मोदी जी के राज में लोकतंत्र, संविधान और मीडिया की निष्पक्षता खतरे में है: जीतू पटवारी

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भोपाल, 20 नवम्बर 2023

प्रदेष कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने आज प्रदेष कांग्रेस मुख्यालय में पत्रकारों से चर्चा करते हुये कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के करीबी, महाराष्ट में भाजपा के सचिव तावड़े को जनता ने नगद करोड़ों रूपये बांटते हुये पकड़ा। पुलिस के आने के पहले 15 करोड़ रूपये बांट चुके थे। महाराष्ट्र और झारखंड में जो चुनाव चल रहे हैं भारतीय लोकतंत्र में जो बचा था, सबकुछ ध्वस्त कर दिया मोदी जी ने। मोदी जी ने नया भारत बनाया तब से स्वायत्त संस्थाओं को कोलेप्स कर दिया, चाहे चुनाव आयोग हो या ईडी, इनकम टेक्स के माध्यम से हो, लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन कर 10 साल में 600 से अधिक जनप्रतिनिधियों यानि सांसद विधायकों को खरीदा गया, जनप्रतिनिधियों को दल बदल कराया गया।
श्री पटवारी ने कहा कि प्राचीनकाल में गुलाम बेचे जाते थे, वैसे ही कलयुग में गाय, बैल भैस बैचे जाते हैं और मोदी जी ने जनप्रतिनिधियों को बिकवा दिया। मोदी जी ने डिजीटल करेंसी की बात की थी, लेकिन इतनी मात्रा में नगद राषि मिलना और बांटाना, मोदी को थोडी सी भी राजनैतिक मर्यादा बची हो तो इस सरकार का चेहरा कितना बेनकाव हुआ देष प्रदेष की जनता देख रही है। विजयपुर में चुनाव आयोग की रीड़ की हड्डी टूट गई। कलेक्टर और एसपी ने खुलकर चुनाव आयोग का उल्लंघन किया। महाराष्ट्र में भाजपा के सचिव तावड़े द्वारा नोट बांटना यानि मोदी के कहने पर बांटना। भाजपा की जमीन खिसक चुकी है पैसो का दुरूपयोग हर राज्यों में भाजपा ने किया, इससे साफ है कि लोकतंत्र खतरे में हैं, संविधान खतरे में है, मीडिया की निष्पक्षता खतरे में है। मोदी की सह पर किये गये तावड़े के इस कृत्य की कांग्रेस पार्टी घोर निंदा करती हैं।
श्री पटवारी ने कहा कि इनती मात्रा में राषि मिलना, इस सरकार का चेहरा बेनकाव हुआ है। विजयपुर में चुनाव आयोग निःसहाय हो गया। हमने पहले से शंका जाहिर की अनेकों षिकायतें की लेकिन चुनाव आयोग तट से मस नहीं हुआ। लोकतंत्र को अपने हिसाब से चला रही है भाजपा।
श्री पटवारी ने कहा कि किसान का बेटा बताने वाले मप्र में 20 साल मुख्यमंत्री रहे और अब देष में कृषि मंत्री षिवराज सिंह ने कहा था कि हम किसान की आय दोगुनी करेंगे, किसान मेरा भगवान है। गुना में किसान ने एक वीडिया में बताया कि में गरीब छोटा किसान हूं। मेरा सरकार से निवेदन है कि मेरे पास कम से कम जमीन है। मुझे एक भी दाना खाद का नहीं मिला। आजकल पांच पांच साल, एक एक साल के बच्चे का आधार कार्ड बन रहा है। अगर आधार कार्ड से खाद दिया जाएगा। तो हमारी तो हिम्मत ही नहीं है कि दो-दो बीघा वाले किसान खाद को खरीद सके। वहीं रविवार सुबह गुना के झागर गांव के इस किसान भागवत किरार ने खाद के लिए परेशान होकर यह कहते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किया और विवार रात अचानक उनकी मौत हो गई। मृतक किसान का पोस्टमॉर्टम कराए बिना ही आनन फानन में अंतिम संस्कार कर दिया गया। इससे मृत्यु की असली वजह सामने नहीं आ सकी। इलाके के कुछ लोग इसे दबी जुबान में खाद न मिलने से त्रस्त होकर किसान द्वारा आत्महत्या करने का मामला भी बता रहे हैं।
श्री पटवारी ने कहा कि वहीं हरदा में पांच दिन पहले डगावानीमा गांव के 72 साल के बुजुर्ग किसान बाबूलाल जाट ने रास्ते के विवाद को लेकर आत्महत्या कर ली। जिसके बाद परिजनों ने मृतक के शव को हरदा के कलेक्टर बंगले के सामने रखकर प्रदर्शन किया। ग्वालियर जिले के दो किसानों ने इक्छा-मृत्यु की गुहार लगाई है। एक किसान ने अपनी जमीन को दबंगों से बचाने के लिए राष्ट्रपति तो दूसरे किसान ने अपने गांव की गोचर जमीन को दबंगों से बचाने ग्वालियर कलेक्टर से इच्छा-मृत्यु की अनुमति मांगी है। बड़ागांव के रहने वाले किसान बृजेन्द्र सिंह यादव की 3 रकबा जमीन पर सभी कानूनी दस्तावेज होने के बावजूद दबंगो ने कब्जा कर प्लॉटिंग कर दी। महाराजपुरा गांव के कामता प्रसाद कोरी का कहना है एसडीएम कोर्ट से भूमि को कब्जा मुक्त करने के लिए आदेश भी हो चुके हैं। उसके बावजूद नायब तहसीलदार शासकीय भूमि से इस कब्जे को हटाने के बदले में 20 हजार रुपये की मांग कर रहा है।
श्री पटवारी ने प्रदेष के मुख्यमंत्री जी से सवाल करते हुये कहा कि यह सरकारी सिस्टम फेल होने का सबसे बड़ा सबूत है और आपकी सरकार में तो सिस्टम भी माफिया ही चला रहे हैं। सच यह है इच्छा-मृत्यु की आवश्यकता बेलगाम सिस्टम को है। क्योंकि बेकसूर कब तक कीमत चुकाएंगे? एनसीआरबी के मुताबिक, 2017 से 2022 के बीच प्रदेश के 1318 किसानों ने आत्महत्या की और सरकारी रिकॉर्ड में इनकी मौत का कारण-विक्षिप्त, नशेड़ी या परिवार की कलह बता दिया जाता है। ब्याज चुकाते-चुकाते किसान की जमीन बेचने की नौबत आ जाती है, मजबूरी में वह आत्महत्या कर लेता है लेकिन सरकार और प्रशासन कर्ज को आत्महत्या की वजह नहीं मानता है, कोई मदद भी नहीं करता है। साल 2020 में 235 किसानों ने आत्महत्या की। लेकिन सरकारी बेशर्मी का आलम देखिए इसमें 73 का कारण पारिवारिक कलह, 55 की वजह पागलपन, मानसिक बीमारी और तीसरा अहम कारण- नशे की लत बताया गया।
श्री पटवारी ने कहा कि सरकार की वजह से हो रही यह ‘सरकारी हत्याएं’, किसान को मरने के बाद भी सम्मान नहीं दिलवा पा रही है। क्योंकि, सरकारी रिकॉर्ड में उसे पागल और नशेड़ी बताया जा रहा है। सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हुआ यह दर्द बाद में परिवार की सार्वजनिक प्रताड़ना का कारण बन रहा है। पिछले 10 वर्षों में मध्यप्रदेश में किसानों की आत्महत्याओं के मामले चिंता का विषय बने हुए हैं। नेशनल क्राइम रिकाईस ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार, 2022 में मध्यप्रदेश में 641 किसानों और कृषि मजद्ूरों ने आत्महत्या की। इसके दो प्रमुख कारण हैं, कर्ज का दबाव रू किसानों पर बढ़ते कर्ज का बोझ आत्महत्या का एक प्रमुख कारण है। खेती से होने वाली आय कई बार ऋण चुकाने के लिए पर्याप्त नहीं होती, जिससे किसानों को मानसिक तनाव होता है।
श्री पटवारी ने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का अभाव हैं, कई बार किसानों को फसलों की सही कीमत नहीं मिलती, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और बिगड़ जाती है। यह सर्वविदित है कि मध्यप्रदेश में खाद की किल्लत है। डीएपी-यूरिया की कालाबाजारी हो रही है। भोपाल में एक दुकानदार पर एफआईआर दर्ज हो चुकी है। भोपाल, टीकमगढ़, सागर समेत कई जिलो में किसान खाद के लिए हंगामा कर चुके हैं।
सरकार की नाक के नीचे भोपाल के बैरसिया में 1350 रुपए प्रति बोरी के हिसाब से मिलने वाली डीएपी खाद को 500 रुपए ज्यादा लेकर 1850 रुपए में बेचना सामने आया। वहीं, 267 रुपए कीमत की यूरिया की एक बोरी के 340 रुपए लिए गए। टीकमगढ़ जिले के एक खाद वितरण केंद्र में भी 3 दिन पहले खाद को लेकर जमकर हंगामा हुआ था। मुख्यमंत्री उमा भारती के गांव डूंडा से खाद लेने आई नेहा लोधी के साथ महिला कांस्टेबल ने मारपीट की। वहीं सागर के बंडा में 18 दिन पहले खाद की किल्लत के विरोध में बंडा विधानसभा के पूर्व कांग्रेस विधायक तरवर सिं लोधी किसानों के साथ मंडी परिसर में धरने पर बैठे थे। उन्होंने कहा कि अभी पूरे प्रदेश में गेहूं-चना समेत रबी फसलों की बोवनी चल रही है, लेकिन किसानों को यूरिया और डीएपी नहीं मिल रही है। खाद की कालाबाजारी हो रही है। जिससे किसानों को अधिक कीमत पर खाद खरीदना पड़ रही है।

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