जब महात्मा गांधीजी ने भोपाल में  समझाया था रामराज्य का अर्थ

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जब महात्मा गांधीजी ने भोपाल में

समझाया था रामराज्य का अर्थ

बेनजीर मैदान में उमड़ा जनसैलाब, राहत मंज़िल में गूंजे प्रार्थना गीत

अलीम बजमी, 02 अक्टूबर 2025 भोपाल।

राष्ट्र पिता महात्मा गांधी ने 96 साल पहले भोपाल में कहा था- “स्वराज्य तभी संभव है, जब हिंदू-मुस्लिम एकता और अस्पृश्यता का निवारण होगा।” इस दौरान उन्होंने रामराज्य का अर्थ समझाया था। हिंदू- मुस्लिम एकता पर जोर दिया था। महात्मा गांधी जब पहली बार भोपाल आए थे, तब सितंबर का महीना था। मानसून की रुखसती थी तो शहर की सड़कों, बाज़ार की गलियों में तांगे की टापें गूंजती थीं और मस्जिदों की अज़ान के साथ मंदिरों की घंटियां एक साथ बज उठती थीं। यही भोपाल उस ऐतिहासिक सुबह का गवाह बना, जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी यहां पहुंचे।

खादी में सजा शहर

10 सितंबर 2029 को गांधीजी की आमद के दौरान भोपाल रियासत के नवाब हमीदुल्ला खां ने हुक्म सुनाया कि पूरा शहर खादी में नज़र आना चाहिए। दुकानों के पर्दे से लेकर स्वागत पंडाल तक, सबकुछ सफेद खादी से सजाया गया। यह नज़ारा आज़ादी की उस अलख को दर्शा रहा था, जिसे गांधीजी पूरे देश में जगा रहे थे।

बेनजीर मैदान का दृश्य

पुराने शहर के बेनजीर मैदान की ओर जाने वाले रास्तों पर भीड़ उमड़ पड़ी थी। कुछ लोग गलियों से पैदल ही निकल पड़े। तांगे खचाखच भरे हुए थे। जब गांधीजी वहां पहुंचे, तो मैदान लबालब भरा था—करीब दस हज़ार लोग, जिनमें अमीर-गरीब, हिंदू-मुसलमान, सभी वर्गों के लोग शामिल थे। गांधीजी मंच पर आए। उनकी साधारण धोती और लाठी देखकर भीड़ स्तब्ध रह गई—इतनी सादगी में भी इतनी बड़ी ताक़त। तालियों और नारों से गूंजते मैदान में जब उनकी आवाज़ सुनाई दी, तो मानो समय ठहर गया।

उन्होंने कहा—

“रामराज्य का मतलब हिंदू राज्य नहीं है। मुसलमान भाइयों से मैं कहना चाहता हूं कि वे इसे गलत न समझें। मेरे लिए राम और रहीम में कोई अंतर नहीं। सत्य और सत्कार्य ही मेरे ईश्वर हैं। स्वराज्य तभी संभव है, जब हिंदू-मुस्लिम एक हों और अस्पृश्यता का अंत हो।”

यह संदेश सिर्फ़ शब्द नहीं था, बल्कि भीड़ में बैठे हर शख़्स के दिल की गहराई तक उतर गया।

राहत मंज़िल की प्रार्थना सभा

गांधीजी अहमदाबाद पैलेस के नजदीक राहत मंज़िल में ठहरे। यह कोठी खादी से सजाई गई थी। यहीं शाम को प्रार्थना सभा हुई। उस सभा का दृश्य आज भी भोपाल की स्मृतियों में दर्ज है—मालिक और नौकर, राजा और प्रजा, अमीर और गरीब, सब एकसाथ ज़मीन पर बैठ गए। गीता, कुरान, बाइबिल और संतों की वाणी गूंजने लगी। उस क्षण ऐसा लगा जैसे धर्म और जाति की दीवारें टूट गई हों।

बीमारी और देखभाल

भोपाल प्रवास के दौरान गांधीजी को बुखार हो गया। डॉ. अब्दुल रहमान ने उनका इलाज किया और बाक़ायदा दो बार स्वास्थ्य बुलेटिन जारी किए। राहत मंज़िल में उनके लिए बकरी का दूध और खजूर का इंतज़ाम किया गया था।

ऐतिहासिक उपस्थिति

गांधीजी के साथ मीरा बेन, महादेव भाई देसाई और सी.एफ. एंड्रज थे। जमनालाल बजाज और डॉ. जाकिर हुसैन भी भोपाल पहुंचे।

बेनजीर मैदान में नागरिकों ने उन्हें 1035 रुपए और मोढ़ समाज ने 501 रुपए की थैली भेंट की।

दूसरी बार भी आए

गांधीजी 1933 में भी भोपाल आए। इस बार उनका प्रवास छोटा था—वे ट्रेन बदलने के लिए रेलवे स्टेशन पर रुके।

आत्मनिर्भरता का संदेश

भोपाल प्रवास हमें यह बताता है कि गांधीजी का हर कदम सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना जगाने वाला आंदोलन था। उन्होंने भोपाल की सरज़मीं पर जो संदेश दिया, वह आज भी गूंजता है—“स्वराज्य तभी संभव है, जब हिंदू-मुस्लिम एकता और अस्पृश्यता का निवारण होगा।”(स्रोत: माधव सप्रे संग्रहालय)

अलीम बजमी, भोपाल।

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