राजनीति और सिनेमा की दो हस्तियों का अचानक आगमन

राजनीति और सिनेमा की दो
हस्तियों का अचानक आगमन
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#विजयमनोहरतिवारी
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यह दादा माखनलाल चतुर्वेदी के नाम का आकर्षण ही है। अभी देखिए, दो महत्वपूर्ण हस्तियाँ भोपाल आईं और आते ही विश्वविद्यालय के परिसर में उनके आने की सूचना मिली। अवकाश का दिन था। न पहले से कुछ तय था, न कक्षाएँ थीं, न ऑफिस खुले थे, औपचारिक स्वागत के लिए भी कुछ नहीं था। मगर माखनपुरम के परिसर में जैसे उन्हें आना ही था।
दोनों विभूतियों के नाम हैं- प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक अनुभव सिन्हा और कवि-लेखक, जो केंद्र में मंत्री भी रहे हैं, डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक।
हिंदी सिनेमा में अनुभव एक अनुभव संपन्न निर्देशक हैं, जो मानवीय संवेदनाओं का दृश्यांकन कमाल का करते हैं। उनका सृजन प्रचलित हिंदी सिनेमा की लीक से हटकर है। वे जितने कल्पनाशील लेखक हैं, उनके भीतर का निर्देशक उससे भी दो कदम आगे है।
वे इन दिनों एक प्रकार की अध्ययन यात्रा पर हैं। छोटे शहरों के समाप्त होते सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों में जा रहे हैं। दर्शकों के बीच चुपचाप बैठकर आम दर्शक की तरह फिल्म देख रहे हैं। सिनेमाघर वालों से बात कर रहे हैं। छोटे शहरों के दर्शकों की दिलचस्पियों में आ रहे बदलावों पर बात कर रहे हैं। वे भारत के दूरदराज क्षेत्रों के जनजीवन को टटोल रहे हैं।
स्थानीय इतिहास के अनछुए प्रसंग ध्यान से सुन रहे हैं। वे ढाबों पर भोजन कर रहे हैं। टपरियों पर चाय पी रहे हैं। वे वर्षों से रात्रि भोजन बंद किए हुए हैं। मिठाई से तौबा है। बीसेक किलो वजन घटा लिया है। इन यात्राओं में पता नहीं उनकी क्या योजना है? मैंने पूछा भी नहीं। मगर कुछ पक जरूर रहा है। मुंबई का एक व्यस्त और सफल फिल्मकार आखिर क्यों सड़कों पर दिन-रात भटक रहा है?
वे रात के समय इंदौर-देवास-उज्जैन से होकर भोपाल पहुँचे और सीधे विश्वविद्यालय के प्रांगण में आ गए। ढेर सारी बातें कीं। कुछ इतिहास की, कुछ किताबों की, कुछ सिनेमा की, कुछ पिता के संस्मरण। उनका मन था कि विद्यार्थियों के बीच बैठें मगर संभव नहीं था और जाना भी था इसलिए अगली बार जल्दी ही आने का वादा करके निकले। वादा ठोस किया है तो तय है कि लौटकर आएंगे।
डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक रविवार की सुबह आए तो उनके लिए संभव था कि कुछ विद्यार्थियों से रूबरू हों। विद्यार्थियों का एक समूह उन्हें मिला भी। हरेक से उन्होंने परिचय लिया। कोई लखनऊ से, कोई तिनसुकिया से, कोई मुरैना से। उन्होंने देहरादून में बने देश के पहले लेखक गाँव की कहानी सुनाई।
उन्होंने बताया कि हिमालय की गोद में देश-दुनिया के लेखकों और रचनाकारों के लिए एक गाँव बसाया गया है। यहाँ 40 हजार किताबों का संग्रह है। नई पीढ़ी के रचनाकारों के लिए आवास की सुविधा है। पूरा निर्माण हिमालय की वास्तुकला पर केंद्रित है। कवि और पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी का स्वप्न था कि लेखकों के लिए एक ऐसा परिसर विकसित किया जाए। यहाँ हिमालय की लोक संस्कृति पर केंद्रित एक संग्रहालय भी बनाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया को एक विश्व बाजार के रूप में देखा जा रहा है। जबकि भारतीय दृष्टि बाजार की नहीं है, वह पूरे विश्व को एक परिवार मानती है। मीडिया को भी भारतीय दृष्टि से ही विश्व को समझने और देखने की जरूरत है। हम बाजार नहीं हैं। हम मनुष्य हैं। हमारी सभ्यता-संस्कृति और सरोकार एक दूसरे से साझे हैं। मीडिया में यही भाव जगाना जरूरी है ताकि भारतीय मूल्यों की महान विरासत आगे बढ़े।
उन्होंने दादा माखनलाल चतुर्वेदी की प्रतिमा का अवलोकन किया और शिलालेख के स्थान पर लगे “कर्मवीर’ अखबार के रचनात्मक प्रयोग को सराहा। उन्होंने लेखक गाँव को विश्वविद्यालय के साथ मिलकर भी कुछ रचनात्मक सृजन में अपनी भूमिका निभाने का प्रस्ताव भी रखा।
विश्वविद्यालय के बारे में दोनों अतिथियों को अच्छी जानकारी थी और उससे अधिक दादा माखनलाल चतुर्वेदी के व्यक्तित्व के बारे में ज्ञात था। पहली बार मुझे लगा कि यह विश्वविद्यालय मध्यप्रदेश मूल की ही किसी और विभूति के नाम पर भी सकता था, लेकिन एक भारतीय आत्मा की बात ही कुछ और है। जिन्होंने भी विश्वविद्यालय का नामकरण किया होगा, कितना सोच-विचारकर लिया गया सही निर्णय रहा होगा!
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