पितृपक्ष : आंतरिक ऊर्जा और कुटुम्बिक शक्ति को जाग्रत करने की अवधि.

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पांच ग्रास पाँच प्राणियों के निमित्त का संदेश…..
भारत में अपने पूर्वजों का स्मरण करने केलिये पितृपक्ष के सोलह दिनों का विधान है । इस अवधि में सूर्योदय से सूर्यास्त तक की पूरी दिनचर्या आंतरिक ऊर्जा और कुटुम्बिक शक्ति को जाग्रत करने की साधना है ।
प्रकृति में अनन्त ऊर्जाएँ हैं। कुछ से विज्ञान परिचित गया है लेकिन कुछ से अभीतक परिचित ही नहीं हो पाया । प्रकृति के लगभग नब्बे प्रतिशत रहस्य विज्ञान केलिये अनसुलझे हैं इन्हीं में एक है मनुष्य के अवचेतन की शक्तियाँ और अदृश्य कुटुम्बिक ऊर्जा। इन्हीं को जाग्रत करने की अवधि है पितृपक्ष। पितृपक्ष की दिनचर्या पर चर्चा करने से पहले इन तीन विन्दुओं को समझना आवश्यक है । पहली व्यक्ति के अवचेतन की शक्ति, दूसरी आंतरिक ऊर्जा और तीसरी कुटुम्बिक शक्ति एवं ऊर्जा। आंतरिक ऊर्जा और अवचेतन की शक्ति जाग्रत करने के लिये एकाग्रता चाहिए। ऐसी एकाग्रता जिसमें मन के साथ सभी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियों संयुक्त हों। इसके लिये ब्रह्म मुहूर्त में उठना और सूर्योदय से पूर्व नदी या सरोवर पर स्नान करके सूर्य को जल अर्पित करना । घर से नदी या सरोवर तक जाने में दिवंगत पूर्वजों के स्मरण रहता है । इससे चित्त में एकाग्रता आती है । लौटते हुये भी सबका स्मरण बना रहता है । इससे आत्मशक्ति जाग्रत होती है । यही आत्मशक्ति व्यक्ति पराक्रम और पुरुषार्थ में गुणवत्ता प्रदान करती है । घर आकर पूजन हवन और पाँच ग्रास निकालना यह सब भी वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रूप से व्यक्ति, परिवार और प्रकृति से समन्वय का साधन है ।
पितृपक्ष या पितरों की महत्ता का उल्लेख सभी पुराणों में है । श्रीमद्भागवत की रचना ही पूर्वजों की मुक्ति केलिये मानी जाती है । फिर भी पितृपक्ष के पूरे विधान का विस्तृत वर्णन गरुण पुराण में है । इसमें पूरे सोलह दिनों की दिनचर्या का विधान दिया गया है । इसमें दिनचर्या के साथ विशेष महत्व पूजन प्रक्रिया और पाँच ग्रास निकालने का है ।

पूजन विधान

पितृपक्ष में दिवंगत कुटुम्बजनों का स्मरण करने को श्राद्ध कहा जाता है । “श्रृद्धा” की केन्द्रीभूत चेतना को श्राद्ध कहा जाता है । उसकी जाग्रति के लिये इन सोलह दिनों में विशिष्ठ पूजन विधान है । पूजन विधान के लिये यदि पुरोहित को आमंत्रित किया जाय तो अच्छा। यदि न बुलाना चाहें तो स्वय॔ भी कर सकते है॔। सबसे पहले पूर्वजों के प्रतीक के रूप में जौं के आटे का एक छोटा पिण्ड बनाया जाता है । पिण्ड स्थापित करके पितृ गायत्री मंत्र के साथ 108 बार जल अर्पित किया जाता है । पूजन के अर्पण के बाद इस पिण्ड को पीपल के नीचे रखकर अर्पित किये गये जल को किसी बहते जल स्त्रोत में प्रवाहित कर दिया जाता है । फिर कमसे कम एक ब्राह्मण को भोजन कराने का विधान हैं। यह माना जाता है कि हमारे परिवार जन भले हमारे बीच से विदा हो गये हैं पर उनकी ऊर्जा अवश्य परिवार में रहती है । समाज में ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि कार्य सिद्धि के लिये अपने दिवंगत परिवार जन का स्मरण करके कार्य आरंभ करना और उसमें सफलता भी मिलती है ।

पाँच ग्रास निकालने का महत्व

इसमें पूजन हवन विधि के बाद महत्वपूर्ण है पाँच अलग अलग प्राणियों के लिये ग्रास निकालना । इनमें गाय, कुत्ता, मछली, चींटी और कौआ हैं। पितरों के संदर्भ इन पाँच प्राणियों का जो महत्व पुराणों में वर्णित है उससे अलग इनका समाज और व्यक्तित्व निर्माण से गहरा संबंध है । पितृपक्ष में ग्रास निकालने की परंपरा बनाकर इनका समाज से अटूट रिश्ता बनाने का प्रयास किया गया है ।
सबसे पहले गाय की महत्ता को देखिये। गाय पर जितना साहित्य भारत में है उतना संसार में कहीं नहीं। सभी पुराणों वेदों में वर्णन है । सतयुग से द्वापर तक लगभग अधिकांश महायुद्ध के केन्द्र में गाय रही है । गाय समाज जीवन में जितनी उपयोगी है उतना कोई दूसरा प्राणी नहीं। गाय का दूध हृदयरोग, मधुमेह, कैंसर उपचार में उपयोगी है । गाय का गौबर कृषि केलिये उपयोगी । गौमूत्र से औषधि तैयार होती है । गायकी श्वांस से हानिकारक बेक्टीरिया नष्ट होते हैं। इसीलिये भारत के विभिन्न तीज त्यौहारों में अलग अलग माध्यम से गाय को जोड़ा गया और महत्व को स्थापित किया गया है । गाय व्यक्तिगत स्वास्थ्य केलिये तो उपयोगी है ही साथ ही परिवार और समाज की अर्थ व्यवस्था में भी बहुत उपयोगी है। इसके साथ गाय के जीवन से व्यक्ति और समाज को सर्व उपयोगी होने और सेवाभाव में जीने का संदेश भी मिलता है । गाय सबसे सरल, सहज और सेवाभावी जीव है । तभी सरल सज्जन और सहनशीलता के लिये गाय का उदाहरण दिया जाता है ।
दूसरा ग्रास कुत्ते के लिये निकाला जाता है । कुत्ता जैसा स्वामी भक्त जीव दूसरा नहीं होता। वह कभी भी पीठ नहीं दिखाता, यदि रणनीति के अंतर्गत वह पीछे हटता है तब भी भौंकता रहता है और अवसर मिलते ही पलटकर हमला करता है । अपने प्राण देकर भी स्वामी की रक्षा करता है । उसकी सूंघने की शक्ति अद्भुत होती है । वह नींद में भी जागरुक रहता है । इसीलिए दत्तात्रेय जी ने कुत्ते को एक आदर्श प्राणी बताया समाज से सदैव सीखने का आव्हान किया, अपने गुरु की श्रृंखला में रखा । भारतीय मनीषियों ने भी विभिन्न कथाओं के माध्यम से कुत्ते के महत्व को समझाया। धर्मराज युधिष्ठिर के साथ कुत्ते की स्वर्गारोहण यात्रा सुप्रसिद्ध है । यहाँ भी पितरों की सेवा को साक्षी बनाकर कुत्ते से परिवार और समाज को जोड़ा गया है ।
पितृपक्ष और श्राद्ध में तीसरा ग्रास मछली के लिये निकाला जाता है तथा नदी तालाब में जाकर डाला जाता है । जल किसी भी प्राणी के जीवन का आधार होता है जल की कमी हो या जल अशुद्ध हो तो जीवन संकट में पड़ जाता है और जल का सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत नदी और सरोवर होते हैं। जहाँ मछलियाँ रहतीं हैं। नदी सरोवर या कुँए के जल को शुद्ध रखने का काम मछली करती है । नदी तालाबों में जल को प्रदूषित करने वाले कीटों को मछली अपना आहार बना लेती है । लगता है कि प्रकृति ने जल शुद्धिकरण केलिये ही मछली को बनाया है । अज्ञानता में मनुष्य मछली का कोई अहित न करे इसलिये मछली को समाज के लिये महत्वपूर्ण श्रेणी में सम्मिलित किया गया । पुराणों की अलग-अलग कथाओं में मछली के महत्व को समझाया तो मछली के रूप में नारायण के अवतार की कथा भी है । मछली के महत्व को समाज भूले नहीं इसलिये पितृ पूजन से भी मछली को जोड़ा गया । ताकि समाज मछली का संरक्षण करे उसके भोजन की चिंता करे । आज भी भारतीय वाड्मय के जानकार लोग मछलियों को दाना डालने जाते हैं।
चौथा ग्रास चींटी के लिये निकाला जाता है । चींटी के महत्व पर भी भारतीय वाड्मय में अनेक कहानियाँ हैं। पितृपक्ष में चींटी को भी समाज से जोड़ा गया । आधुनिक विज्ञान के शोध के अनुसार चींटी धरती के पुनर्चक्र को सक्रिय करने में सबसे महत्वपूर्ण होती है । धरती का पुनर्चक्र ही धरती के पोषक तत्वों को पुनर्जीवित करता है जो धरती की जीवन श्रृंखला को निरंतर रखने में महत्वपूर्ण होता है । समाज चींटी का संरक्षण करे इसके लिये विभिन्न कथाओं के माध्यम से समाज को जागरुक किया और पितृपूजन से भी जोड़ा । चींटी की सूंघने की शक्ति अद्भुत होती है । चींटियों में सामाजिक अनुशासन भी अद्भुत होता है । वे श्रृंखला बद्ध होकर चलतीं हैं । कभी कतार नहीं तोडतीं। कतार को अनुशासित करने केलिये एक टीम चलती है । भोजन खोजने वाली टीम अलग होती है और भोजन ढोकर लाने वाली भी टीम अलग होती है । ऐसा संगठन और संगठनात्मक अनुशासन बहुत कम देखने को मिलता है । इसके साथ चींटी अपने बिल के आसपास मेहमानों के रूप में कीटों को संरक्षण देतीं हैं। उन्हे भोजन भी देतीं हैं। चींटी की गणना सबसे छोटे जीवों में कई जाती है । लेकिन उसकी तकनीक इतनी विलक्षण होती है कि हाथी भी चींटी से डरता है । चींटी जहाँ धरती पर जीवन के संतुलन केलिये उपयोगी है वहीं मनुष्य, परिवार और समाज को संगठनात्मक अनुशासन का संदेश भी देती है । अतिथि सेवा का संदेश देती है और यह भी कि भले हमारा अस्तित्व भले कितना ही लघुतम क्यों न हो किन्तु हमारा मनोबल ऐसा होना चाहिए कि हाथी समान विशालकाय जीव भी भयभीत रहे और संकट आने पर हाथी को भी धराशाई किया जा सके।
पितृपक्ष में पाँचवा ग्रास कौए के लिये निकाला जाता है । कौए की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी जीवन शैली सर्वाधिक आत्म अनुशासित होती है इसीलिए यह सबसे कम बीमार होता है, यह भोजन को देखकर उसमें अशुद्धता भाँप लेता है और हानिकारक होने का आभास होते ही ग्रहण नहीं करता । इसलिए यह भूख से तो मर जाता है पर बीमारी से कभी नहीं मरता । कौए को कभी थकान नहीं होती। कौआ उन विरले प्राणियों में से एक है जो नर और मादा दोनों एक ही आकार के होते हैं। यदि जोड़ा साथ हो तो उन्हे यह पहचानना कठिन होता है कि कौन नर है और कौन मादा । कौये समूह बनाकर रहते हैं। यदि एक साथी कौए को कुछ हो जाये तो दूसरा कौआ साथी भोजन ग्रहण नहीं करता । इसकी समझ बहुत तीब्र होती है, इसकीदेखनेकी सामर्थ्य भी बहुत तीखी होती है । इसीलिए किसी को व्यंग में कौये की उपाधि दे देते हैं। कौये का पौराणिक महत्व तो है । कौये ने समुद्र मंथन में अमृत चखा था । पौराणिक महत्व के अतिरिक्त कौए को समाज से जोड़ने का संदेश यही है कि समाज का प्रत्येक व्यक्ति कुशाग्र हो, दूरदृष्ट हो, समाज संगठित हो, पति पत्नि के बीच समता का व्यवहार हो एवं एक दूसरे की चिंता की जाना चाहिए।
यद्धपि पुराणों में समाज जीवन में ऐसे व्यवहार की सीख के लिये अनेक कथाएं हैं पर समाज व्यवहारिक रूप से भी अपने प्रेरणादायकों से जुड़ा रहे इसलिये ऐसे प्रसंगों और प्रतीकों को तीज त्यौहार के माध्यम से समाज से जोड़ा गया ।
कहने का आशय यह नहीं है कि पुराणों में वर्णित पूर्वज महत्ता कुछ कम महत्वपूर्ण है । वह तो महत्वपूर्ण है ही । पितृपक्ष में आस्था के साथ पितृदेव तपृण तो होना ही चाहिए पर पितृपक्ष के माध्यम से समाज जीवन को स्वस्थ्य सुन्दर बनाने के जिन माध्यमों को जोड़ा गया है उनसे सदैव जुड़ कर चलना चाहिए तभी यह तीज त्यौहार परंपरा सार्थक होगी।

–रमेश शर्मा

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