प्रसंगवश▪️शाह का ‘शाही टुकड़ा” और मालवीय का ‘चिन्नामित्त’…!केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के न्यौते पर पत्रकारों के भोज को लेकर चर्चा छिड़ी हुई है।
दिल्ली (12/06/2025) (राजेश पाठक )अभिमत:
१) राजनीति और पत्रकारिता का हमेशा से चोली-दामन वाला साथ रहा है और आगे भी रहेगा।
पत्रकारों का सत्ता या विपक्ष के नेताओं के बुलावे पर आना जाना हमेशा होता रहा है, होते रहना चाहिए।
२) अमित शाह के बुलऊआ पर वहां जाना और ‘शाही टुकड़ा’ फटकारना कोई बहुत बड़ी या बुरी बात नहीं है।
मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, अखिलेश, तेजस्वी से लेकर राज्यों की राजधानियों तक सूबा सरदार ऐसी दाल बाटी चूरमा वाली ‘गोठ’ करते ही रहते हैं।
इसमें न कोई शर्म की बात है और न ऐसी भेंटा-भांटी से कोई असमान टूट पड़ता है।
लोकसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी ने भी पत्रकारों को चाय पर बुलाया था। तब हम जैसे सिरफिरे ने
‘शुद्ध हिंदी में क्या क्या नहीं सुनाया’ था इसकी कल्पना भी आप नहीं कर सकते।
हमने तो यहां तक कह दिया था कि ‘निसाखात्तर’ रहिए…अगर भूले भटके आप कभी सत्ता में आ गए तो सबसे कठिन सवाल पूछने वाले हमही होंगे।
(क्या ‘धनुषटंकार’ पर झुके किसी ‘वेदपाठी’ ने ‘शाहनशाह’ के दस्तरखान पर ऐसा कुछ कहा होगा.?)
हां शर्मनाक बात ये जरूर है कि पत्रकारों (?) ने वहां शाह के नाम राशि ‘मालवीय’ के प्रवचनों को ‘चिन्नामित्त’ (चरणामृत) समझ कर जिस तरह अंजुरी में भर कर पिया। उसे देख कर किसी भी सभ्य मनुष्य को उबकाई आ सकती है।
जो ‘मालवीय’ इस देश में दिन रात झूठ, घृणा का कीचड़ फैलाने का सबसे बड़ा स्त्रोत है उसका मार्गदर्शन प्राप्त करने वाले आगे क्या करेंगे ये समझना कोई ‘रॉकेट सांइस’ नहीं है।
फेक न्यूज़ की फैक्टी के CEO, CMD, व्हाट्सएप विष’विद्यालय के कुलाधिपति से मार्गदर्शन लेने वाले विद्यार्थी आने वाले दिनों में कैसी पत्रकारिता करेंगे यह समझना ‘बरमूडा त्रिकोण’ जैसा रहस्य नहीं है।
ये लोग अब तक कैसी पत्रकारिता कर रहे हैं यह समझने लिए आपको ‘स्टीफन हॉकिंस’ होने की जरूरत नहीं है। एक सच्चा भारतीय,नागरिक और सुधी पाठक, दर्शक होना ही पर्याप्त है।
आप अच्छी तरह जानते हैं कि ये लोग पिछले दस ग्यारह साल में जैसा झूठ और नफ़रत अब तक बांट रहे थे वही काम आगे भी निष्ठापूर्वक करते रहेंगे।
३) राजनेताओं और ख़बरनवीसों की औपचारिक, अनौपचारिक मुलाकातें भी होती हैं, होती रहेंगी, होना भी चाहिए।
ऐसी मुलाकातों में कभी सवाल जवाब भी होते हैं, कभी नहीं भी। कभी कभी ऑफ द रिकॉर्ड सूचनाएं साझा की जाती हैं। कभी इशारों में कुछ बता दिया जाता है जो पत्रकार के लिए ख़बर भी हो सकता है।
सूचना, इशारे या ऑफ द रिकॉर्ड को आपको कैसे इस्तेमाल करना है यह आपके पत्रकारीय विवेक पर है। आपको किसी व्यक्ति, दल या समूह का टूल/ औज़ार बनना है या इससे बचे रहना है यह आपके कौशल और पत्रकारीय नैतिकता पर है।
अगर आप बिना टूल बने ‘सार सार को गहि रहै थोथा देय उड़ाय’ वाली कला नहीं जानते तो आप कब ‘हरीराम’ बना लिए गए आपको पता भी नहीं चलेगा।
४) सन 2014 में महामानव द्वारा सृष्टि के निमार्ण और भरत भूमि पर अमृतकाल के शुभारम्भ के पहले प्रधानमंत्री,राष्ट्रपतियों के साथ विदेश यात्राओं में भी पत्रकारों के दल जाते थे।
आते जाते में हवाई जहाज में ही ‘ऑन बोर्ड प्रेस कॉन्फ्रेंस’ होती थी।
खूब खुल कर सवाल होते थे।
हमने भी तत्कालीन राष्ट्रपति की कंबोडिया, लाओस यात्रा में ‘एयर इंडिया वन’ में उड़ते हुए कठिन सवाल पूछे थे।
फिर छप्पन इंची महाबली ने न जाने किस डर से प्रेस से दूरी बना ली।
अब ‘आम चूस कर खाते हैं’ या ‘आप थकते क्यों नहीं’ जैसे सवालों वाले पत्रकार (?) उनके सबसे हिजगरे हैं।
ये वो जमात है जो सत्ता के श्रीमुख को देख कर ही ऑर्गेज्म में डूबता उतराता रहता है। ये गोदी मीडिया, भोंपू मीडिया वाले लोग सवाल पूछने से पहले ही स्खलित हो जाते हैं और फिर उसी द्रव्य में डुबकी लगाकर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।
याद कर लीजिए कि इस जमात ने पहलगाम हमले और ऑपरेशन सिंदूर के समय जितनी नफ़रत और झूठ परोसा उसका सानी दुनिया में दूसरा नहीं मिलेगा।
इसलिए अगर वे शाह के ‘शाही टुकड़े’ और मालवीय के ‘चिन्नामित्त’ में डूब कर प्रसन्न हैं तो उन्हें उनके हाल पर छोड़ दीजिए। अगर अब भी आप उनकी पत्रकारिता से कोई उम्मीद लगाए हैं तो मर्जी है आपकी, सिर है आपका। फोड़ते रहिए।
इति।
