आपातकाल-मीसा (श्याम चौरसिया )
पीपली चौराहा की रौनक देखने मे मस्त गोखरू की मस्ती को एक कार सवार अति बुजुर्ग के संबोधन ने भंग किया। यदि में पहचान पा रहा हूं तो तुम गोखरू हो। गोखरू भौचक्का। वह उन बुजुर्ग महाशय को नही पहचान पाया। शायद बुजुर्ग गोखरू की दुविधा भांप गए। अरे में पांडेय- तहसीलदार।
ओर गोखरू तुरंत 40 साल पीछे का सफर करने लगा। उसने पांडेय जी चरण रज ली। गोखरू ने घर चलने,भोजन करके जाने का आग्रह किया। लेकिन पांडेय जी कार से नीचे नही उतरे।
पांडेय जी ने तत्कालीन नेताओं, अधिकारियों, व्यापारियों, गणमान्य जनों की खैर खबर ली। उनमें 99 प्रतिशत शरीर तज चुके थे।
पांडेय जी के काल मे नगर कस्बा भी नही था। सड़के आज की तरह कंसुरी आवाजे नही निकालती थी। भोंपू नही बजते थे।आज हर मिनिट में 100 से अधिक वाहन आर पार हो जाते है। उस वक्त दिन भर में 100 सायकलें पार् नही होती थी। जरूरतें सीमित थी। रिश्ते आज की तरह पाउच नही बल्कि आत्मीय, सवेदनशील हुआ करते थे।
पांडेय जी उसी काल के शिखर थे। पांडेय जी को शायद उस काल की विभूतियों के गोलोक वास् का अनुमान था। इसलिए पूछ ताछ के दौरान ज्यादा शौक प्रकट नही किया उन्होंने।
उस काल की विभूतियों में एक भी जीवित न होने के गम को हल्का करने के लिए पांडेय जी ने मिसाइल दागी। देख लो। खरे पसीने की कमाई की काया आज भी रस दे रही है। वाकई 90 के आसपास के पांडेय जी की चमक, दमक 70 से ज्यादा की चुगली नही कर रही थी।
गोखरू के श्रीमुख से बहुत बड़े नुकसान की तोहमत सुनते ही पांडेय जी हैरत में पड़ गए। अरे भाई तुम तो विद्याथी थे। मैने कौन सा नुकसान कर दिया, तुम्हारा?
सर! यदि आप मीसा काल मे थाने से नही भगाते तो आज में भी मीसा बंदी की पेंशन पा रहा होता। और पांडेय जी ठहाका लगा के हस दिए। तो ये नुकसान मेने किया? में दोषी??
असल में तत्कालीन विधायक की आंखों के कांटे हम 07 विद्यार्थियों के जीवन को बर्बाद करने की नीयत से हमे विधायक ने खिंचवा थाने में अन्य दर्जनों बेकसूर लोगों के साथ बंद करवा दिया था।
तहसीलदार पांडेय ने थानेदार को जिंदगी की ऊंच नीच बता हम सातो को थाने से भगवा दिया था। थानेदार के विधायक के कुपित होने का अंदेशा जताने के जबाब में पांडेय जी ने कहा था- किसी भी नेता की उम्र 05 साल से ज्यादा जनता तय नही करती। जबकि संविधान ने तुम्हे और मुझे 58 साल तक जनसेवा का वरदान किया है। वरदान का दुरुपयोग करके हम क्यो किसी चढ़ती बेल को असमय काट भविष्य बर्बाद करे। यदि ये छोकरे लपेट दिए गए तो किसी काम के नही बचेंगे। इनका कसूर हे क्या?
थानेदार रघुवंशी को भी पांडेय जी के तर्क में दम लगा।
ओर हम सातो बाहर।
यदि सातो बाहर नही आते तो गोखरू के बाकी साथियों की सरकारी नोकरिया नही लगती। न वे आगे पढ़ पाते।टूट जाते। भीड़ में खो तबाह हो जाते।घर नही बसते।
सर! किया न आपने नुकसान?
हा आज के हिसाब से तो नुकसान ही है। लेकिन मीसा काल की अपील भिन्न न होती तो इतिहास नही रचा जाता।कीर्तिमान नही बनते। नेतृत्व नही उभरता। ओर तुमने उसकी कीमत चुकाई।
पांडेय जी ने न चाय ग्रहण की न किसी अन्य को बुलाने का मौका दिया।
गोखरू तुम्हारी काया पर रत्ती भर भी चर्बी चढ़ जाती तो मेरी छटी इंद्री इस भीड़भाड़ में कार नही रोकने देती। ये नगर में कभी भूला नही हूं। बस गम हे तो उस दौर के लोगो के न होने का। नियति के चलते चक्र से कौन, कब तक मुकाबला कर सकता है?
और पांडेय जी बीते कल को कुछ पल के लिए जिंदा करके ओझल हो गए।
