80 पर करते ही आदमी जिंदगी से दूर एवं मौत के पास बढ़ाते जाता है।Radhey shyam sabbo
–चिंतन-
80 पर करते ही आदमी जिंदगी से दूर एवं मौत के पास बढ़ाते जाता है। इस उम्र में मौत की बात उम्र दराज को विचलित करने लगती हैं। ऐसे सवाल चिंता एवं दुख के कारण बन जाते हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि मेरी सोच इस सामान्य दुनियादारी के सोच सी नहीं है । हाँ यह सही है कि पहले वैसा था । मैं अब मौत की बातें और वह भी स्वयं की मौत के खयालों को डरावना , विचलित करने वाला , चिंता में डुबोने वाला, और अधिक जीने को मिल जावे अंतिम समय ऐसी लालसा रखने वाला नहीं रहा । कई वर्षों से पढ़ा,लिखा , सुना और मनन कर प्रभु की कृपा से मैं कुछ वर्षों से यह कह सकता हूं कि मैं मृत्युंजय हो गया हूं। मेरा मानना हे कि यदि मौत आज भी आ जावे तो वह मेरे लिए स्वागतीय है। मुझे स्वयं आश्चर्य होता है कि मेरा ऐसे जीवन के प्रति सकारात्मक सोच कैसे विकसित हो गया ? मैं कोई साधु संत या पहुंचा हुआ ज्ञानवान नहीं हूं। पर प्रभु कृपा से जो मौत के बारे में सोच विकसित एवं उस पर पूर्ण विश्वास, आस्था, हो गई है उसने मुझे उस आदर्श एवं आनंद के झोन में डाल दिया । मैं अब शरीर एवं आत्मा को अलग-अलग करने के प्रयास में जुटा हूं। मैने मृत्यु भी मृत्युर्मा अमृतमगमय के मंत्र को रोजाना अपने प्रार्थना में अर्थ सहित आत्मसात करने का प्रयास किया है। मैंने अपने होने के अहंकार को विसर्जित कर मैं विशाल प्रकृति का एक अत्यंत छोटा नगण्य भाग हू ,उसकी इस बड़ी रचना का एक भाग हूँ।वह मुझे उम्र पूरी होने पर जिस स्थिति में रखेगा उसके लिए तैयार हूँ । मेरा मानना है कि आनंद उपभोग में नहीं सकारात्मक सोच में है । आनंद एक ऐसा विषय है जो बाहरी आवलंबो पर नहीं वरन आपके मानस के सोच पर निर्भर है। मान्यता अनुसार 84 करोड़ योनियों में जिस योनि में प्रकृति डाले मैं उन सब के लिए अभी से तैयार हूं । मैं नैननछिनदति वाले गीता के श्लोक को पूरी तरह मानता हूं ,कि मेरे
अंदर जो एक भाग है वह अजर अमर हे और वह शसक्त है। मौत मेरे लिए अब भय का कारण नहीं वरन एक नई दुनिया में प्रवेश की प्रक्रिया है । हां मैं मरना चाहता हूं यह कहना गलत है। लेकिन जब तक जीऊं एक सार्थक जिंदगी जीऊं यह अभिलाषा जरूर है। मेरी अभी 84 साल की जिंदगी जो गुजर रही है वह सुख सुविधा एवं आनंद के भावों से लबालब है। “मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया” के भाव, “जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया” के गीत तथा जो प्राप्त है वह पर्याप्त है का संतोष तथा जो हो रहा है वह भगवान की इच्छा का संयोग है एसे भावों से लबालब है ।
मैं भगवान को धन्यवाद देता हूं के उम्र के इस सौंपान समयानुकूल वह मुझे सकारात्मक सोच देते जा रहा हूं।
