संवाद का संकट

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संवाद का संकट

सूचनाएं बहुत हैं। संचार साधनों का अंबार है। लेकिन संवाद की गुणवत्ता में कमी आयी है। समाज एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुका है जहां लोग बातचीत को समझने का जरिया नहीं, बल्कि अपनी पहचान और विचारधारा बचाने का हथियार मानने लगे हैं। सोशल मीडिया और टेलीविजन डिबेट में चौबीस घंटे बहस की संस्कृति ने लोगों को रिएक्टिव बना दिया है। हर मुद्दे पर राय देना जरूरी हो गया है चाहे बात पूरी समझी हो या नहीं। असहमति अब बौद्धिक अभ्यास नहीं, बल्कि भावनात्मक टकराव बन गयी है। लोग अपने से अलग राय को खतरे के रूप में देखने लगे हैं।

 

राजनीति ही नहीं दफ्तरों की मीटिंगें भी एकतरफा होती जा रही हैं। शिक्षण संस्थानों में छात्र अब सवाल पूछने से बचते हैं क्योंकि सवाल पूछना अब सीखने की इच्छा नहीं बल्कि विरोध समझा जाता है। घरों में भी बातचीत हो रही है, लेकिन हर व्यक्ति अपनी बात कहकर आगे बढ जाना चाहता है। सुनने का ठहराव गायब है।

 

अमेरीका में ड्यूक यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्री प्रोफेसर क्रिस बेल कहते हैं कि आज लोग बातचीत शुरू करने से पहले ही तय कर लेते हैं कि उन्हें क्या साबित करना है। हम सुनने के लिये नहीं, जवाब देने के लिय बातचीत में उतरते हैं। यही वजह है संवाद आगे नहीं बढ़ पाता।

 

लोकतंत्र बहस से नहीं, सम्मानजनक असहमति और धैर्यपूर्ण सुनने से मजबूत होता है। सुनने की आदत दोबारा सीखने की आवश्यकता है। क्योंकि जब सुनना खत्म होता है, तब सिर्फ संवाद नहीं टूटता, समाज की साझा समझ भी बिखरने लगती है।

 

यह संकट लोकतंत्र से पहले सामाजिक जीवन को खोखला करता है। जब लोग एक-दूसरे को सुनना छोड़ देते हैं, तो भरोसा टूटता है और भरोसे के बिना कोई भी समाज लंबे समय तक टिक नहीं सकता। अगर बातचीत इसी तरह लंबे समय तक प्रदर्शन और जीत की दौड़ बनी रही, तो सार्वजनिक विमर्श केवल शोर में बदल जाएगा।

 

इसका समाधान केवल मीडिया सुधार या सोशल मीडिया नियंत्रण नहीं है। स्कूलों, दफ्तरों और सार्वजनिक संस्थानों में सुनने की ट्रेनिंग और संवाद-आधारित चर्चाओं को बढ़ावा देना होगा, ताकि असहमति को टकराव नहीं, सीख की प्रक्रिया बनाया जा सके।

 

संदर्भ एवं साभार – दैनिक भास्कर (20.12.2025) में छपी अमेरिका की ड्यूक यूनिवर्सिटी में हुई ताज़ा रिसर्च की रिपोर्ट

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