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मनुष्य ज़ब भी किसी काम को करता हैँ तब जाने अनजाने राजनीती उसमे प्रवेश कर जाती हैँ और एक दिन यह साधारण व्यक्ति बड़ा नेता बन जाता हैँ. पंडित मिश्रा कथावाचक को कुछ सालो पहिले कोन जानता था आज एक बड़े ज्ञानवान और प्रतिष्ठित व्यक्ति बन गये हैँ, लाखों भक्तो को एक समूह उनके साथ जुडा हैँ इसीलिए राजनेता भी इन पर कार्रवाही करने से डरते हैँ, अभी उनके यहाँ रुद्राक्ष का वितरण हुआ लाखों लोगो का जमावडा हुआ, भीड़ भाड़ मे सभवतः 2 लोगो की मौत भी हो गयी इसका दुःख पंडित जी को शायद नहीं हुआ, इस विषय के विशेषज्ञयो का कहना हैँ जब तक रुद्राक्ष सिद्ध नहीं हो जाता तब तक वह काम नहीं करता हैँ, उनके टोने टोटको ने खासकर युवाओं को मंदिर जाने को बाध्य किया किन्तु टोटको का प्रभाव नहीं मिलने पर भीड़ कम होने लगी. इस भीड़ की ईश्वर के प्रति निष्ठा नहीं थी अपितु टोन टोटको से अपना स्वार्थ सिद्ध करना था, एक लोटा जल शिवजी को चढ़ाने से क्या किसी को पुत्र मिल सकता हैँ, मुझे लगता हैँ नहीं, शिवजी को चढ़ी बेल पत्री को फिर से उठाकर चढ़ाने का उपदेश देना क्या फिर से निर्माल्य को शिवजी पर चढ़ाना नहीं हैँ! मेरे मतानुसार निर्माल्य का कोई महत्व नहीं होता, मैंने 74 साल की आयु मे शिव जी का ॐ नमः शिवाय का मन्त्र अपने पुरखो से सुना और हर हिन्दू इसी मंत्र का जाप करता हैँ. श्री शिवाय नमस्तुभयं मंत्र को खोजा गया और इसका जाप करने को कहाँ गया, मन्त्र शास्त्र निर्मित करते हैँ. कोई भी जानकार किसी मंत्र की स्थापना नहीं करता वरन सनातन मंत्रो के प्रयोग की सलाह देता हैँ, तीन घंटे की कथा मे एक घंटा तो भजन होते हैँ लगभग 1 घंटा कथा कहानी मे बीत जाता हैँ 1/2 घंटा पत्रों के पढ़ने मे खर्च हो जाता हैँ केवल 1/2 की अवधि मे 7 दिन का शिवपुराण की कथा का समापन हो जाता हैँ. पंडित जी राजनीती मे प्रवेश करने की चर्चा हैँ, टोना टोटका अंध विश्वास हैँ, भगवान कहते हैँ मेरे लिये कुछ मत करो बस मेरे पर विश्वास करो.ram kashturai

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