यहां हुआ था अग्निपथ योजना का विरोध; आर्मी जॉइन करने वाले 48% युवा इसी धरती से
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 अप्रैल को मुरैना की सभा में कहा- कांग्रेस सरकार ने जवानों के हाथ बांध रखे थे हमने उन्हें खुली छूट दे दी। हमने कहा, अगर एक गोली आती है तो 10 गोली चलनी चाहिए। अगर एक गोला फेंकते हैं तो 10 तोपें चल जानी चाहिए। आखिर पीएम मोदी ने चंबल की धरती से गोली-तोप की बात क्यों की। क्या है इसकी वजह?
दरअसल, पीएम मोदी ने इसके जरिए ग्वालियर चंबल के युवाओं को साधने की कोशिश की है। इस क्षेत्र से सबसे ज्यादा युवा सेना में भर्ती होते हैं, लेकिन अग्निपथ स्कीम लॉन्च होने के बाद यहां के युवाओं में इसे लेकर नाराजगी है।
एक्सपर्ट का कहना है कि पीएम मोदी की बातों से संकेत मिलते हैं कि उन्हें अंदाजा है कि युवा इस योजना को पसंद नहीं कर रहे हैं। दूसरी तरफ पिछले दिनों भारत जोड़ो यात्रा पर आए राहुल गांधी ने भी अग्निपथ योजना को लेकर युवाओं से संवाद साधा था।
ऐसे में पीएम मोदी ने सेना को कांग्रेस सरकार से जोड़कर बताने की कोशिश की है कि बीजेपी सरकार ने सेना के जवानों को आजादी से काम करने की छूट दी है। सरकार में निर्णय लेने की क्षमता है।
पीएम के इस बयान के बाद दैनिक भास्कर ने ये जानने की कोशिश की कि अग्निपथ योजना के लॉन्च होने के 2 साल में युवाओं का रुझान सेना में भर्ती को लेकर बढ़ा है या फिर कम हुआ है। क्या कहते हैं युवा और उन्हें ट्रेनिंग देने वाले ट्रेनर, इस क्षेत्र की चार सीटें ग्वालियर, गुना, मुरैना, भिंड में युवा वोटर्स कितने निर्णायक है। पढ़िए रिपोर्ट..

सबसे पहले जानिए पीएम मोदी ने अपने भाषण में क्या कहा?
प्रधानमंत्री ने मुरैना के पुलिस परेड ग्राउंड में भाजपा के लोकसभा प्रत्याशी शिवमंगल सिंह तोमर के समर्थन में सभा की। पीएम मोदी ने कहा- ‘कांग्रेस की पॉलिसी है जो देश के लिए सबसे ज्यादा योगदान करे, मेहनत करे, सबसे ज्यादा समर्पण करे उसे सबसे पीछे रखो।’
उन्होंने कहा- ‘कांग्रेस ने इतने वर्षों तक सेना के जवानों की वन रेंक वन पेंशन जैसी मांग पूरी नहीं होने दी। हमने सरकार बनते ही इसे लागू किया। हमने सीमा पर खड़े जवानों की सुविधा भी चिंता की। कांग्रेस सरकार ने जवानों के हाथ बांध रखे थे हमने उन्हें खुली छूट दे दी। हमने कहा, अगर एक गोली आती है तो 10 गोली चलनी चाहिए। अगर एक गोला फेंकते हैं तो 10 तोपें चल जानी चाहिए।’

अब समझिए पीएम मोदी के बयान के क्या है मायने..
एक्सपर्ट बोले- सरकार समझ रही है कि अग्निपथ योजना को युवा पसंद नहीं कर रहे
ग्वालियर के वरिष्ठ पत्रकार देव श्रीमाली कहते हैं कि मुरैना की सभा में पीएम मोदी का सेना को आजादी देने का जिक्र करने के पीछे दो वजह नजर आती है। पहली- इस अंचल से सबसे ज्यादा युवा सेना में भर्ती होते हैं। दूसरा- जब अग्निपथ योजना लागू हुई थी तब ग्वालियर-चंबल में इसका सबसे ज्यादा विरोध हुआ था।
सरकार भी समझ रही है कि इस योजना को युवा पसंद नहीं कर रहे हैं। इसे संकेत के रूप में मान सकते हैं कि सरकार इस योजना का स्वरूप बदल सकती है या फिर कुछ और फैसला ले सकती है। पिछले दिनों रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह भी ऐसे संकेत दे चुके हैं।
वे कहते हैं कि ग्वालियर के मुरार क्षेत्र में सेना की छावनी भी है, यहां सैन्य परिवार के अलावा करीब एक लाख की आबादी सीधे सैन्य गतिविधियों से प्रभावित होती है। ग्वालियर-चंबल अंचल में सेना से सेवानिवृत्त परिवार के वोटर्स की संख्या भी दो लाख से ज्यादा है। जो अलग-अलग वर्ग से आते हैं।
उन्होंने कहा कि 2016 में तत्कालीन रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने चंबल में प्रदेश का दूसरा सैनिक स्कूल खोलने की घोषणा की थी। भिंड जिला प्रशासन ने मालनपुर और डीडी नगर के पास जमीन भी चिह्नित की है। ये प्रस्ताव रक्षा मंत्रालय में अटका हुआ है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अग्निपथ योजना में बदलाव की बात कह चुके हैं
दो महीने पहले एक न्यूज चैनल के समिट में बोलते हुए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि उनकी सरकार जरूरत पड़ने पर अग्निवीर भर्ती योजना में बदलाव के लिए तैयार है। रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि अग्निवीरों का भविष्य सुरक्षित रहे।
उन्होंने कहा- सेना को युवाओं की जरूरत है। मुझे लगता है कि युवा उत्साह से भरा होता है। वे टेक-लवर होते हैं। हमने इस बात का उचित ध्यान रखा है कि उनका भविष्य भी सुरक्षित रहे। जरूरत पड़ी तो हम बदलाव भी करेंगे।

राहुल गांधी से युवाओं ने कहा था- अग्निवीर सुनकर रिश्ते वाले भी नहीं आ रहे
मध्य प्रदेश में भारत जोड़ो न्याय यात्रा में इसी महीने राहुल गांधी ने ग्वालियर में अग्निवीर भर्ती से जुड़े युवाओं, पूर्व सैनिकों से करीब 40 मिनट तक बात की थी । यहां सेना की तैयारी कर रहे युवाओं ने बताया कि जो सम्मान फौजी बनने पर मिलता था, अब वो अग्निवीर बनने पर नहीं मिलता। न शहीद का दर्जा मिलता है न ही पेंशन और कैंटीन की सुविधा मिलती है।
यहां तक कि अब तो अग्निवीर सुनकर हमारे लिए रिश्ते भी नहीं आ रहे हैं। इस पर राहुल गांधी ने युवाओं को भरोसा दिलाया था कि यदि उनकी सरकार आती है तो वह अग्निवीर भर्ती योजना में जो सुधार हो सकता है वह जरूर करेंगे।

अब जानिए अग्निपथ योजना के बाद ग्वालियर-चंबल में भर्ती पर क्या असर पड़ा..
ट्रेनर बोले- सेना की तैयारी करने वाले 1 फीसदी भी नहीं बचे
ग्वालियर में युवाओं को सेना में जाने की ट्रेनिंग देने वाले फिजिकल ट्रेनर शिवम कुमार पाठक कहते हैं, मैं दस साल ये यहां ट्रेनिंग दे रहा हूं। अग्निपथ योजना लागू होने से पहले मेला ग्राउंड में 500 से ज्यादा युवा रोज ट्रेनिंग के लिए आते थे। अब ग्राउंड खाली पड़ा है। अब यहां 20 से 25 युवा ही आ रहे हैं। यानी 1 फीसदी युवा भी अब सेना भर्ती की तैयारी नहीं कर रहे हैं।
वे कहते हैं कि अभी कुछ दिनों पहले अग्निवीर सैनिकों की भर्ती हुई थी तो 16 हजार युवा भर्ती रैली में शामिल हुए थे, इससे पहले भर्ती के लिए 40 से 50 हजार युवा आते थे। अब युवा सोचता है कि पढ़ाई की उम्र में नौकरी करूंगा तो पढ़ाई भी छूट जाएगी और चार साल बाद नौकरी भी नहीं रहेगी।
10-12वीं पास करने वालों को कहीं नौकरी भी नहीं मिलती, इसलिए वे अग्निवीर की तैयारी करने की बजाय पढ़ाई करने या अन्य प्रतियोगी परीक्षा की तैयारियों में जुटे हैं।

गौरव ने कहा- मैं तैयारी कर रहा, दोस्त आने को तैयार नहीं
सेना भर्ती की तैयारी कर रहे गौरव सिंह गुर्जर कहते हैं, मैं सेना की तैयारी तो कर रहा हूं, लेकिन मेरे दोस्त तैयारी नहीं कर रहे हैं। गौरव का कहना है कि मैं खुद प्रैक्टिस के साथ पढ़ाई भी कर रहा हूं, क्योंकि चार बाद नौकरी चली गई तो अगली नौकरी के लिए पढ़ाई भी जरूरी है।
पुलिस और अन्य भर्ती के पद भी नहीं निकल रहे हैं। युवा गांव से तैयारी के लिए शहर आते हैं, यहां रहने-खाने का हर माह 7 से 10 हजार खर्च होता है। फिजिकल टेस्ट पास करने के बाद कोचिंग और रहने-खाने पर चार महीने तक खर्च करना पड़ता है। इस तरह से एक या दो साल की तैयार में ही दो से तीन लाख रुपए खर्च हो जाते हैं।

वहीं, दो साल से तैयार कर रहे सूरज पचौरी कहते हैं, अग्निवीर के लिए भी उतनी ही मेहनत करना पड़ती है, जितना सेना में सामान्य भर्ती के लिए करना होती है। मेरा और परिवार का सपना है कि मैं सेना में जाऊं, तो तैयारी कर रहा हूं। लेकिन, बाकी साथी ऐसा नहीं सोचते हैं। सेना में भर्ती का मौका मिलेगा तो खुशी तो होगी, लेकिन हर पल यही दिमाग में रहेगा कि चार साल पूरे होते ही बाहर हो जाएंगे।


