी छात्रों का कहना है कि उनके काम के घंटे निश्चित नहीं हैं। यानी कई बार वे लगातार 36-36 घंटे तक काम करते हैं।

सर्वे में ये भी सामने आया है कि कॉलेजों में 55.2 फीसदी मेडिकल स्टाफ की कमी है, जिसका असर शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ता है। सर्वे के मुताबिक, प्राइवेट कॉलेजों में रूटीन एजुकेशन और फैकल्टी संख्या सरकारी से बेहतर है।

सुसाइड करने वालों में मेडिकल की छात्राएं ज्यादा दूसरी ओर, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की रिपोर्ट कहती है कि देश के 80 फीसदी डॉक्टर मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। सुसाइड करने वालों में मेडिकल की छात्राएं ज्यादा हैं। इनकी उम्र काफी कम थी। वहीं, जिन लड़कों ने सुसाइड किया, उनकी उम्र लड़कियों से ज्यादा थी। यही नहीं, साल 2023 में गांधी मेडिकल कॉलेज में जो दो आत्महत्या हुईं वे दोनों छात्राएं थीं। दोनों ने दवाओं का ओवरडोज लिया था।

हर स्टूडेंट की प्रति माह काउंसलिंग हो जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन, मध्य प्रदेश के अध्यक्ष डॉ. कुलदीप गुप्ता के अनुसार हर मेडिकल कॉलेज में प्रॉपर काउंसलिंग सेल होना चाहिए। हर बच्चे की एक माह में एक बार काउंसलिंग जरूर हो।

इससे जो लोग सही में मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं, वे बिना समाज की पहचान में आए इलाज ले सकें। साथ ही काउंसलिंग सेल स्टूडेंट की समस्याओं को सुनकर कॉलेज प्रबंधन को जरूरी सुधार के सुझाव भी दे सकती है।

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