मोदी बोले- कांग्रेस आपका मंगलसूत्र भी नहीं छोड़ेगी; कानून क्या है, सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा

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‘मेरी माताओ और बहनो, वे आपके मंगलसूत्र को भी नहीं छोड़ेंगे। कांग्रेस का घोषणापत्र कहता है कि वे आपके सोने के बारे में जानकारी करेंगे, और फिर उसे बांट देंगे। वो किसे बाटेंगे? मनमोहन सिंह की सरकार ने कहा था कि देश की संपत्ति पर पहला हक मुसलमानों का है। आपकी प्रॉपर्टी को उन लोगों में बांटा जाएगा, जिनके ज्यादा बच्चे हैं। ये घुसपैठियों को बांटा जाएगा। क्या आपकी मेहनत की कमाई घुसपैठियों के पास चली जानी चाहिए?’

PM मोदी ने राजस्थान के बांसवाड़ा की एक रैली में बीते रविवार को ये बात कही। इसके बाद अलीगढ़ और बाद की कुछ रैलियों में भी मोदी ने कहा कि कांग्रेस आपकी संपत्ति का पुनर्वितरण कर देगी। UP के CM योगी ने भी अपने भाषणों में कहा कि कांग्रेस संपत्तियों को जब्त कर उसे फिर से बांटना चाहती है। इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट में भी 9 जजों की संविधान पीठ भी संपत्ति के अधिकार से जुड़े अहम मामले की सुनवाई कर रही है।

भास्कर एक्सप्लेनर में जानेंगे कि क्या कांग्रेस ने सच में संपत्तियों के पुनर्वितरण की बात कही है और क्या कोई सरकार हमारी निजी संपत्ति को जब्त करके लोगों में बांट सकती है?

PM मोदी का दावा कितना सही, कांग्रेस के घोषणापत्र में क्या लिखा है?
कांग्रेस ने 5 अप्रैल 2024 को ‘न्याय पत्र’ नाम से 48 पेज का मैनिफेस्टो जारी किया था। इसमें किसी की निजी संपत्ति को लेकर उसे सार्वजनिक रूप से समाज के किसी वर्ग या लोगों को बांटने जैसी कोई बात नहीं कही गई है। हालांकि इसमें कहा गया है…

  • अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो वह नीतियों में जरूरी बदलाव के जरिए पैसे और आय की बढ़ती असमानता को एड्रेस करेगी।
  • जातियों और उप-जातियों और उनकी सामजिक-आर्थिक स्थिति का हिसाब लगाने के लिए पूरे देश में सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना की जाएगी। और इस डाटा के आधार पर सकारात्मक कदम उठाने के एजेंडे को मजबूती दी जाएगी।
  • अल्पसंख्यकों का आर्थिक सशक्तिकरण एक जरूरी कदम है और हम सुनिश्चित करेंगे कि उन्हें बिना किसी भेदभाव के समान अवसर और संस्थागत ऋण दिया जाए।

कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने कहा कि कांग्रेस के घोषणापत्र में ये कहां लिखा है कि हम लोगों की संपत्ति बांट देंगे? प्रधानमंत्री मोदी लोगों को झूठे और गैर-जरूरी मुद्दों में उलझा रहे हैं। लगातार झूठ बोल रहे हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी PM मोदी के बयानों को लेकर उनसे पत्र लिखकर मिलने का समय मांगा। खड़गे ने कहा कि संदर्भ से हटकर कुछ शब्दों को पकड़ना और सांप्रदायिक विभाजन पैदा करना PM की आदत बन गई है।

हैदराबाद में कांग्रेस का घोषणापत्र जारी होने के दौरान राहुल गांधी (फोटो सोर्स- AICC)
हैदराबाद में कांग्रेस का घोषणापत्र जारी होने के दौरान राहुल गांधी (फोटो सोर्स- AICC)

क्या राहुल गांधी के बयानों से निकली संपत्ति के बंटवारे की बात?

  • 16 अप्रैल 2023 को राहुल गांधी ने पहली बार कर्नाटक में विधानसभा चुनाव से पहले, कोलार में ‘जितनी आबादी, उतना हक’ की बात कही। उन्होंने कहा कि SC और ST समुदाय के लिए आरक्षण उनकी आबादी के अनुपात में होना चाहिए।
  • फरवरी 2024 में राहुल ने ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के दौरान बिहार में कहा कि अगर INDIA गठबंधन चुनाव जीता तो सत्ता में आने पर सरकार आर्थिक और सामाजिक स्थिति जानने के लिए एक वित्तीय सर्वे के साथ-साथ जातीय जनगणना भी करवाएगी।
  • 9 मार्च को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर राहुल ने लिखा कि हम दो ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहे हैं। जातीय जनगणना और इकॉनोमिक मैपिंग। इसके आधार पर हम आरक्षण की 50% की सीमा को खत्म कर देंगे। राहुल ने ये ही कहा कि कांग्रेस इसे अपने घोषणापत्र में शामिल करेगी।
  • कांग्रेस का घोषणापत्र जारी होने के बाद 6 अप्रैल को राहुल ने हैदराबाद में कहा, ‘कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद हम देश भर में आर्थिक और संस्थागत सर्वे के जरिए देश का ‘एक्स-रे’ करेंगे। इसके जरिए हम पता लगाएंगे कि देश का पैसा किसके हाथ में है, कौन से वर्ग के हाथ में है। इस ऐतिहासिक कदम के बाद हम क्रांतिकारी काम शुरू करेंगे और जो आपका हक बनता है वो आपको देने का काम करेंगे। चाहे वो मीडिया हो, देश की ब्यूरोक्रेसी हो और देश की सभी संस्थाएं हों, वहां आपके लिए जगह बनाकर आपको हिस्सेदारी देने का काम करेंगे।’
  • जब नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर संपत्ति और पैसे के पुनर्वितरण की योजना का आरोप लगाया तो राहुल गांधी ने 24 अप्रैल 2024 को कहा, ‘मैंने अभी तक यह नहीं कहा है कि हम कार्रवाई करेंगे। मैं सिर्फ यह कह रहा हूं कि आइए पता करें कि कितना अन्याय हुआ है।’

रिडिस्ट्रीब्यूशन यानी पुनर्वितरण क्या है, भारत में इसके कितने रूप हैं?
अंग्रेजी लोककथाओं में एक चरित्र है- रॉबिनहुड। अचूक तीरंदाज और तलवारबाज रॉबिनहुड और उसके साथी अमीरों की संपत्ति लूटकर गरीबों में बांट दिया करते थे। अंग्रेजी लोककथाओं में गरीब तबके के लोगों के लिए रॉबिनहुड किसी हीरो से कम नहीं था। रॉबिनहुड का ये तरीका भी एक तरह का संपत्ति का पुनर्वितरण है।

हालांकि, संपत्तियों के पुनर्वितरण की औपचारिक परिभाषा अलग है। पुनर्वितरण का अर्थ है- सामाजिक तरीकों जैसे कि टैक्स, चैरिटी, पब्लिक सर्विस की योजनाओं वगैरह के जरिए संपत्ति या पैसे को किसी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को ट्रांसफर करना।

इस हिसाब से भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों में भी किसी न किसी तरीके से पैसे या संपत्ति का पुनर्वितरण हमेशा होता आया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण आयकर है। जिसमें ज्यादा पैसा कमाने वाले लोग अपनी कमाई का ज्यादा हिस्सा टैक्स के बतौर सरकार को देते हैं, जबकि कम कमाई करने वाले लोग कम टैक्स या स्लैब के अनुसार जीरो टैक्स देते हैं। इसके बाद सरकार आयकर के बतौर इकठ्ठा हुए पैसे को गरीब लोगों के लिए चलाई जा रही कल्याणकारी योजनाओं में इस्तेमाल करती है।

‘Unequal: Why India Lags Behind Its Neighbours’ नाम की किताब लिखने वाली प्रोफेसर स्वाती नारायण सोशल साइंटिस्ट हैं। स्वाती कहती हैं कि देश में स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन की मूलभूत सुविधाओं का अधिकार सभी के लिए है।

इसके अलावा और भी तरीके हैं जिनके जरिए भारत में पैसे का पुनर्वितरण किया जाता रहा है। भूमि सुधार आंदोलन के तहत जरूरतमंदों में जमीनों का बंटवारा किया गया है। स्वाती के मुताबिक, केरल और बिहार जैसे राज्यों में सबसे पहले जमीनों का पुनर्वितरण किया गया था।

इसके अलावा कई सरकारी योजनाओं के जरिए सरकारें गरीबों के उत्थान के लिए देश का राजस्व खर्च करती रही हैं। जो लोग इस तरह के पुनर्वितरण के समर्थक हैं उनका मानना है कि समाज के लोगों के बीच अमीरी-गरीबी की खाई को पाटने के लिए पैसे का पुनर्वितरण जरूरी है।

पैसे और संपत्ति के वितरण पर देश का संविधान क्या कहता है?
भारत के संविधान में वेल्थ रिडिस्ट्रीब्यूशन यानी संपत्ति के पुनर्वितरण पर स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा गया है। संविधान के आर्टिकल-39 (बी) में सिर्फ इतना लिखा है कि- ‘समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और उन पर नियंत्रण इस तरह वितरित किया जाता है जो आम हित (आम लोगों की भलाई) के लिए सर्वोत्तम हो।

साथ ही यह भी कहा गया है कि स्टेट (राज्य) अपनी नीति को इस तरह निर्देशित करेगा कि ‘आर्थिक व्यवस्था के संचालन से पैसे और उत्पादन के साधनों का आम लोगों के नुकसान के लिए संकेंद्रण न हो।’ यानी पैसा और उत्पादन इस तरह एक जगह इकठ्ठा न हो कि आम लोगों का नुकसान हो।

जब संविधान में आर्टिकल-39 (ड्राफ्ट आर्टिकल 31) जोड़ा जा रहा था तो, इस पर जमकर बहस हुई। संविधान सभा के सदस्य अर्थशास्त्री केटी शाह चाहते थे कि संविधान उद्योगों में किसी एक व्यक्ति या लोगों का एकाधिकार स्थापित होने से रोक दे। उनके समर्थन में शिब्बन लाल सक्सेना भी चाहते थे कि संविधान में यह साफ तौर पर लिखा जाए कि स्टेट कुछ खास उद्योगों को नियंत्रित करेगा। हालांकि, नजीरुद्दीन अहमद जैसे भी कुछ लोग थे जो नहीं चाहते थे कि संविधान में कोई विवादित राजनीतिक या आर्थिक विचारधारा का समर्थन किया जाए।

संविधान सभा के सदस्य केटी शाह (बाएं) और शिब्बन लाल सक्सेना (दाएं) चाहते थे कि संविधान में उद्योगों पर सरकार के नियंत्रण के लिए स्पष्ट प्रावधान शामिल किए जाएं।
संविधान सभा के सदस्य केटी शाह (बाएं) और शिब्बन लाल सक्सेना (दाएं) चाहते थे कि संविधान में उद्योगों पर सरकार के नियंत्रण के लिए स्पष्ट प्रावधान शामिल किए जाएं।

सुप्रीम कोर्ट में संपत्ति के पुनर्वितरण का जिक्र क्यों आया?
सुप्रीम कोर्ट में साल 1976 के महाराष्ट्र आवास और क्षेत्र विकास प्राधिकरण (MHADA) कानून से जुड़े एक पुराने मामले पर चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुआई वाली 9 जजों की संवैधानिक बेंच सुनवाई कर रही है।

MHADA कानून में 1986 में एक संशोधन हुआ था, जिसके तहत सरकार को किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति अधिग्रहित करने का अधिकार मिल गया। इस संशोधन में ये भी कहा गया कि ये कानून आर्टिकल-39 (बी) को लागू करने के लिए बनाया गया है। इस संशोधन के खिलाफ दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट को अब यह तय करना है कि किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति को आम लोगों की भलाई के लिए सरकार अपने कब्जे में ले सकती है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट की ताजा बहस में पुनर्वितरण, आर्टिकल-39 पर क्या कहा गया?
25 अप्रैल को सुनवाई के दौरान, मुंबई के प्रॉपर्टी ओनर्स एसोसिएशन (POA) और दूसरे पक्षों के वकीलों का कहना था कि अनुच्छेद 39 (बी) और 31 (सी) के तहत राज्य, निजी संपत्तियों को जब्त कर सकता है।

इस पर बेंच ने निजी संपत्ति को समुदाय के भौतिक संसाधनों में शामिल न करने के विचार के खिलाफ आगाह किया। बेंच ने कहा, यह सुझाव देना अतिवादी हो सकता है कि ‘समुदाय के भौतिक संसाधनों’ का मतलब सिर्फ सार्वजनिक (सरकारी) संसाधन हैं और निजी संपत्तियां इसमें शामिल नहीं है। मैं आपको बताऊंगा कि यह नजरिया अपनाना कैसे खतरनाक होगा।

उदाहरण के लिए, यह कहना बेहद खतरनाक होगा कि आर्टिकल-39 (B) के तहत सरकारी नीति प्राइवेट जंगलों पर लागू नहीं होगी। जस्टिस चंद्रचूड़ ने ये भी कहा कि प्रॉपर्टी को लेकर हमारी सोच चरम पूंजीवादी या चरम समाजवादी विचारधारा से बहुत अलग है।

अनुच्छेद 39 (बी) को संविधान में सामाजिक परिवर्तन के इरादे से लाया गया है। इसलिए हमें नहीं कहना चाहिए कि कोई प्राइवेट प्रॉपर्टी, जब तक प्राइवेट प्रॉपर्टी है, उस पर आर्टिकल 39 (बी) का कोई इस्तेमाल नहीं होगा। जस्टिस चंद्रचूड़ ने जमींदारी उन्मूलन जैसे सुधारों का भी जिक्र किया।

उन्होंने कहा कि कोई भी प्रॉपर्टी किसी व्यक्ति विशेष की नहीं है, यह कहना चरम समाजवादी नजरिया है। भारत में संपत्ति को लेकर गांधीवादी सिद्धांत है, जो प्रॉपर्टी को ट्रस्ट में रखता है। भारत में किसी प्रॉपर्टी को न सिर्फ आने वाली पीढ़ियों के लिए, बल्कि पर्यावरण के लिए भी रखा जाता है, यही सतत विकास की अवधारणा है।

फिलहाल इस पूरे मामले पर सुनवाई जारी है। इस सवाल का जवाब अभी आना बाकी है कि निजी संपत्तियों को आम लोगों की भलाई के लिए सरकार अधिग्रहित कर सकती है या नहीं।

भारत की 40% संपत्ति सिर्फ 1% अमीरों के पास है
वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब द्वारा छापी गई ‘इनकम एंड वेल्थ इनइक्वलिटी इन इंडिया: द राइज ऑफ द बिलिनेयर राज’ नाम की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश में आर्थिक असमानता की खाई बढ़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘1990 के दशक की शुरुआत में असमानता बढ़ी, लेकिन साल 2014-15 से 2022-23 के बीच पैसे के केंद्रीकरण के संदर्भ में शीर्ष स्तर की असमानता में वृद्धि स्पष्ट हुई है।’ रिपोर्ट कहती है कि देश की 40% संपत्ति देश की महज एक फीसदी सबसे अमीर आबादी के पास है।

वर्ल्ड इनइक्वलिटी डेटाबेस के आंकड़ों के मुताबिक, भारत दुनिया के सबसे ज्यादा असमान आय वाले देशों में से एक हैं। इस मामले में भारत पेरू, यमन जैसे कुछेक छोटे देशों से ही बेहतर स्थिति में है।

स्वाती नारायण कहती हैं कि बीते दस सालों में भले ही देश की GDP बढ़ी हो, लेकिन ये जॉबलेस ग्रोथ है। इस दौरान आर्थिक असमानता सबसे ज्यादा बढ़ी है। स्वाती कहती हैं कि देश में आने वाले वक्त में संपत्तियों के पुनर्वितरण की कोई योजना लाए जाने की कोई संभावना नहीं है, कांग्रेस ने भी अपने घोषणापत्र में ऐसा कुछ नहीं कहा है।

स्वाती के मुताबिक, देश में आर्थिक असमानता दूर करने के प्रयास होने चाहिए, देश की GDP में कृषि का योगदान करीब 20% है, जबकि देश की 46% आबादी कृषि से जुड़ी है। इसका अर्थ है कि यह आबादी या तो किसानों की है या फिर मजदूरों की। कृषि का GDP​​​​​​​ में योगदान बढ़ाने के लिए किसानों के लिए MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) का कानून लागू करने और एग्रो-प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने की जरूरत है। इसी तरह के प्रयासों से देश में आर्थिक या आय की असमानता कम हो सकती है।

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