बाबा जी का बलिदान

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?अगिया बेताल?
क़मर सिद्दीक़ी

बाबा बागेश्वर ने “आध्यात्मिक बलिदान” की बेहतरीन मिसाल दे डाली। आपका पेट भरा हो, फिर किसी भूखे को खाना खिलाना कौन सी बड़ी बात है। मज़ा तो जब है कि, आप भूखे होते हुए भी,अपने सामने की थाली किसी को अर्पित कर दें।उन्होंने कुंभ हादसे में मरने वालों को परोक्ष रूप से बधाई दी कि, वे इतनी आसानी से मोक्ष को प्राप्त हुए, और सोने पे सुहागा ये कि, पवित्र गंगा के तट पर महा कुंभ के सुअवसर पर। उनके बलिदान कि भुरी, भुरी प्रशंसा इसलिए भी होनी चाहिए क्योंकि उन्होंने मोक्ष का अवसर होने के बावजूद ख़ुद को अलग करते हुए दूसरों को मौक़ा दिया। इसमें मोक्ष प्राप्त करने वालों के परिवारों को धीरेन्द्र शास्त्री का ऋणी होना चाहिए कि, उन्होंने उन्हें देशद्रोही घोषित होने के कलंक से भी बचा लिया। उन्होंने ही सब से पहले घोषणा की थी कि, जो इस महाकुंभ में शिरकत नहीं करेगा, वो देशभक्त की श्रेणी से बाहर माना जाएगा। यद्यपि वो चाहते तो अपने पर्चे के माध्यम से इस आगामी हादसे को टाल भी सकते थे, पर जब क़ुर्बानी का जज़्बा हो तो अपने दिव्य ज्ञान को किनारे रखना पड़ता है।
अब स्वामी मुकतेश्वरानंद उनके इस बलिदान पर प्रश्न उठा रहे हैं। उनको ऐसा करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है, क्योंकि वो कांग्रेसी खेमे के माने जाते हैं। शास्त्री जी तो किसी भी दल की ब्राडिंग में विश्वास नहीं रखते, ये बात और है कि, उनका आध्यात्मिक, और धार्मिक आचार-विचार भाजपा की “सनातनी” विचारधारा से काफी मेल खाता है, और ये इत्तेफ़ाक़ मात्र है । वैसे ये बयान यदि वो मृतकों के परिजनों के सामने देते तो हो सकता है, उनके दुःखों में कुछ कमी आती।

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