☀ प्रभु प्रेमी संघ ? 05 मार्च, 2024 (मंगलवार)

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पूज्य सद्गुरुदेव आशीषवचनम्
।। श्री: कृपा ।।
? पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा के दो प्रमुख आयाम हैं – आंतरिक और बाह्य सुरक्षा। बाह्य सुरक्षा हमारी सेनाओं, सशस्त्र सैन्य बल और सामरिक नीतियों पर निर्भर करती है। सैन्य बल और कूटनीतिक आयाम जितने प्रभावी होंगे, हमारी बाह्य सुरक्षा उतनी ही अधिक सुदृढ़ होगी। किन्तु राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा और एकजुटता के लिए एक राष्ट्रीय विचार की आवश्यकता है और वह सर्वग्राही विचार आध्यात्मिक जगत से प्राप्त होगा। ‘राष्ट्र सूक्त’ में राष्ट्र को देवता कहा गया है अर्थात् भारत मात्र भूखण्ड नहीं, अपितु हमारी सांस्कृतिक-आध्यात्मिक चेतना और प्रतिमानों की जीवन्त अभिव्यक्ति है। भारत की भौगोलिक रचना व स्वरूप अलौकिक एवं विस्मयकारी है, किन्तु भारत के उदात्त आध्यात्मिक विचारों ने उसे और भी जीवन्त व लोकजीवन के साथ एकीकृत कर दिया है। प्रकृति-पर्यावरण, भू-भाग समवेत राष्ट्र को परिभाषित करने वाले समस्त उपांगो से हम धार्मिक और भावनात्मक दृष्टि से समायोजित हैं। राष्ट्र की आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने हेतु जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से मनाए जाने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ ..! राष्ट्र की एकता अखण्डता एवं सार्वभौमिकता बनाए रखने के लिए राष्ट्रीयता की भावना का उदय होना परम आवश्यक है। यह वही भावना है, जिसके कारण राष्ट्र के नागरिक राष्ट्र के सम्मान गौरव और हितों का चिन्तन करते हैं। राष्ट्र की आंतरिक शान्ति व्यवस्था और बाहरी सुरक्षा की दृष्टि से राष्ट्रीय एकता की अत्यन्त आवश्यकता है। भारत के सन्तों ने तो प्रारम्भ से ही मनुष्य-मनुष्य के बीच में कोई अन्तर नहीं माना। वह तो सम्पूर्ण मनुष्य जाति को एक सूत्र में बाँधने के पक्षधर रहे हैं। नानकदेव जी का यह कथन है कि ”अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे, एक नूर ते सब जग उपज्या, कौन भले कौन मंदे। ”पूज्य प्रभुश्री जी” ने कहा कि जब-जब भी हम असंगठित हुए, हमें आर्थिक और राजनैतिक रूप में इसका मूल्य चुकना पड़ा। हमारे विचारों में जब-जब संकीर्णता आई, आपस में झगड़े हुए। हमने जब कभी नए विचारों से अपना मुख मोड़ा, हमें हानि ही हुई, हम विदेशी शासन के अधीन हो गए। इससे हमें सावधान रहना होगा। देश की स्वतंत्रता की रक्षा और राष्ट्र की उन्नति के लिए राष्ट्रीय एकता का होना अत्यन्त आवश्यक है। हमारे देश की संस्कृति और राष्ट्रवाद की प्रेरणा लेकर जापान जैसे देशों ने अपने आप को समृद्ध किया। राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखकर अखण्ड भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले युगद्रष्टा भारत माँ के परम आराधक, निवृत्त-जगद्गुरू शंकराचार्य,पद्मभूषण पूज्य गुरुदेव स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरि जी महाराज जी ने देश में नई दृष्टि और सृष्टि का सृजन किया है। राष्ट्र धर्म को श्रेष्ठ मानने वाला कोई सन्त ही हो सकता है। देश को राष्ट्रभक्त लोगों की आवश्यकता है चाहे वह किसी भी मत पंथ सम्प्रदाय का हो। इष्टदेव भक्ति अपनी-अपनी पद्धति से करे, लेकिन राष्ट्रभक्ति सबको अपनी अन्तरात्मा से करनी चाहिए। राष्ट्र-धर्म सबसे बड़ा धर्म है। राष्ट्रदेव सबसे बड़ा देवता व राष्ट्र प्रेम सबसे उत्कृष्ट कोटि का प्रेम है। राष्ट्रहित सर्वोपरि है। राष्ट्रधर्म सर्वोपरि है। राष्ट्र मेरा सर्वस्व है। “इदं राष्ट्राय इदन्न मम ..”। हमारा तन-मन धन व जीवन राष्ट्रहित में समर्पित रहे ..।
? पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा – राष्ट्र सेवा से बढ़कर कोई सेवा नहीं है, इसलिए हमें युवाओं में देशभक्ति का भाव पैदा करना चाहिए। समाज और राष्ट्र का उत्थान युवा पीढ़ी के उत्थान पर ही निर्भर है। आदरणीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने कहा था कि हम डराएँगे नहीं, पर डरेंगे भी नहीं। वास्तव में यह अवधारणा इसलिए यथार्थ है क्योंकि हम कालजयी हैं, मृत्युंजय हैं। हम उस सावित्री की संतान हैं, जो यमराज से अपने पति के प्राण ले आई थी। हम नचिकेता के देश के हैं। धर्मरक्षा के लिए समस्त भारत के सन्तों को एकजुट होकर रहना होगा, क्योंकि संत-महापुरुषों के जप-तप से ही भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार विदेशों में हो रहा है। भारत इसलिए महान कहा जाता है, क्योंकि इसमें सांस्कृतिक एकता, रक्षात्मक निरन्तरता, संविधान, कला, साहित्य, सामान्य आर्थिक समस्याएँ, राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान, राष्ट्रीय उत्सव और राष्ट्रीय प्रतीक के द्वारा भारत में राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा दिया जाता रहा है। विभिन्न धर्म और जाति होने के पश्चात भी एक दृढ़ और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण करने के लिए हम सब एक हो जाते हैं। भारत में 1652 भाषाएँ बोली जाती है और विश्व के सभी मुख्य धर्म के लोग यहाँ एक साथ रहते हैं। किसी भी राष्ट्र की एकता वह शक्ति है, जिसके बल पर कोई देश, समाज, सम्प्रदाय उन्नति के रास्ते पर दिन-प्रतिदिन अग्रसित होता रहता है। पूज्य “प्रभुश्री” जी ने कहा कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि राष्ट्रीय एकता सशक्त और समृद्ध राष्ट्र की आधारशिला होती है। राष्ट्रीय एकता के छिन्न-भिन्न होने पर किसी भी देश की स्वतन्त्रता को हमेशा भय बना रहता है। राष्ट्र के विभिन्न घटकों में परस्पर एकता, प्रेम एवं भाईचारे का स्थिर रहना अत्यन्त जरूरी है, भले ही उनमें वैचारिक और धार्मिक असमानता क्यों न हो। भारत में कई धर्मों एवं जातियों के लोग रहते हैं, जिनके रहन-सहन एवं आस्था में अन्तर तो है ही, साथ ही उनकी भाषाएँ भी अलग-अलग हैं। इतना होने पर भी पूरे भारतवर्ष के लोग भारतीयता की जिस भावना से ओत-प्रोत हैं, उसे राष्ट्रीय एकता का विश्वभर में सर्वोत्तम उदाहरण कहा जा सकता है। गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा था कि भारत की एकता तथा चेतना समय की कसौटी पर सही सिद्ध हुई है। आशा की जाती है कि हमारे देश की यह उदात्त भावना सदैव बनी रहेगी …।

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