सिंपल साधारण सम्मेलन का परिणाम…
*सिंपल साधारण सम्मेलन का परिणाम…?*
राजेन्द्र सिंह जादौन
मेने कई शादी सम्मेलन कवर किए हैं धूल उड़ाती पंडाल की जमीन से लेकर नेताओं की पॉलिश लगी मंच तक। मैं उन सबका साक्षी हूँ। और साक्षी होने का अर्थ यह भी है कि आपकी आँखें सिर्फ देखती नहीं, समझती भी हैं।
कभी-कभी लगता है कि ये सामूहिक विवाह सम्मेलन अपने आप में एक नया राजनीतिक रीति–रिवाज़ बन गए हैं जहाँ शादी कम, शो-केस ज़्यादा होता है।
यह पहल अच्छी है बहुत अच्छी पर आजकल “अच्छी पहल” का भी वही हाल है जो “सरकारी योजना” का होता है: कागज़ पर चमकदार, ज़मीन पर साधारण, और मंच पर राजनीति के हल्दी-चंदन से सराबोर।
सम्मेलन इतना “सिंपल” था कि साधारण शब्द भी खुद शर्माकर कुर्सी के नीचे छुप जाए। पंडाल से लेकर पंडित तक में वो तीखा राजनीतिक स्वाद घुला हुआ था कि लगता था अभी कोई नेता माइक पकड़कर कह देगा “अगली बार वोट हमें ही देना, बेटी आपकी, फोटो हमारी!”
दूल्हे-दुल्हन कतार में थे, पर कैमरा? कैमरा अपने असली दूल्हे को ढूँढ चुका था एक तरफ बाबा रामदेव आलू से निकला घी बेच रहे थे… और दूसरी तरफ वही “बाबा”, जो औरत को “खाली प्लॉट” बताने में महारथ रखते हैं, ज्ञान बरसा रहे थे।
लगता था मानो विवाह सम्मेलन नहीं, आध्यात्मिक शॉपिंग मॉल हो जहाँ एक स्टॉल पर योगा, दूसरे पर उपदेश, बीच में कैमरा, और कोने में बैंड-बाजा जो सिर्फ जैसे-तैसे याद दिला रहा था कि भाई, मौका शादी का है!
जोड़े ढेरों थे पर रोशनी सिर्फ उन पर थी जिनका फोटो-एंगल “राजनीतिक रूप से उपयोगी” था।
ग़रीब जोड़े जिनके लिए ये पूरा कार्यक्रम बना था, वे तो मानो बैकग्राउंड प्रॉप्स हों। मंच पर गले मिलते लोग VIP थे, नीचे बैठकर गले में जयमाला थामे लोग VOTER।
सम्मेलन इतना सिंपल था कि मंच पर नेता, पंडाल में जनता, और बीच में कैमरा बस यही तीन लोग शादी में सबसे खुश दिखाई दे रहे थे।
शादी वाले जोड़े? उनकी खुशी तो फ्लैश के पीछे दब गई “अच्छा पोज़ दो बेटा… हाँ हाँ, नेता जी आ रहे… अब मुस्कुराओ…!”
और फिर कार्यक्रम का असली ‘परिणाम’? किसी की नई ज़िंदगी शुरू हुई लेकिन उसकी सुर्खियाँ किसी नेता की नई पब्लिसिटी बन गईं।
किसी बहू ने अपना मायका छोड़ा पर उसका वीडियो किसी बाबा की शिक्षा के साथ वायरल हो गया। किसी दूल्हे ने नई ज़िम्मेदारी ली पर उसके हाथ की मेहँदी से ज़्यादा चमक नेता के माइक पर दिखी।
आख़िर में साबित यही हुआ सम्मेलन साधारण था, पर उसका मकसद साधारण बिल्कुल नहीं। शादी तो बहाना थी मुख्य कार्यक्रम था रंगमंच पर राजनीति का अखाड़ा सजाना। वरना शादी में कैमरे को दूल्हा-दुल्हन से ज़्यादा “बाबाओं” में दिलचस्पी कब से हो गई…?
