एमपी में पहले चरण की 6 सीटों के हाल:जबलपुर-शहडोल में भाजपा सेफ जोन में, मंडला में केंद्रीय मंत्री कुलस्ते के सामने बड़ी चुनौती

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शहडोल में ब्यौहारी से पहले गांव है पंचा खरपा। यहां रहने वाले बलराम सिंह वैश्य से पूछा, इस बार वोट किसे देंगे, तो बोले- इस बार निर्दलीय को वोट डालूंगा। पिछले 3 बार से भाजपा को वोट दे रहा हूं, लेकिन मेरे गांव के बाहर लगा ट्रांसफॉर्मर 2 साल से बदला ही नहीं गया।

छिंदवाड़ा से सटे मुगना गांव में किराना दुकान चलाने वाले सेवक राम प्रजापति कहते हैं- छिंदवाड़ा में कमलनाथ की वजह से विकास हुआ, मगर नकुलनाथ में वो बात नहीं। अगर दोनों भाजपा में चले जाते तो जो विकास रुका हुआ है वो शुरू हो जाता।

वहीं, जबलपुर के संतोष जैन कहते हैं कि इस चुनाव में एक ही फैक्टर है वो है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। इसके अलावा कोई और फैक्टर काम नहीं करेगा।

मप्र की 6 लोकसभा सीटें छिंदवाड़ा, बालाघाट, मंडला, जबलपुर, सीधी और शहडोल में पहले चरण में 19 अप्रैल को मतदान है। वोटर के मन में क्या है… हवा का रुख किस तरफ है ये जानने भास्कर टीम इन सभी 6 सीटों पर पहुंची। पढ़िए रिपोर्ट…

पॉइंट्स में समझिए 6 सीटों के रुझान

छिंदवाड़ा: 6 सीटों में से केवल यही एक सीट इस समय कांग्रेस के पास है, लेकिन यहां एकतरफा मुकाबला नहीं दिख रहा है।

बालाघाट: यहां जातिगत समीकरण हावी है। कंकर मुंजारे के बीएसपी से चुनाव लड़ने के कारण लोधी वोटर्स निर्णायक हो गए हैं।

मंडला: गोंगपा प्रत्याशी की वजह से यहां त्रिकोणीय मुकाबला नजर आ रहा है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 5 सीटें जीतीं उनमें से 3 पर गोंगपा की भूमिका रही।

सीधी: यहां मोदी सारे फैक्टर पर हावी हैं, पर गोंगपा के अजय प्रताप सिंह और निर्दलीय लक्ष्मण सिंह वैश्य सीधे तौर पर बीजेपी का वोट काट रहे हैं।

शहडोल: यहां बीजेपी मजबूत स्थिति में नजर आती है। बैगा आदिवासी बहुल इस लोकसभा में पीएम जनमन योजना का असर देखने को मिलता है।

जबलपुर: ये भाजपा का मजबूत गढ़ है। इस बार कांग्रेस उम्मीदवार दिनेश यादव सहानुभूति वोट बटोर रहे हैं, लेकिन शहरी मतदाता बीजेपी के साथ नजर आते हैं।

अब सिलसिलेवार जानते हैं क्या है हर लोकसभा सीट का गणित

छिंदवाड़ा : एकतरफा मुकाबला क्यों नहीं?

छिंदवाड़ा की राजनीति को करीब से देखने और समझने वाले भी मानते हैं कि इस बार कमलनाथ या कांग्रेस के लिए छिंदवाड़ा में मुकाबला एकतरफा नहीं रहने वाला है। नकुलनाथ 2019 में सांसद बने जरूर, लेकिन उनकी जीत का अंतर महज 37 हजार 536 मतों का रहा था। वहीं, कमलनाथ भी सिर्फ 25 हजार वोटों से ही विधानसभा का उपचुनाव जीत पाए थे।

देश में आपातकाल के बाद के चुनाव में भी छिंदवाड़ा की जनता ने कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा, लेकिन इस बार स्थितियां बदली हुई हैं। नाथ परिवार ने यहां प्रचार में पूरी ताकत झोंक दी है। कमलनाथ छिंदवाड़ा से बाहर नहीं निकल रहे हैं।

वहीं, बीजेपी ने भी अपने बड़े नेताओं को मैदान में उतारा है। आचार संहिता लगने के बाद मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से लेकर पूर्व सीएम शिवराज भी दौरे कर चुके हैं। कैलाश विजयवर्गीय छिंदवाड़ा के प्रभारी हैं। वे बीजेपी प्रत्याशी बंटी विवेक साहू के साथ मिलकर प्रचार में जुटे हैं।

कांग्रेस छोड़ने वाले नेता भाजपा को कितना फायदा पहुंचाएंगे?

राजनीतिक विश्लेषक राकेश प्रजापति का मानना है कि कमलनाथ के बेहद करीबी रहे दीपक सक्सेना और महापौर विक्रम अहाके के भाजपा में जाने से कांग्रेस का उतना नुकसान नहीं होगा, जितना अमरवाड़ा विधायक कमलेश शाह के साथ छोड़ने से होगा। दरअसल, वे हर्रई के राजा कहलाते हैं और आदिवासियों के बीच उनकी अपनी एक साख है।

बालाघाट: बीएसपी से बिगड़ा कांग्रेस का गणित, भाजपा फायदे में

बालाघाट में बीएसपी कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकती है। बालाघाट से बीएसपी ने पूर्व सांसद कंकर मुंजारे को प्रत्याशी बनाया है। वे 2019 में भी इसी पार्टी से चुनाव लड़ चुके हैं। तब उन्हें 85 हजार से ज्यादा वोट मिले थे, लेकिन इस बार यहां जातीय समीकरण कुछ अलग है।

दरअसल, भाजपा ने जातीय समीकरण के आधार पर ही भारती पारधी को उम्मीदवार बनाया है। वह पंवार जाति से हैं। कांग्रेस ने सम्राट सिंह सरस्वार को मैदान में उतारा है। वे पूर्व विधायक अशोक सिंह सरस्वार के बेटे हैं। वहीं बीएसपी से कंकर मुंजारे मैदान में है। वे लोधी समुदाय से आते हैं।

जानकारों के मुताबिक लोधी समुदाय इस चुनाव में निर्णायक होगा

लोधी समुदाय का झुकाव कांग्रेस की तरफ होगा या कंकर मुंजारे की वजह से बीएसपी की तरफ। इससे किसे नुकसान होगा? इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार अरविंद अग्निहोत्री कहते हैं कि बालाघाट में जातियों के समीकरणों को साधने में रिश्ते आड़े आ रहे हैं।

ऐसे में कांग्रेस का गणित बिगड़ गया है। यदि कंकर मुंजारे चुनाव मैदान में नहीं होते तो लोधी वोटर उनकी विधायक पत्नी अनुभा मुंजारे के प्रभाव से कांग्रेस के पक्ष में आ सकते थे। अब वे अपने पति के खिलाफ कांग्रेस का प्रचार कर रही हैं, इससे कांग्रेस का गणित तो बिगड़ गया है।

मंडला: गोंगपा का असर, भाजपा को नुकसान

गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने भी छिंदवाड़ा, बालाघाट व मंडला से प्रत्याशी उतारे हैं, लेकिन इसका असर सिर्फ मंडला में होता दिखाई दे रहा है। गोंगपा ने यहां से महेश कुमार वट्‌टी को टिकट दिया है। वे एमए, एलएलबी और गोंडी साहित्यकार हैं। वे गन कैरिज फैक्ट्री जबलपुर की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए हैं।

विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को मिले वोट का ट्रेंड बताता है कि कांग्रेस जिन 5 सीटों पर काबिज हैं, उनमें से 3 निवास, बिछिया व लखनादौन पर गोंगपा की बड़ी भूमिका रही। जबकि शहपुरा में भाजपा की जीत में गोंगपा का रोल था। पिछले लोकसभा चुनाव में गोंगपा के दादा रामगुमाल उइके को 48 हजार वोट मिले थे।

राजनीतिक विश्लेषक सुधीर उपाध्याय कहते हैं कि गोंगपा में अब ए, बी, सी, डी कई धड़े बन गए हैं। इस पार्टी की 2014 से 2016 के बीच जो ताकत थी, वह धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। कोर आदिवासी वोट कांग्रेस ही नहीं, बल्कि भाजपा में भी शिफ्ट हुआ है, इसलिए यह पार्टी चुनाव को ज्यादा प्रभावित करेगी, ऐसी उम्मीद नहीं लगती है।

कुलस्ते पर फिर से दांव क्यों लगाया?

विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी भाजपा ने उन्हें लोकसभा का टिकट देने का फैसला किया है। इसको लेकर उपाध्याय का मानना है कि लोकसभा का व्यापक चुनाव होता है, क्योंकि इसका दायरा बड़ा होता है। फिर यहां ट्राइबल वोट का प्रतिशत भी ज्यादा है। यह कांग्रेस का परंपरागत वोट है, लेकिन पिछले 3 चुनाव में यह धीरे-धीरे भाजपा की तरफ खिसक रहा है। यही सोचकर भाजपा ने उन्हें उम्मीदवार बनाया।

जबलपुर: दलबदल से कांग्रेस बैकफुट पर

महाकौशल के सेंटर पॉइंट जबलपुर में भाजपा हमेशा से मजबूत रही है। 30 साल से भाजपा यहां जीत रही है। कांग्रेस आखिरी बार 1991 में यहां से जीत दर्ज करने में सफल हुई थी। भाजपा की जीत की सबसे अहम बात ये है कि हर चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी का जीत का फासला बढ़ता रहा है। इस बार भाजपा ने आशीष दुबे तो कांग्रेस ने दिनेश यादव को प्रत्याशी बनाया है।

भाजपा ने कांग्रेस के निशान पर जीते महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू और पूर्व विधायक एवं इस बार पाटन से प्रत्याशी रहे नीलेश अवस्थी और सिहोरा विधानसभा की प्रत्याशी रहीं एकता ठाकुर अब भगवा खेमे में आ चुकी हैं। इससे कांग्रेस बैक फुट पर है।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्‌डा 2 अप्रैल को जबलपुर में प्रबुद्ध जन और कार्यकर्ता सम्मेलन कर चुके हैं। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जबलपुर शहर में 500 मीटर की रैली कर वोटर को साध चुके हैं। जबकि कांग्रेस की ओर से राष्ट्रीय स्तर का नेता नहीं आया है। यानी तैयारियों में भी कांग्रेस पीछे चल रही है।

वोटर कहते हैं- मोदी बड़ा फैक्टर हैं

भंवरताल पार्क में मॉर्निंग वॉक करने पहुंचे संतोष जैन कहते हैं कि मोदी इस चुनाव के बड़ा फैक्टर हैं। मोदी की वजह से ही सब कुछ हुआ। देश में खुशहाली आई है। देश में कहीं दंगा-फसाद नहीं हुआ। वे दावा करते हैं कि इस बार भी भाजपा ही आएगी। जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र दुबे कहते हैं कि पिछले 3 चुनाव का परिणाम देखे तो साफ है कि भाजपा के जो वोटर हैं, वो एकतरफा मतदान करने निकलते हैं

जबलपुर के भंवरताल में मॉर्निंग वॉक करने वाले ग्रुप के सदस्यों का कहना है कि मोदी बड़ा फैक्टर हैं, लेकिन महंगाई पर केंद्र सरकार को कंट्रोल करने की जरूरत है।
जबलपुर के भंवरताल में मॉर्निंग वॉक करने वाले ग्रुप के सदस्यों का कहना है कि मोदी बड़ा फैक्टर हैं, लेकिन महंगाई पर केंद्र सरकार को कंट्रोल करने की जरूरत है।

शहडोल: मोदी फैक्टर के साथ विकास भी मुद्दा

शहडोल लोकसभा 4 जिलों में फैली है। अनूपपुर जिले की 3, शहडोल व उमरिया की 2-2 और 1 विधानसभा कटनी जिले की बड़वारा इसमें शामिल है। इस बार के विधानसभा में सिर्फ 1 सीट पुष्पराजगढ़ से कांग्रेस ने जीत दर्ज की है।

भाजपा ने मौजूदा सांसद हिमाद्री सिंह को तो कांग्रेस ने पुष्पराजगढ़ से तीसरी बार के विधायक चुने गए फुंदेलाल मार्कों को प्रत्याशी बनाया है। दोनों प्रत्याशी पुष्पराजगढ़ के रहने वाले हैं। ये सीट आदिवासी के लिए आरक्षित है। यहां बैगा आदिवासी बड़ी संख्या में हैं।

परंपरागत रूप से बैगा कांग्रेस के समर्थक माने जाते हैं, पर इस बार केंद्रीय बजट में मोदी सरकार ने संरक्षित जनजातीय घोषित बैगाओं के लिए अलग से आवास (पीएम जनमन आवास) योजना शुरू की है। हर गांव में बैगाओं के घर का निर्माण एक साथ शुरू कराया जा चुका है।

लोग बोले- विकास का फायदा भाजपा को मिलेगा

जिला व्यापारी संघ के अध्यक्ष लक्ष्मण गुप्ता कहते हैं कि शहडोल में ट्रेन कनेक्टिविटी की समस्या दूर हो चुकी है। अनूपपुर-शहडोल से 20 से ज्यादा ट्रेन गुजरती हैं। ये देश के हर बड़े शहरों को जोड़ रही है। शहडोल में मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, सड़क सहित विकास के दूसरे काम लगातार हो रहे हैं। इस तरह का विकास भाजपा में ही संभव था।

शहडोल के लोगों का कहना है कि पिछले 15 साल में यहां विकास के कई काम हुए हैं। आदिवासियों के लिए मोदी सरकार ने अच्छे काम किए हैं।
शहडोल के लोगों का कहना है कि पिछले 15 साल में यहां विकास के कई काम हुए हैं। आदिवासियों के लिए मोदी सरकार ने अच्छे काम किए हैं।

सीधी: गोंगपा और निर्दलीय से भाजपा को नुकसान

सीधी लोकसभा में भाजपा-कांग्रेस के साथ ही गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और निर्दलीय प्रत्याशी लक्ष्मण वैश्य भी मुकाबले में हैं। सीधी लोकसभा 3 जिलों की 8 विधानसभाओं में फैली है। 4 विधानसभा सीधी में तो 3 सिंगरौली के और 1 शहडोल जिले की ब्यौहारी विधानसभा है।

यहां की 8 सीटों में अभी कांग्रेस के पास सिर्फ एक विधायक चुरहट में जीते हैं। भाजपा ने यहां से डॉ राजेश मिश्रा, कांग्रेस ने कामेश्वर पटेल को प्रत्याशी बनाया है। वहीं गोंगपा से भाजपा के बागी अजय प्रताप सिंह मैदान में हैं।

वोटर्स का कहना- इस बार निर्दलीय को वोट करेंगे

ब्यौहारी से पहले पंचा खरपा गांव में मुलाकात रामकृष्ण बैस से हुई। वे कहते हैं कि इस बार यहां चतुष्कोणीय मुकाबला होगा। भाजपा-कांग्रेस व गोंगपा के अलावा निर्दलीय लक्ष्मण सिंह बैस भी मजबूती से चुनाव लड़ रहे हैं। रामकृष्ण कहते हैं कि सीधी लोकसभा में 2.50 लाख वैश्य वोट इस बार भाजपा की बजाय निर्दलीय लक्ष्मण को वोट करेंगे। भाजपा-कांग्रेस दोनों ने वैश्य समाज को दरकिनार करते रहते हैं। इस बाद दोनों को सबक सिखाने के लिए निर्दलीय लक्ष्मण वैश्य को वोट देंगे। सीधी लोकसभा में ढाई लाख वैश्य वोटर हैं।

गोंगपा-लक्ष्मण किसे पहुंचा रहे अधिक नुकसान?

सीधी लोकसभा में सबसे अधिक 32 प्रतिशत वोटर आदिवासी हैं। इसके बाद ब्राह्मण, ओबीसी व ठाकुर जातियां हैं। भाजपा ने ब्राह्मण, कांग्रेस ने ओबीसी तो गोंगपा ने ठाकुर प्रत्याशी उतार कर यहां का चुनावी जातीय समीकरण जटिल बना दिया है। सीधी के वरिष्ठ पत्रकार हंसाराज गिरि कहते हैं कि मोदी सारे फैक्टर पर हावी हैं। पर गोंगपा के अजय प्रताप सिंह और निर्दलीय लक्ष्मण सिंह वैश्य सीधे तौर पर बीजेपी का वोट काट रहे हैं।

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