सुरेश गुप्ता : एक रहस्य की आमद का समय !

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सुरेश गुप्ता : एक रहस्य की आमद
का समय !
सुरेश गुप्ता मेरे जनसंपर्क विभाग के साथी हैं . अभी कुछ समय पूर्व सेवानिवृत्त हुये हैं . हमारा लंबे समय का साथ है . कल की डाक ने उनका एक ऐसे “ गहरे राज “ का पर्दा फाश किया जो सचमुच मुझे पहले नहीं पता था . उनकी कविताओं का पहला संग्रह मिला . यह आमद इस रहस्य को भी उद्घाटित करती है कि वे कितनी इन्द्र धनुषी संवेदनाओं से भरपूर है . उन्होंने समय को सहेजा है . शायद यही कारण है कि उनके कविता संग्रह का नाम ही “असमय का अँधेरा “ है . शायद उसकी आमद का यह सही समय है .

सुरेश को मैं एक सिध्दहस्त क़लमकार के रूप में जानता हूँ . समाचारों ,लेख और म.प्र . संदेश पर उनके उस्तादी हाथ खूब चले है . वे ठीक-ठाक प्रशासक भी रहे है . म. प्र. विधान सभा और मुख्यमंत्री प्रेस प्रकोष्ठ में दायित्व भली प्रकार से निभाये हैं . पर कवित्व का पक्ष भी सचमुच अनोखा और दिल को छूने वाला है .
उनकी कविताओं की रेंज में सदी का युध्द – करोना से लेकर उनके जन्म स्थान खिलचीपुर .अनन्य साथी -मनोज पाठक और महेन्द्र गगन के चले जाने का दुख . माता पिता के न रहने को जिस प्रकार से चित्रित किया है ,वह उनका अलग भाव संसार दिखाता है .पुत्र मनु की पाती -शुरूआती पंक्तियां आकर्षण लेकर आती हैं . आप अतीत में चले जाते हैं . देखिए-
मनु
तुमने पोस्टमैन नहीं देखा
दुख सुख बा्टना और बाँचना
ज़रूरत होने पर लिखना
तुमने छिलक छाई
नदी -पहाड़
राजा-मंत्री – चोर सिपाही का
खेल नहीं खेला .
अंतिम कविता उनके आजीवन कर्म के आवश्यक तत्व भी हैं . बाँचिये-
कैसे और कहाँ?
कोई कुछ भी माने
मैं ,मैं हूँ और रहूँगा
बगैर यह जाने कि
कैसे और कहाँ रहूँगा .

शरद बिल्लौरे की कविता – यदि किसी अच्छे कवि की सिगरेट पीकर अच्छी कविता लिखी जा सकती तो बेचारे अच्छे कवि कपड़े पहनने को तरस जाते . यह कहना होगा कि सुरेश गुप्ता ने अपनी ही सिगरेट पी है .

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