लोकतंत्र के राजा चिरायु हों,चिरायु हों,चिरायु..! Sreeprakash dixit

——————————————-
खबर ताजा है पर अंदाज पुराना.! मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव सुन्दरलाल पटवा की मूर्ति का अनावरण करने भोपाल से सटे मंडीदीप आने वाले हैं.इस पर जुट गया पीडब्लूडी का अमला वहां की सड़क को संवारने. इस गलतफहमी में मत रहिएगा जब आप वहां से गुजरेंगे तब सड़क ऐसे ही सजी संवरी मिलेगी.कारण यह की भैया को भरमाने के लिए तदर्थ तौर से सड़क को सँवारा जाएगा और एकाध रोज में ही इसके चीथड़े उड़ने लगेंगे और यह फिर से हमारे आपके चलने लायक हो जाएगी.तो यह है लोकतंत्र के जनसेवकों के शाही ठाठबाट जिनके आगे पुराने राजा नवाबों के जलवे भी फीके नजर आएंगे.ऐसी नौटंकी मामा शिवराज के दौर में भी होती थी.
उनको भी जहाँ-जहाँ मोटर से जाना होता सरकारी अमला सड़क को अमेरिका जैसी बनाने में जुट जाता था इसी कवायद के चलते शिवराज को प्रदेश की सड़कें अमेरिका की सड़कों से बेहतर नजर आईं थीं.जिस पर उनका खूब मजाक उड़ा था.कोलार के दशहरा मैदान पर उनकी सभा होने पर कार को गड्ढों से बचाने के लिए रातोंरात मुख्य मार्ग से मैदान तक सड़क का डामरीकरण किया गया था जिसके अगले दिन परखच्चे उड़ गए.मुख्यमंत्री रहते ना शिवराज ने आदेश दिया,ना अब मोहन यादव ने की सड़कों की मरम्मत का नाटक बंद कर दिया जाए.
मुख्यमंत्री मोहन यादव के निर्देश हैं की मंत्रालय परिसर में हैलीपैड बनाया जाए ताकि बाहर से आने पर एअरपोर्ट से वे सीधे पहुँच सकें.उनका मानना है की इससे आम लोंगो को परेशानी नहीं होगी जिन्हें अभी मेरे कारकेड के गुजरने के लिए रोक दिया जाता है.शिवराज ने भी मंत्रालय और उनके बंगले में हैलीपेड़ निर्माण के निर्देश दिए थे ताकि उनके काफिले के बंगले/मंत्रालय आनेजाने से जनता को होने वाली परेशानी से बचा जा सके.पर ना शिवराज ने ना मोहन यादव ने निर्देश दिया की राजधानी और अन्य शहरों में उनकी आवाजाही के समय गाड़ियों का काफिला ना हो सिवाय सुरक्षा की एक दो गाड़ियों के.
भोपाल से बाहर यादव केबिनेट की शाही अंदाज में हो रही बैठकों आदि से सत्ताधीशों को लोकतंत्र के राजा नहीं तो क्या कहें..? इस बार राज्यपाल मंगुभाई ने 15 अगस्त को पचमढ़ी के राजभवन में तिरंगा फहराया.कईयों के लिए यह नयी जानकारी होगी की एमपी में दो राजभवन हैं.भोपाल मे 25/30 एकड़ मे फैला राजभवन तो दूसरा 22.84 एकड़ मे फैला पचमढ़ी मे,जो कभी गर्मियों मे सूबे की राजधानी हुआ करती थी.सवाल है की राजधानी शिफ्ट होना बंद होने पर अन्य बंगलों की तरह इसे भी जनउपयोगी ऑफिस या होटल आदि में क्यों नहीं बदला गया.?(पत्रिका नवदुनिया/दैनिक भास्कर की खबरें)
