वन विभाग कहता है- 15 लाख लो और निकलो
15 लाख लो और यहां से निकल जाओ। गांव में जमीन, घर-गृहस्थी सब कुछ है। 15 लाख में कहीं प्लॉट नहीं मिल रहा है। ऐसे में मकान कैसे बनाएंगे और गृहस्थी कैसे चलाएंगे? परिवार का पालन-पोषण करना भी मुश्किल होगा।

यह दर्द है वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व के विस्थापित ग्राम मुहली में रहने वाले लोगों का। वे कहते हैं कि हमारा गांव जंगल के बीच वर्षों से बसा है। अब वन विभाग हम लोगों से कह रहा है कि गांव छोड़कर चले जाओ। यहां जानवर रहेंगे। वर्षों की मेहनत कर गृहस्थी बनाई। जमीन-जायदाद खड़ी की।
वो न तो जमीन का पैसा दे रहे हैं और न मकान का। सिर्फ 15 लाख देने का बोल रहे हैं। इतने मुआवजे में कुछ नहीं होने वाला। बसी बसाई गृहस्थी छीनकर कमजोर किया जा रहा है। शासन मुआवजा राशि बढ़ाए, ताकि विस्थापित होकर जीवन यापन कर सकें। वरना हम लोग तो यहीं पड़े हैं, जो होगा अब आगे देखा जाएगा।
भास्कर टीम मुहली गांव पहुंची और उनसे बातचीत की। पढ़िए रिपोर्ट…

एक नजर में विस्थापित मुहली गांव
- सागर जिला मुख्यालय से 65 किलोमीटर दूर मुहली गांव
- वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व के बफर जोन में स्थित
- लगभग 3500 जनसंख्या
- 2500 मतदाता
- टाइगर रिजर्व की विस्थापन प्रक्रिया में सबसे बड़ा गांव
मुहली गांव में सन्नाटा, बोर्ड लगे- जानवरों से सावधान मुहली गांव रहली-जबलपुर मार्ग पर जंगल के बीच बसा हुआ है। गांव से करीब 10 किमी पहले वन विभाग का नाका बना है, जहां पर आने-जाने वाली गाड़ियों की निगरानी की जाती है। नाके से मुहली गांव तक सिंगल पट्टी रोड है। जिस पर जगह-जगह ब्रेकर बने हैं। वन विभाग ने रास्ते में वन्य जीवों से सावधान और गंदगी नहीं फैलाने जैसे सूचना बोर्ड लगा रखे हैं।
हमने गांव में प्रवेश किया तो एकदम से सन्नाटा पसरा था। आगे बढ़े तो चाय की दुकान पर चार लोग बैठे थे। गाड़ी रोकी और उनसे बात की। जैसे ही विस्थापन की बात की तो वह दुकान से बाहर आए और आवाज देकर गांव के अन्य लोगों को बुलाने लगे। आवाज सुन वहां ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई। जिसके बाद उन्होंने विस्थापन का दर्द बताया।
यहां से गए तो जिंदगी में 6 एकड़ जमीन नहीं खरीद पाएंगे ग्रामीण नन्नू यादव कहते हैं कि विस्थापन से बहुत दिक्कत है। गांव छोड़ने के नाम पर 15 लाख दे रहे हैं। इतने पैसों में तो धना-मिर्च नहीं मिल रहा। हमारी 6 एकड़ जमीन है। यहां से गए तो जिंदगी में यह 6 एकड़ जमीन नहीं खरीद पाएंगे। जब से गांव बसा है मेरा परिवार यहां रह रहा है। करीब 10 पीढ़ियों की मेहनत के बाद गृहस्थी बनाई है। बचपन यहीं बीता है और बुढ़ापे में भी यहीं रहेंगे। नन्नू कहते हैं-
हमें यहां से हटाना है तो 50 लाख रुपए मुआवजा दें। वर्ना हम कहीं नहीं जाने वाले। जानवर क्या करेगा, खा जाएगा और क्या? वन विभाग करे, उनकी व्यवस्था। हम कहीं नहीं जाने वाले।

15 लाख का मुआवजा उन्हें भी जिनके पास कुछ नहीं गांव के भभूत सिंह परिहार ने कहा- विस्थापन में हम बर्बाद हो रहे हैं। हमारी 20 एकड़ जमीन है। जिनके पास घर-गृहस्थी सब कुछ है, उन्हें भी 15 लाख और जिनके पास कुछ नहीं है उन्हें भी इतना ही मुआवजा दिया जा रहा है। यह मुआवजा राशि परिवार के वयस्क सदस्यों को मिल रही है। यदि परिवार में गैर वयस्क सदस्य हैं तो उन्हें कोई मुआवजा नहीं दिया जाएगा।
आवास, कुटीर निर्माण पर रोक, सड़कों पर फैला कीचड़ ग्रामीणों से बात कर भास्कर की टीम ने गांव की गलियों का जायजा लिया। बारिश के कारण रास्ते में जगह-जगह कीचड़ है। नालियां बनी नहीं हैं। पंचायत भवन भी जर्जर हालत में है। कुछ ही दूरी पर शासकीय स्कूल है। आधा स्कूल आज भी खप्पर वाला है। गेट पर गंदगी फैली है। बच्चे खस्ताहाल भवन में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। ग्रामीण बिहारी लाल रजक ने बताया-
विस्थापन की प्रक्रिया शुरू होने के बाद से सरकारी फायदा मिलना बंद हो गया। कुटीर स्वीकृत नहीं हो रहे, रोड बन नहीं रही है। पंचायत चुनाव हुए और सभी ने वोट डालकर सरपंच चुना, लेकिन विस्थापन के कारण शासन की योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है।


सरपंच बोले- विकास कार्यों पर रोक लगा दी गई भास्कर टीम ने गांव के सरपंच संजीव सिंह लोधी से मुलाकात की। उनसे विस्थापन और गांव के हालात को लेकर बात की। सरपंच ने कहा कि गांव में विस्थापन की प्रक्रिया चल रही है। जिस कारण से विकास कार्यों पर रोक लगा दी गई है। गांव के लोगों को आवास योजना का लाभ नहीं मिल रहा है।
रोड स्वीकृत नहीं हो रहीं। प्रस्ताव बनाकर भेजते हैं,लेकिन पास नहीं होते। विकास काम पूरी तरह से बंद हैं। सिर्फ जल संवर्धन के कार्य हो रहे हैं। वहीं विस्थापन में हर परिवार को 15 लाख रुपए मुआवजा दिया जा रहा है। इतनी राशि में व्यक्ति घर बनाएगा या धंधा करेगा या जमीन खरीदेगा। सरपंच का कहना है-
आसपास के क्षेत्रों में लगी एक एकड़ जमीन की कीमत 25-30 लाख रुपए है। ऐसे में शासन और सरकार को मुआवजे की ऐसी राशि विस्थापित व्यक्तियों को देना चाहिए, जिससे वह आर्थिक रूप से मजबूत हो सकें और परिवार पाल सकें।


टाइगर रिजर्व में 2014 से चल रही विस्थापन प्रक्रिया टाइगर रिजर्व पहले नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य हुआ करता था। साल 2014 में यहां कोर एरिया में बसे गांवों के विस्थापन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी, लेकिन अभी विस्थापन का काम अधूरा पड़ा है। कोर एरिया में 93 गांव हैं, जिनमें से अब तक करीब 42 गांवों का विस्थापन हो चुका है। इसमें करीब 600 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं।
हालांकि विस्थापन की प्रक्रिया अलग-अलग जिलों सागर, दमोह और नरसिंहपुर में चल रही है। 51 गांवों का विस्थापन होना अब भी बाकी है। दमोह जिले में अब तक 9 गांवों का विस्थापन हो चुका है। जबकि नरसिंहपुर में 4 और सबसे ज्यादा सागर में 29 गांवों का विस्थापन किया जा चुका है। इस वित्तीय वर्ष में करीब 7 गांवों का विस्थापन होने की संभावना है।

2023 में मिला था अभयारण्य को टाइगर रिजर्व का दर्जा वर्ष 1975 में स्थापित नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य को 20 सितंबर 2023 में टाइगर रिजर्व का दर्जा दिया गया था। इसका नाम बदलकर वीरांगना रानी दुर्गावती टाइगर रिजर्व रखा गया था।
नौरादेही वन्यजीव अभयारण्य का क्षेत्रफल 1197 वर्ग किमी था। टाइगर रिजर्व का दर्जा मिलने के बाद इसका क्षेत्रफल 2339 वर्ग किमी हो गया है। इसमें 1414 वर्ग किमी कोर एरिया और 925.12 वर्ग किमी बफर एरिया है।
900 लोगों ने भरे विस्थापन फॉर्म, जल्द कार्रवाई शुरू होगी वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर एए अंसारी ने बताया कि स्वैच्छिक ग्राम विस्थापन किया जा रहा है। मुहली गांव में करीब 900 लोगों ने विस्थापन के लिए फॉर्म भर दिया है। शासन के नियमानुसार हर परिवार को 15 लाख रुपए का मुआवजा दिया जा रहा है। गांव को विस्थापित करने से पहले ग्राम पंचायत से सहमति पत्र भी लिया जा रहा है। अंसारी के मुताबिक-
सहमति पत्र मिलने पर शासन को भेजकर राशि स्वीकृति के बाद मुहली गांव का विस्थापन होगा। किसी पर दबाव नहीं है। अब तक 42 गांवों का विस्थापन हो चुका है। 7 गांवों की तैयारी पूरी है। जल्द कार्रवाई पूरी कर ली जाएगी।

