अनुसूचित समाज के तपस्वी, ज्ञानवान साधुओं को भी महामंडलेश्वर की उपाधि

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जूना अखाड़े की अनूठी पहल
अनुसूचित समाज के तपस्वी, ज्ञानवान साधुओं को भी महामंडलेश्वर की उपाधि

जूना अखाडा देश के बड़े अखाड़ों में से है। इसके पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज है। जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर तपस्वी है, गहरा अध्यन करते है और समाज में अपने पुरुषार्थ से सद्गुण, समरसता और संगठन के लिए समर्पित है।

आज 30 अप्रैल को जूना अखाड़ा द्वारा चार पूज्य संतों को महामंडलेश्वर पद का पट्टाभिषेक कराया जायेगा। यह सभी अनुसूचित जाति व जनजाति समाज से आते है। अभी तक जूना अखाड़ा द्वारा अनेक अनुसूचित जाति के संतों, 52 आदिवासी समाज और यहाँ तक की किन्नर समाज से भी महामंडलेवशर बनाये गए है। जिनको समाज में हेय दृष्टी से देखा जाता था उनका अब सम्मान और आदर होता है।

विदित है कि 11 मई 2016 में श्री अमित शाह जी ने ऊज्जैन सिंहस्थ पर्व के अवसर पर सामूहिक समरसता स्नान सभी वर्गों के साधु संतों के साथ किया था और पत्रिका “चरैवेति” द्वारा आयोजित सिंहस्थ शिविर दीनदयाल पुरम में साधु संतों के साथ सामूहिक भोजन किया था। उसी दिन जूना अखाड़ा के पीठाधीश्वर श्रद्धेय अवधेशानंद महाराज जी ने प्रेस वार्ता कर घोषणा की थी कि सभी समाज के साधु संत जो सनातन धर्म के शास्त्रों में पारंगत होंगे उन्हें जूना अखाड़ा में महामंडलेश्वर की पदवी दी जाएगी।

यह भी जान ले कि महामंडलेश्वर का पद प्राप्त करने के लिए जूना अखाड़े में पांच वर्षों तक सनातन धर्म के ग्रंथो का गहन अध्ययन, साधुत्व जीवन और परीक्षा पास करनी होती है। इसके बाद ही महामंडलेश्वर की उपाधि प्राप्त हो पाती है।

जूना अखाडा को पुरानी चली आ रही लकीर को तोडना आसान नहीं रहा होगा। उन्होंने यह दृढ़ता से स्थापित किया है कि महामंडलेश्वर पद के लिए जाति कोई बाधा नहीं है। केवल तप और अध्यन ही एकमात्र मापदंड है और समाज के सब वर्गों के लोग इसमें सम्मलित हो सकते है। अखाड़े ने यह साबित किया है कि पद जाति से नहीं, योग्यता के आधार पर मिलना चाहिए। और इसी का परिणाम है कि जूना अखाडा समाज में समरसता और श्रेष्ठ संस्कारो के लिए बड़ा और उपयोगी कार्य कर रहा है।

हमारा विनम्र प्रणाम।
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#संजय_गोविंद_खोचे

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