समाज में धर्म को दांव पर रखकर प्रथा व चलन बनायी गई मार्मिक तथा ह्रदय को छलनी करने वाली गंभीर समस्याओं पर संज्ञान लेने एवम निराकरण हेतु जल्द से जल्द शीघ्र ही पंचायत-कार्यालय में एक बैठक आयोजित

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प्रति,
आदरणीय, अध्यक्ष जी,
समस्त सिंधी सेंट्रल व क्षेत्रीय पंचायतें, भारत

विषय- समाज में धर्म को दांव पर रखकर प्रथा व चलन बनायी गई मार्मिक तथा ह्रदय को छलनी करने वाली गंभीर समस्याओं पर संज्ञान लेने एवम निराकरण हेतु जल्द से जल्द शीघ्र ही पंचायत-कार्यालय में एक बैठक आयोजित कर जागरूकता के लक्ष्य के साथ वार्तालाप के माध्यम से दिशा निर्देश जारी करने बाबत्!

प्रार्थना स्वरूप निवेदन!

महोदय जी,
जैसा की आपको विदित है की एक सबसे बड़ी मार्मिक व ह्रदय को छलनी करने वाली जो एक प्रथा आजकल समाज में चल रही है वह यह की किसी परिवार में परिजन आदि का परलोक-गमन हो जाने पर अथार्थ उसकी मृत्यु हो जाने पर कई जगह देखा गया है की मृत्यु के पश्चात जो बारह-दिन का शास्त्र में नियम बताया गया है उस नियम को भी देखने व सुनने में आया है की दरकिनार किया जा रहा है, मृत्यु ( देवलोक गमन ) के तीसरे दिन ही हर क्रिया को संपन्न करवाकर लोगों को मुक्त किया जा रहा है, अब यहाँ देखने व सोचने वाली बात यह है की कुछ स्थितियों में यह कार्य शायद शास्त्रों में बताया गया हो एवम संभव हो लेकिन अगर वो स्थितियां ना होते हुए भी इस कार्य को प्रथा या चलन बना लेना कहाँ तक उचित है????*बड़े ही दुख की बात है।

एवम एक और दूसरी गहन समस्या जिस समस्या को लोग समस्या ना मानकर एक मिलने-जुलने के समारोह का रूप मानते हैं। यह एक ऐसा समारोह होता है जिसमें भोजन आदि की व्यवस्था कर लोगों को बड़ी ही इज्जत व मान-सम्मान के साथ आमंत्रित किया जाता है। अब यहाँ सबसे बड़ी बात यह है की यह कोई शादी-ब्याह, हर्ष उल्लास का समारोह नहीं होता यह समारोह होता है किसी परिवार में परिजन आदि का परलोक-गमन हो जाने पर अथार्थ उसकी मृत्यु हो जाने पर उसके निमित्त की जाने वाली कर्म-क्रिया के अंतिम दिन अथार्थ बारहवें व ( तेरहवीं ) के दिन का जिसे आज की आम भाषा में मृत्यु-भोज के समारोह का नाम दिया जाता है।

अब यहाँ सोचने व समझने वाली बात यह है की धन से संपन्न परिवार को इस प्रथा व इस समारोह से कोई दिक्कत व समस्या ना हो पर समाज में बनायी गयी इस प्रथा का गरीब व निर्धन परिवारों पर कितना बोझ पड़ता होगा यह केवल वह गरीब व निर्धन परिवार ही बता सकता है। क्यूंकि इस समारोह-रूपी प्रथा को नज़रअंदाज कर इसे ना करने पर समाज की नीची नज़रों का सामना भी उस गरीब परिवार को करना पड़ता है, जिससे की इनमें हीन-भावना का आना स्वाभाविक हो जाता है। अब यहाँ ध्यान देने की बात यह है की जिस समारोह की गम व शोक के माहौल में किसी भी रूप, अवस्था व प्रक्रिया में तथा किसी भी स्थिति में कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए ऐसी प्रथा को प्रचलन बनाये रखना कहाँ तक उचित है??

आदरणीय जी, मेरे द्वारा इन मार्मिक व ह्रदय को छलनी करने वाली समस्याओं का उल्लेख मेरे द्वारा लिखे गये लेख के द्वारा, मेरे द्वारा समाज के कल्याण हेतु बनाये गये वीडियो के द्वारा सोशल-मीडिया एवम समाचार-पत्रों के माध्यम से भी समाज को तथा समाज में बैठे जिम्मेदार व जवाबदार मित्र एवम भ्राताओं को होगा तथा मेरी व्यक्तिगत तौर पर भी व्यवहारिक रूप से वार्ता हुई होगी, परंतु कोई भी सकारात्मक जन-कल्याणकारी परिणाम अभी तक नहीं मिल पाया है। मेरे लेख की एवम समाचार-पत्रों में प्रकाशित प्रति भी मैं इस प्रार्थना पत्र के साथ संलग्न कर रहा हूँ।

मैं राकेश तुलसानी एक लेखक एवम समाजसेवी होने के नाते मेरा आपसे प्रार्थना-स्वरूप निवेदन है की आज समाज में व्याप्त इन *मार्मिक तथा ह्रदय को छलनी करने वाली गंभीर समस्याओं व मुद्दों के समाधान के लिए समाज को जागरूक करना एवम जागरूकता के लिए हरसंभव सेवाकार्य कर समाज को नेकी व परोपकार की, नवीन दिशा प्रदान करना अति आवश्यक है। अतःआदरणीय जी, मैं चाहता हूँ की समाज-कल्याण के इस सेवाकार्य में, धर्म के इस कार्य में, कंधे से कंधा मिलाकर आप व पंचायत मेरा साथ दें, तथा जल्द से जल्द शीघ्र ही पंचायत कार्यालय में एक बैठक आयोजित कर इन गंभीर समस्याओं के निराकरण हेतु जागरूकता के लक्ष्य के साथ वार्तालाप के माध्यम से दिशा निर्देश जारी करे।

मैं पूर्णरूप से उम्मीद व आशा करता हूँ की धर्म के इस महान सेवाकार्य में, समाज के कल्याण में जनहित की भावना के साथ आदरणीय जी, आप एवम पंचायत धरातल पर उतरकर अथार्थ जमीनी-स्तर पर समाज में जागरूकता लाने तथा समाज को नेकी की एक नवीन दिशा प्रदान करने हेतु आगे आयेंगी एवम मेरा साथ देगी।??

पूर्ण सहयोग व साथ की आशा के साथ!
लेखक- ( समाजसेवी )
–राकेश तुलसानी।
मो. 7987035487.
भोपाल ( म. प्र. )

 

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