पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – भारत की कालजयी मृत्युंजयी सनातन वैदिक संस्कृति में वैश्विक एवं समष्टि कल्याण के स्वर समाहित हैं, इसलिए भारतीय वैदिक जीवन मूल्यों के प्रसार का आशय किसी सम्प्रदाय विशेष की समृद्धि नही, अपितु उच्चतर मानवीय मूल्यों की संस्थापना है। देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्रीयुत नरेन्द्र मोदी जी द्वारा आबूधाबी में स्वामी नारायण सम्प्रदाय द्वारा निर्मित भव्य एवं दिव्य हिन्दू मन्दिर का उद्घाटन न केवल संयुक्त अरब अमीरात अपितु सम्पूर्ण विश्व में सहिष्णुता, एकात्मता और पारस्परिक समभाव के नवीन युग का सूत्रपात करेगा। आज आबूधाबी में विश्व के अनेक मत सम्प्रदायों के प्रमुखों के साथ सद्भाव और विश्व शान्ति निमित्त आयोजित धर्म सम्मेलन में सनातन धर्म की महानता विषय कर शास्त्र सम्मत चर्चा कर अभिभूत हूँ ..! “आत्मवत सर्वभूतेषु” का भाव चिरकाल से ही भारतीय संस्कृति में जीवन मूल्यों का अभिन्न अंग रहा है। इसलिए हमारी प्रार्थनाओं में वैश्विक शान्ति के साथ-साथ सम्पूर्ण धरा, अंतरिक्ष एवं ब्रह्माण्ड के प्रत्येक अवयव में शान्ति और समन्वय के स्वर समाहित हैं। परमार्थ और सबका कल्याण भारतीय संस्कृति के मूल में है। इसमें लोक-कल्याण और लोक हित की भावना सर्वोपरि है। दूसरों के कल्याण और आनन्द में स्वयं के सुख की अनुभूति होती है। सबका हित हमारी संस्कृति का मूल आधार है। वेद भी कहते हैं – सब सुखी हों, सब स्वस्थ हों और किसी को भी दु:ख न हो। जब तक समाज में यह पवित्र भावना नहीं जागती तब तक सामाजिक समरसता का निर्माण नहीं होता। हमारी संस्कृति में समन्वय का तत्व आदिकाल से विद्यमान है। हम जो शान्ति पाठ करते हैं उसमें भी प्रकृति के सभी अवयवों की शान्ति की प्रार्थना सम्मिलित है। संस्कृति आभ्यान्तर है। यह भीतरी चीज है। इसमें परम्परागत चिन्तन, कलात्मक अनुभूति, विस्तृत ज्ञान एवं धार्मिक आस्था का समावेश होता है। संस्कृति जीवन की विधि है। संस्कृति हमारे जीने और सोचने की विधि में हमारी अन्तरस्थ प्रकृति की अभिव्यक्ति है। भारतीयों की सुन्दरता, संवेदनशीलता, सहनशीलता उन संस्कृतियों के मिश्रण में निहित है, जिसकी तुलना एक ऐसे उद्यान से की जा सकती है, जहाँ तरह-तरह के रंगों और वर्णों के फूल हैं। यहाँ सबका अपना अलग-अलग अस्तित्व बना हुआ है और स्वयं खिलते हुए ये भारत रूपी उद्यान में सुन्दरता बिखेरते रहते हैं …।
पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – सबसे प्राचीन है – भारतीय संस्कृति। विश्व शान्ति के लिए इसलिए है – अहम्। भारतीय संस्कृति व्यक्ति, समाज व राष्ट्र के जीवन का सिंचन कर उसे पल्लवित, पुष्पित तथा फलयुक्त बनाने वाली चिरप्रवाहिता सरिता है। हमारी संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि भारतीय संस्कृति यूनान, रोम, मिस्र, सुमेर और चीन की संस्कृतियों से भी प्राचीन है। विश्व के बड़े से बड़े विद्वानजन व शोधकर्ताओं ने भारतीय संस्कृति को ही विश्व की सर्वाधिक प्राचीन संस्कृति कहा हैं। प्रत्येक राष्ट्र की पहचान उसकी सांस्कृतिक धरोहर तथा सामाजिक मूल्यों से होती है। भारतीय संस्कृति का स्वरूप निःसंदेह रूप से समन्वयवादी तथा लोक – कल्याणकारी रहा है। संस्कृति मानव-चेतना की स्वस्तिपरक ऊर्जा का ऐसा ऊर्ध्वमुखी सौन्दर्यमयी प्रवाह होता है।जो व्यक्ति के मन, बुद्धि और आत्मा के सूक्ष्म व्यापारों की रमणीयता से होता हुआ समष्टि – कर्म की सुष्ठुता में साकार होता है। संस्कृति का एक रूप देश-काल सापेक्ष है। तो दूसरा देश-काल निरपेक्ष।सचमुच भारत एक महासागर है। भारतीय संस्कृति महासागर है। विश्व की समस्त संस्कृतियाँ आकर इसमें समाहित हो गई है। आज जिसे आर्य संस्कृति, हिन्दू संस्कृति आदि नामों से जाना जाता है, वस्तुतः वह भारतीय संस्कृति है। भारतीय संस्कृति स्थिर एवं अद्वितीय है जिसके संरक्षण का उत्तरदायित्व वर्तमान पीढ़ी पर है। इसकी उदारता और समन्वयवादी गुणों ने अन्य संस्कृतियों को समाहित तो किया हैं, किन्तु अपने अस्तित्व के मूल को सुरक्षित रखा है। एक राष्ट्र की संस्कृति उसके लोगों के हृदय और आत्मा में बसती है। सर्वांगीणता, विशालता, उदारता और सहिष्णुता की दृष्टि से अन्य संस्कृतियों की अपेक्षा भारतीय संस्कृति अग्रणी स्थान रखती है ..!