प्रधानमंत्री भी अमित शाह, मुख्यमंत्री भी अमित शाह और उनकी भाषा में गृहुमंत्री भी अमित शाह?

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राजेन्द्र सिंह जादौन

आज के भारत की राजनीति को अगर एक वाक्य में समझना हो तो बस इतना काफ़ी है कि प्रधानमंत्री भी अमित शाह, मुख्यमंत्री भी अमित शाह और उनकी भाषा में गृहमंत्री तो खैर अमित शाह ही हैं। लोकतंत्र की किताब में शायद ऐसा अध्याय कभी लिखा नहीं गया था, लेकिन आज वह अध्याय रोज़ लाइव टेलीकास्ट हो रहा है। देश का संविधान कहता है कि प्रधानमंत्री सरकार चलाता है, मुख्यमंत्री राज्य चलाता है और गृहमंत्री कानून-व्यवस्था देखता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि हर सड़क, हर संसद, हर विधानसभा और हर थाने में एक ही नाम गूंजता है अमित शाह।

प्रधानमंत्री के भाषणों में अगर दम है तो रणनीति अमित शाह की, मुख्यमंत्री की कुर्सी अगर बची है तो कृपा अमित शाह की, और गृहमंत्री का रौब अगर दिखाई देता है तो भाषा अमित शाह की। ऐसा लगता है जैसे सत्ता के तीनों खंभे अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही छड़ी से चलाए जा रहे हों। लोकतंत्र में विकेंद्रीकरण की बात होती है, लेकिन यहाँ तो केंद्रीकरण भी शर्म से सिर झुका ले।
आज राज्यों में मुख्यमंत्री नाम के लोग हैं, लेकिन फैसले दिल्ली के एक कमरे से होते हैं। चुनाव हारने वाले भी अमित शाह की रणनीति का शिकार हैं और जीतने वाले भी अमित शाह की ही छाया में खड़े दिखाई देते हैं। मुख्यमंत्री जनता से कम और अमित शाह से ज़्यादा जवाबदेह नज़र आते हैं। यह संघीय ढांचा नहीं, बल्कि एक हाई-कमान प्राइवेट लिमिटेड कंपनी जैसा मॉडल बन चुका है।

गृहमंत्री की भाषा कभी धमकी लगती है, कभी चेतावनी, कभी सीधा फरमान। संविधान की भाषा संयम सिखाती है, लेकिन आज की सत्ता की भाषा डर सिखा रही है। पुलिस, एजेंसियाँ, जांच सबका रिमोट जैसे एक ही हाथ में हो। विपक्ष बोले तो देशद्रोही, सवाल पूछे तो शहरी नक्सल, और असहमति जताए तो जांच एजेंसी हाज़िर।
प्रधानमंत्री के पद की गरिमा कभी विचारों से पहचानी जाती थी, आज रणनीति से पहचानी जाती है। मुख्यमंत्री का पद कभी ज़मीन से जुड़ा होता था, आज दिल्ली से जुड़ा है। और गृहमंत्री का पद कभी संविधान का रक्षक माना जाता था, आज सत्ता का सबसे धारदार हथियार बन गया है।

यह अजीब लोकतंत्र है जहाँ चुनाव जनता लड़ती है, लेकिन सरकार किसी और की बनती है। जहाँ भाषण कोई देता है, लेकिन स्क्रिप्ट कोई और लिखता है। जहाँ चेहरे कई हैं, लेकिन चेहरा एक। ऐसा लगता है जैसे देश में एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक व्यवस्था सत्ता में है, और उस व्यवस्था का नाम अमित शाह है।

शायद यही कारण है कि आज न प्रधानमंत्री स्वतंत्र दिखते हैं, न मुख्यमंत्री आत्मनिर्भर और न संस्थाएँ निर्भीक। सबको पता है कि आख़िरी फैसला कहाँ से आएगा। लोकतंत्र में शक्ति का संतुलन होना चाहिए, लेकिन यहाँ तो संतुलन की जगह एकतरफा वजन है।
इतिहास गवाह है कि जब भी सत्ता एक व्यक्ति में सिमटती है, तो संविधान काग़ज़ बन जाता है और लोकतंत्र आदत। सवाल यह नहीं है कि अमित शाह कितने शक्तिशाली हैं, सवाल यह है कि क्या देश को इतना असहाय होना चाहिए कि हर उत्तर, हर आदेश और हर दिशा एक ही नाम से तय हो।

आज अगर कोई पूछे कि भारत में असली सत्ता कहाँ है, तो जवाब पदों में नहीं मिलेगा, जवाब व्यवस्था में मिलेगा। और उस व्यवस्था का नाम धीरे-धीरे लोकतंत्र नहीं, बल्कि नियंत्रण होता जा रहा है।

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