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लेकिन, आज की गर्राती, इतराती और भैराती ‘जवानी’ कहाँ सुनती और समझती है…ऊपर से, ‘अकेली-औलाद’ का तमगा,उन्हें मां-बाप की ‘आँख का तारा’ बना देता है…जो मांगा, वह तत्काल हाजिर… भला क्यों…?? जो ‘अभाव’ मां-बाप ने भोगा है, वह ‘भोगमानी’ मेरे लाड़ले को न भोगना पड़े…’मेरे यार-दोस्तों से मैं क्या कम हूँ ‘ मुझे भी ‘हाई-स्पीड’ मोटर-बाइक चाहिए…मां-बाप का लाड़ उनकी ‘कमजोर-नस’ बन कर लाड़ले की तुष्टिकरण के रूप में, उन्हें उन्हीं की ‘मौत का सामान’ मोहैया करवा दिया जाता है और एक दिन अचानक ‘दुर्घटना’ की खबर,उन्हीं मां-बाप को रोते-बिलखते छोड़ देती है। अब या तो आपके यहाँ ‘औलाद’ की सालाना-फसल होती हो, तो अगली-फसल का इंतजार करो…नहीं ‘सूखी और पड़ती’ जमीन जिस पर हल भी नहीं चलाया जा सकता है, तो फसल कहाँ बोई जाएगी…?? बेटे के कर्मों को रोकर ‘भगवान’ को या फिर, अपनी ‘खोटी-किस्मत’ को कोसकर चुप बैठ जाओ…!! (टिप्पड़ी: अगर, किसी को इस लेख से चोट पहुंचे तो माफ करना। मगर, इस प्रकार की ‘लापरवाह’ और ‘गैर-जिम्मेदाराना’ नवजवानों को शायद कुछ समझ आ जाए और सड़क पर अपनी जान और दूसरों की भी जान को संकट में न डालें। साथ ही, मां-बाप भी अपने लाड़-प्यार की सीमा को न लांघें)

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