☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 27 दिसम्बर 2024 (शुक्रवार)

0
Spread the love


पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्

।। श्री: कृपा ।।
? पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – वर्तमान में जीना और अपने प्रयासों को उच्च लक्ष्यों की ओर केन्द्रित करना ही जीवन को सार्थक बनाता है। सत्यनिष्ठा और यथार्थवाद हमें सही दिशा में ले जाते हैं, जबकि उत्साह, साहस, धैर्य और आत्म-विश्वास हमें हर चुनौती का सामना करने की शक्ति प्रदान करते हैं। समय के साथ स्वयं को ढालना और अपने संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करना ही सफलता का मूलमंत्र है ! बीते कल का दुःख और आने वाले कल की चिन्ता दोनों ऐसे दस्यु चोर हैं, जो हमारे आज की सुन्दरता को चुरा लेते हैं। वर्तमान को दो ही लोग जीते हैं – योगी या भोगी। कालखण्ड में यदि समय को विभाजित करें तो सबसे महत्वपूर्ण है – वर्तमान। इसीलिए वर्तमान को समझ लें तो योग, और न समझें तो भोग..! इसीलिए दार्शनिकों, विद्वानों, साधु-सन्तों ने कहा है अतीत को छोड़ो, वर्तमान को पकड़ो और भविष्य से अपने आपको जोड़ो। समय के लिए ये तीन सूत्र बड़े काम के हैं- छोड़ो, पकड़ो और जोड़ो। हमें सबसे अधिक काम वर्तमान को लेकर करना चाहिए, सबसे अधिक सतर्कता वर्तमान के प्रति रखनी चाहिए। इसी अवस्था में जीवन जीवन्त है। भूतकाल में जीवन के साथ स्मृतियाँ हैं, भविष्य में जीवन एक कल्पना है, लेकिन वर्तमान में जीवन भी जीवन्त है। जीवन को जीवन्त देखना हो तो वर्तमान को ठीक से जीना सीखना होगा। “पूज्य प्रभुश्री” ने कहा – वर्तमान से उपलब्ध क्या होता है, थोड़ा यूँ समझते हैं… अतीत की पूँजी है स्मृतियाँ, जो अधिकांश अवसर पर मन को उद्वेलित, अशान्त करती हैं। स्मृतियाँ भ्रम और भय पैदा करती हैं। भविष्य की पूँजी हैं – कल्पनाएँ, जिससे बेचैनी उतरती है। अब आते हैं वर्तमान पर, इसके दो भाग कर लीजिए। यदि वर्तमान में जीना चाहें तो यह ज्ञात होना चाहिए कि हम तीन चीज़ों से बने हैं – शरीर, मन और आत्मा। वर्तमान यदि शरीर केन्द्रित है तो भोग और विलास के अतिरिक्त कुछ प्राप्त नहीं होगा। यदि मन केन्द्रित है, तो मन का तो स्वभाव ही है – वर्तमान पर कभी नहीं टिकना। वह या तो अतीत में खो जाता है या भविष्य में छलाँग लगाने लगता है। अब बात आती है – आत्मा चिन्तन की। आत्म-ज्ञान मन के भीतर की जागरूपता है। यदि अपने वर्तमान में आत्मा अनुभूति के साथ जीयेंगे तो दुनिया में आपसे बड़ा शान्त, सौम्य, विनम्र और जीवन के हर पल का आनन्द उठाने वाला कोई दूसरा नहीं होगा। तो दो मार्ग हैं, वर्तमान के। एक शरीर का, दूसरा आत्मा का। अब किसका चयन करना, यह आप पर है …।

? “पूज्य प्रभुश्री” ने कहा – भविष्य के प्रति सबसे बड़ी सावधानी तो यह रखना है कि हमारा भविष्य, भूत और वर्तमान से सदैव ऊँचा ग्राफ़ लिए हो। यानी आने वाला कल जो कि कुछ समय बाद हमारा आज बन जायेगा, इसके ग्राफ़ में सदैव ऊँचाई हो। सीधी-सी बात है, हर आने वाला कल आज से ऊँचा होना चाहिए। इसको लेकर बहुत सतर्क रहिए। योजनाबद्धता अपने भविष्य के प्रति प्लानिंग, एक इमेजिनेशन बहुत योजनाबद्ध ढंग से करिए। दुनिया में सबसे योजनाबद्ध होने का ढंग ही योग है। योग का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। इसका सम्बन्ध जीवन और उसकी शान्ति से है। जितना योग-ध्यान आज करेंगे, आने वाले कल पर उतनी ही अच्छी पकड़ हो जायेगी। तो अतीत से कटना, भविष्य से जुड़ना वर्तमान के लिए आनन्द जैसा है, बशर्ते इस बात की समझ विकसित हो जाए कि करना कैसे है? जैसे-जैसे मनुष्य की आयु बढ़ती है, वह या तो अपने अतीत से जुड़ जाता है, या भविष्य के अज्ञात भय में डूब जाता है। बच्चे के लिए न तो अतीत का महत्व होता है, न भविष्य का। बस, उसके वर्तमान में धीरे-धीरे अतीत प्रवेश कर रहा होता है। एक बच्चा भविष्य को लेकर बहुत अधिक जागरूक नहीं होता, लेकिन युवावस्था आते-आते अतीत अपना काम कर चुका होता है और भविष्य उसके लिए चुनौती बन जाती है। इसलिए तरुणाई वर्तमान को जीने लगती है। वृद्धों के साथ कठिनाई यह है कि पीछे का छूटता नहीं, आगे का भय सताता है। तो उनका भी आज यानी वर्तमान बिगड़ने लगता है। इसीलिए हमने देखा है कि जीवनभर दृढ़ निष्ठावान, विद्वान और धार्मिक रहे लोग बुढ़ापे में अश्रु बहाते मिलते हैं। अच्छे-अच्छे बुद्धिमान युवा वर्तमान में डिप्रेशन में डूब जाते हैं और बचपन चिड़चिड़ा होकर झल्लाहट में उतर गया है। इसलिए उम्र के इन तीनों पड़ाव को यह समझना होगा कि यदि वर्तमान संवारना है तो आत्मा को अनुभूत करने का अभ्यास करते रहिए। हम केवल शरीर नहीं हैं, सिर्फ़ मन से भी संचालित नहीं हैं। हम आत्मा हैं। सुनने में बात कठिन लगती है, करने में बड़ी सरल और जीने में आज यानी वर्तमान को आनन्द से भर देने वाली है …।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *


Notice: ob_end_flush(): failed to send buffer of zlib output compression (0) in /home2/lokvarta/public_html/wp-includes/functions.php on line 5481