आखिर कब समाप्त होंगी समाज में धर्म को दांव पर रखकर प्रथा व चलन बनायी गई मृत्यु ( देवलोक गमन ) के तीसरे दिन ही हर क्रिया को संपन्न करवाकर लोगों को मुक्त करने एवम बारहवें व ( तेरहवीं ) के दिन मृत्युभोज ( समारोह ) आयोजित करने की यह मार्मिक तथा ह्रदय को छलनी करने वाली गंभीर समस्याएं।

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*आखिर कब समाप्त होंगी समाज में धर्म को दांव पर रखकर प्रथा व चलन बनायी गई मृत्यु ( देवलोक गमन ) के तीसरे दिन ही हर क्रिया को संपन्न करवाकर लोगों को मुक्त करने एवम बारहवें व ( तेरहवीं ) के दिन मृत्युभोज ( समारोह ) आयोजित करने की यह मार्मिक तथा ह्रदय को छलनी करने वाली गंभीर समस्याएं।*

*लेखक- ( समाजसेवी )*

*–राकेश तुलसानी।*

 

*एक सबसे बड़ी मार्मिक व ह्रदय को छलनी करने वाली जो एक प्रथा आजकल समाज में चल रही है वह यह की किसी परिवार में परिजन आदि का परलोक-गमन हो जाने पर अथार्थ उसकी मृत्यु हो जाने पर कई जगह देखा गया है की मृत्यु के पश्चात जो बारह-दिन का शास्त्र में नियम बताया गया है उस नियम को भी देखने व सुनने में आया है की दरकिनार किया जा रहा है, मृत्यु ( देवलोक गमन ) के तीसरे दिन ही हर क्रिया को संपन्न करवाकर लोगों को मुक्त किया जा रहा है, अब यहाँ देखने व सोचने वाली बात यह है की कुछ स्थितियों में यह कार्य शायद शास्त्रों में बताया गया हो एवम संभव हो लेकिन अगर वो स्थितियां ना होते हुए भी इस कार्य को प्रथा या चलन बना लेना कहाँ तक उचित है????* *बड़े ही दुख की बात है!

 

एवम एक और दूसरी गहन समस्या जिस समस्या को लोग समस्या ना मानकर एक मिलने-जुलने के समारोह का रूप मानते हैं। मित्रों यह एक ऐसा समारोह होता है जिसमें भोजन आदि की व्यवस्था कर लोगों को बड़ी ही इज्जत व मान-सम्मान के साथ आमंत्रित किया जाता है। अब यहाँ सबसे बड़ी बात यह है की यह कोई शादी-ब्याह, हर्ष उल्लास का समारोह नहीं होता यह समारोह होता है किसी परिवार में परिजन आदि का परलोक-गमन हो जाने पर अथार्थ उसकी मृत्यु हो जाने पर उसके निमित्त की जाने वाली कर्म-क्रिया के अंतिम दिन अथार्थ बारहवें व ( तेरहवीं ) के दिन का जिसे आज की आम भाषा में मृत्यु-भोज के समारोह का नाम दिया जाता है।

 

अब यहाँ सोचने व समझने वाली बात यह है की *धन से संपन्न परिवार* को इस प्रथा व इस समारोह से कोई दिक्कत व समस्या ना हो पर समाज में बनायी गयी इस प्रथा का *गरीब व निर्धन परिवारों* पर कितना बोझ पड़ता होगा यह केवल *वह गरीब व निर्धन परिवार ही बता सकता है।* क्यूंकि इस समारोह-रूपी प्रथा को नज़रअंदाज कर इसे ना करने पर समाज की नीची नज़रों का सामना भी उस गरीब परिवार को करना पड़ता है, जिससे की इनमें हीन-भावना का आना स्वाभाविक हो जाता है। *अब यहाँ ध्यान देने की बात यह है की जिस समारोह की गम व शोक के माहौल में किसी भी रूप, अवस्था व प्रक्रिया में तथा किसी भी स्थिति में कोई जरूरत नहीं होनी चाहिए ऐसी प्रथा को प्रचलन बनाये रखना कहाँ तक उचित है??* यहाँ देखने, सोचने व समझने वाली बात यह है की *ऐसी प्रथाओं की जानकारी लंबे समय से समाज की क्षेत्रीय- पंचायतों व सामाजिक संगठनों के जिम्मेदार व जवाबदार बुद्धिजीवियों को होने के बावजूद भी वह स्वयम इन समारोह में शिरकत करते हैं* तथा इन दोनों प्रथाओं को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाते एवम ना ही इन्हें रोकने के लिए संकल्प लेकर कोई प्रयास करते हैं यह बड़े दुख की बात है। *मैं चाहता हूँ की देश की समस्त सिंधी-पंचायतें व समस्त सेवाभावी संगठन इस मार्मिक, ह्रदय को छलनी करने वाली गहन समस्याओं के निदान लिए समाज को जागरूक करने का सेवा-कार्य करें तथा लेख में वर्णित अधर्म का कार्य कर रही इन प्रथाओं व इस चलन को शीघ्र रोकने का हर संभव प्रयास करें। जिससे की इन दोनों मार्मिक समस्याओं पर पूर्णतः रोक लगाई जा सके। मेरा समाज के समस्त मित्र व भ्राताओं से भी प्रार्थना स्वरूप निवेदन है की आप सब लोग भी इन गहन व मार्मिक समस्याओं को दूर करने हेतु जागरूक होकर आगे आयें एवम धर्म का साथ देकर पुण्य के भागी बनें।* ??

*लेखक- ( समाजसेवी )*

*–राकेश तुलसानी।*

*मो. 7987035487.*

*भोपाल ( म. प्र. )*magzine kai. Liya

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