राम मोहन राय हास्टल के खूबसूरत पल ।

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Memoir — फेलोशिप जीवी रिसर्चर
आज अचानक राजाराम मोहन राय छात्रावास की याद आ गयी। अपने सपनों का हास्टल। उस दौर के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के 40 -45 छात्रावासों में से एक।
लगभग 6 साल का समय इसके साथ बिताया। यादें बहुत हैं। कुछ संघर्ष की, कुछ अनिश्चित भविष्य की, कुछ मौजमस्ती और अबारागर्दी की, कुछ दोस्तों की, कुछ गुरुजनों की और कुछ सानडाइ की।
राजा राम मोहन राय छात्रवास सामाज विज्ञान संकाय को आवंटित था। यह हास्टलों की द्वितीय पंक्ति में था। इसके सामने था भाभा हास्टल।
फ्रंट लाइन में विरला ,ब्रोचा,डालमिया .. कुल 40-45 हास्टलों की कतार थी।
पोस्टग्रेजुएशन के बाद हास्टल की लाइफ कुछ बदल जाती है। रिसर्च में विभिन्न विभागों के कुछ गिने चुने विद्यार्थी ही छात्रावास में बच जाते हैं।
प्रधान मंत्री मोदी एक वर्ग विशेष को आन्दोलन जीवी कहते हैं इस अर्थ में हम सब रिसर्चर छात्रवृति जीवी थे। एक तरह से छात्रवृति जीवी साधुओं का मठ था। वही एक आसरा था और वही भरोसा भी। जिस दिन छात्रवृति मिल जाये लंका पर चाची की दुकान की एक लस्सी और एक लौंगलता 3-4 साथी जीम आते थे। प्रकाश ,विजया,गुंजन में कभी कभार एक आध पिक्चर भी देख लेते थे। हास्टल वालों की पर्सनल लाइफ नहीं के बराबर थी। सारे झुंड सुबह नगवा या सुंदर नगर गेट के चाय और ब्रैड पकोड़े को ही नाश्ता मान लेते थे। फैलोशिप लेट होना माने फाके की नौबत। तब कमरे में चना मूंगफली भिगो कर खाओ और एक गिलास पानी। प्रारंभ में पीएचडी में रजिस्ट्रेशन का मूल उद्देश्य गहन शोधार्थी बनना नहीं था। उद्देश्य था आगे के लक्ष के लिए हास्टल में टिकना यानि एक छत और हर माह की स्कालरशिप। लेकिन धीरे लोक सेवा की तैयारी और शोध में बेहतरीन संतुलन बैठ गया। UGC दक्षिण एशिया भ्रमण के लिए $100 प्रतिदिन के हिसाब से ग्रांट भी मिल गयी।
स्नातकोत्तर के प्रारम्भ में मेरे अभिन्न मित्र गणेशजी तिवारी के सहयोग से बिरला हास्टल के कमरा नं 16 में मिश्रा जी के साथ पनाह मिली। रमेश पाण्डेय को कक्ष न 14 आवंटित था 15 में एक शौकीन किस्म के सिंह साहब रहते थे। नाम तो में भूल गया हूँ लेकिन रोज उनके मित्र मंडली की बालायें उनके कक्ष में आती थीं। यदा कदा कह देते थे कि गुरुजी इधर मत आना।यहीं प्यारे महराज के मेस से भोजन का लाभ मिल जाता था। 150/ महिना मेस का बिल आता था। डा.रवीन्द्र पाठक भी इसी ब्लाक में रहते थे। एक जिज्ञासु अध्येता। बाद में मगध विश्वविद्यालय में बौद्ध दर्शन के प्राचार्य बने। सानडाइ के दिनों में पाण्डेय जी के साथ नगवा में डां. कमलेश त्रिपाठी जी का निवास हमारी आश्रय स्थली थी। प्रो कमलेश त्रिपाठी उस समय कालीदास एकेडमी उज्जैन के निदेशक थे। सो घर रमेश जी देखरेख में था। जहां भाभी जी के हाथ का भोजन पाकर हम कृतार्थ होते थे। प्रोफेसर रमेश पाण्डेय बाद में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, दिल्ली के कुलपति हो कर हाल ही में सेवानिवृत हुए हैं।‌ एक विद्वान अध्येता। गणेश जी तिवारी एलएलएम के बाद सिक्किम ला कालेज में प्रवक्ता बन कर चले गये।
कुछ समय मुझे राजा राम मोहन राय हास्टल में कक्ष आवंटित हो गया। यह दौर विश्वविद्यालय में कानून व्यवस्था, अनुशासन हीनता , तोड़फोड़ का था। अनेक बार सानडाइ की नौबत आती थी। हर सानडाइ के बाद कक्ष बदल जाते थे। इन 5-6 सालों में कामन हाल-1, कक्ष क्रमांक 102,126,110 में रहने का मौका मिला। एम ए में कक्ष क्रमाकं 126 में प्रो.अरुण कुमार वर्मा मेरे रुम पारटनर थे। वे मूलतः डे स्कालर थे हास्टल में कम ही रहते थे।। देवव्रत पाण्डे , शिवकुमार पाठक नजदीक के कक्ष में रहते थे। संडे मेस बंद रहता था सो रुम में जुगाड़ तकनीक से कुकिंग हीटर लगा कर नैनुआ चावल या दाल चावल का सामुहिक भोग लग जाता था। उस दौर में स्नातकोत्तर में प्रकाश उपाध्याय, नृपेन्द, श्रीशमणी त्रिपाठी भी कुकिंग और अध्ययन के साथी रहे।
एक बार तो सानडाइ के बाद कमरा मिलना ही मुश्किल हो गया। अर्थशास्त्र के प्रो. ज्ञानेन्दर सिंह कुशवाहा वार्डन थे। वे दयालु थे और कृपालु भी। कामन रूम को कक्ष में परिवर्तित कर मुझे एलाट कर दिया। उस दौर में छात्रावास अत्यधिक अराजकता के शिकार थे। वार्डंन इसे नियंत्रित करने में असहजता महसूस करते थे। 90% छात्र अध्ययन से काम रखते थे लेकिन 10% की अराजकता के समक्ष वे बौनेपन का अहसास करते थे । अनेक अध्यापक जाति, धर्म, क्षेत्रीयता और विचारधारा के हिसाब से विश्वविद्यालय और हास्टलों की राजनीति को बड़ावा देते थे। प्रो कुशवाहा के बाद प्रो डीके मिश्रा और डा आनन्द कुमार हास्टल के वार्डन रहे। आनन्द कुमार बाद में जेएनयू में प्रोफेसर बन गये।बाद में आप पार्टी से जुड़ गये लेकिन सुना है उनकी केजरीवाल से नहीं बनी और आप भी छोड़ दी।

मुझे हास्टल के सिनियर /जूनियर राम प्रवेश पाठक, आलविन अली, बाबुल नाथ दुबे, प्रदीप खंडेलवाल, श्री कान्त पाण्डेय, एसआरएफ डा दास, भुल्लू यादव, दिनेश सिह, ओम प्रकाश सिह,अवध नारायण त्रिपाठी, शमसेर सिंह , महबूब आलम,सुदामा सिह,बाबुल नाथ दुबे, कवलधारी,लक्ष्मीनारायण पाण्डेय, अरुण श्रीवास्तव जी का स्मरण है। कुछ मित्रों के नाम भूल रहा हूं क्षमा करेंगे। हास्टल में और भी अनेक रिसर्चर थे। राम प्रवेश बीएचयू में ही प्रोफेसर एवं डीन रहे। महबूब आलम भापुसे में चयनित होकर तामिलनाडू केडर में गये। डा. नृपेन्द भी बीएचयू में खप गये। शेष भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों और डिग्री कालेजों में सेवा दिये। दिनेश बीडीओ बन गये। आलविन और शिवकुमार सचिवालय सेवा लखनऊ चले गये। ‌डा. अवध नारायण इग्नू चले गये बीएचयू के खाते में उनकी एक उपलब्धि ये रही कि क्लास मेट कनिज फातिमा से प्रेम विवाह कर लिए। ‌उस दौर के राजा राम में प्रेम की पटकथा लिखी जा रही थी। ‌आज सोसल मीडिया का जमाना है। हम लोग 30 साल बाद फिर जुड़ गये। उनकी प्रेम कहानी चिरंजीव है। बनी रहे।
इसके अतिरिक्त मैं रसियन भाषा में पीजी डिप्लोमा का विद्यार्थी और एनसीसी सिनियर डिविजन में अंडर अफिसर भी था। दोस्तों के ग्रुप का विस्तार इस कारण भी हुआ। राजदेव तिवारी, विनोदानंद तिवारी, अशोक पाण्डेय, सत्येंद्र उपाध्याय, नीरज श्रीवास्तव, आशुतोष खजूरिया सोसल साइंस संकाय से इतर के मित्र थे। लगभग सभी फेलोशिप जीवी ही थे। अशोक पाण्डेय 2 थे। एक टेहरी में विधि विभाग के प्रवक्ता तो दूसरे ने आकाशवाणी की राह पकड़ी। राजदेव ओएनजीसी में गये। आज IIT MUMBAI visiting Prof हैं।आशुतोष बैंक में पीओ के बाद अमेरिकन बैंक के शीर्ष पद पर पहुंचे।
राजदेव जी अभी भोपाल पधारे थे उन्होंने बताया कि आजकल नीरज IIT Delhi में प्रो रहने के बाद दुबई में IIT Delhi का कैंपस चला रहे हैं‌ । विनोदानंद ने बीएचयू की पूंछ पकड़े रखी । रूसी भाषा के प्रोफेसर हो गये। काशी में ही अखाड़ेबाजी करते रहे।
‌ प्रो श्रीकांत पाण्डेय और आशुतोष खजूरिया भी गत वर्ष सपरिवार भोपाल पधारे। प्रो नृपेंद्र पिताजी की बरसी में पधारे थे। सोसल मीडिया ने 30-35 बर्षों से डंप संबन्धों के धागे फिर जोड़ दिये।

उस दौर में प्रो मनोरंजन जा राजनीति शास्त्र के विभागाध्यक्ष थे। प्रो एस के झा, टीएन पंत,नंदा, प्रो गर्ग , प्रो हरिहर नाथ त्रिपाठी, नलनी पंत ,पीडी कौशिक, अंजूशरण, चन्द्रकला पांडिया, आर एच शरण,प्रियंकर उपाध्याय , एमडी धर्मदसानी ये विभाग के प्राध्यापक थे।
काशी हिन्दू विश्व विद्यालय का संक्रमण काल : हम लोग आपात काल के समाप्ति के दौर में विश्वविद्यालय कैंपस में प्रवेश‌ किये।
1977 में आपातकाल समाप्त हुआ, इंदिरा गांधी पराजित हुईं और जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत से जीत दर्ज की थी। लेकिन जनता पार्टी एक गठबंधन थी — जिसमें जनसंघ, कांग्रेस (O), समाजवादी और अन्य गुट शामिल थे। विचारधारात्मक मतभेद (विशेषतः जनसंघ के आरएसएस संबंधों को लेकर) 1978 तक उभरने लगे। 1979 तक केन्द्र में सब लड़खडा गया चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने। केन्द्र की अस्थिरता का प्रभाव उत्तर प्रदेश पर भी पड़ा राम नरेश यादव, बाबू बनारसी दास और विश्वनाथ प्रताप सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में 1979 से जून 1982 तक रहे।
जेपी आंदोलन“संपूर्ण क्रांति”से उत्पन्न अराजकता से केन्द्र और राज्य सरकारों में अस्थिरता और सामाजिक अराजकता से बीएचयू भी अप्रभावित नहीं रहा। 1978 में, जनता पार्टी सरकार के समय,प्रो इकवाल नारायण को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया वे 1981 तक कुलपति रहे। इस बीच विश्वविद्यालय में जनसंघ, समाजवादी, वामपंथी, कांग्रेस (I) सभी संगठनों के छात्र विंग बेहद सक्रिय हो गए। वर्ष 1979–1980 के आसपास
छात्र हिंसा, प्रशासन के खिलाफ आंदोलन, और शिक्षक-छात्र टकराव चरम पर पहुँच गये। कई छात्र घायल हुए, हॉस्टलों में आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएँ हुईं।स्थिति इतनी बिगड़ी कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने संपूर्ण BHU को बंद (तालाबंदी) घोषित किया। जो कई सप्ताह तक चली। 1981–82: इंदिरा गांधी की वापसी के बाद भी BHU शांत नहीं हुआ।
बीएचयू ABVP बनाम वामपंथी संगठन (AISF/SFI) ने धर्म, जाति और राजनीति के नए समीकरणों को अंकुरित किया। इसका प्रभाव हास्टलों पर भी पड़ने लगा। एक छात्र की मौत (पुलिस कार्रवाई में) के बाद 1982 में पुनः हिंसक आंदोलन भड़का। प्रशासन ने फिर तालाबंदी घोषित की। विश्वविद्यालय के सभी हॉस्टल खाली कराए गए।
यह लगभग 2 महीने तक चला, और कई छात्रों को निष्कासित किया गया। कुलपति प्रोफेसर इकबाल नारायण ने अनुशासन बहाल करने की कोशिशें कीं, लेकिन सफल नहीं रहे। ‌इसका महत्वपूर्ण कारण अध्यापकों का छात्र संगठन और गुटों से गठजोड़ था। कुछ प्राध्यापकों की तो वहाँ मठाधीशी चलती थी। BHU में 1977 के बाद छात्रसंघ चुनावों में जनता पार्टी समर्थक समूहों (मुख्यतः ABVP, समाजवादी युवजन सभा) का दबदबा था। छात्र तो छात्र शिक्षकों के बीच भी “जनता पार्टी बनाम कांग्रेस” खेमेबाज़ी फैल गई। अराजकता का आलम ये था कि संस्कृत विभाग की स्नातकोत्तर एक छात्र नेत्री इंदिरा त्रिपाठी ने कुलपति आरपी रस्तोगी साहब को एक मुलाकात के दौरान थप्पड़ जड़ दिया था। विश्वविद्यालय प्रशासन कई बार कक्षाएँ बंद करने को मजबूर हुआ।शिक्षा परीक्षाएँ और सत्र लगातार प्रभावित हुए; कई छात्रों का पूरा वर्ष नष्ट हुआ। बीएचयू की छात्र राजनीति “शिक्षा से ज़्यादा सत्ता की सीढ़ी” बन गई। हास्टलों में गुंडागर्दी कट्टेबाजी का कल्चर विकसित हो गया। बिरला हास्टल में एक छात्र अपने को हिटलर कहता था। पेशा था रंगदारी। एक बार भावा हास्टल के कक्ष क्रमाक 125 के सामने गोली टकराई। कभी -कभी हास्टलों में क्रिमिनल गैंग की बैठकों की भी सूचना मिलती थी।
डा. रवीन्द्र जी ने बिरला हास्टल ‌की अराजकता पर एक कविता लिखी थी-
“यह बिरला की दिल्ली चाल
हेलो बागियो रहो निहाल।
घूंघट के तिरछे चितवन से
यहां हो रहे कई निढाल”
……
उन दिनों बीएचयू में अंक सूची के आधार पर प्रवेश की मेरिट लिस्ट बनती थी। एमबीए,मेडिकल और इंजीनियरिंग को छोड़कर किसी भी संकाय में प्रवेश के लिए रिटन परीक्षा नहीं होती थी। बीएचयू में 90℅ छात्र पूर्वांचल अथवा विहार के ही थे। 10+ 2 में विहार बोर्ड में बड़ी तादाद में छात्रों को 60% से अधिक मार्क्स मिलते थे यूपी बोर्ड में 60℅ के लेवल को बहुत कम छात्र छू पाते थे। इस कारण स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में विहार का दबदबा था। जेपी आंदोलन का बहुत बड़ा प्रभाव हास्टल और कैंपस की कानून व्यवस्था में भी पड़ा। संस्था में गुणवत्ता की अनदेखी के साथ भारी संख्या में भाई -भतीजावाद के साथ रिक्रूटमेंट की बातों चर्चा में रहीं। संस्था के स्वरुप में क्षेत्रीयता झलकने लगी। लेकिन ढेड़ दसक बाद इसमें सुधार के प्रयास किये गये ।छात्र संघ की अराजकता पर भी अंकुश लगाने के लिए कदम उठाये गये।
1982 की एक आपबीती मुझे याद है। मुझे किसी मैगजीन के लिए एक रिसर्च पेपर प्रस्तुत करना था इसलिए कमरा बंद कर कक्ष क्रमांक 110 में अपना काम कर रहा था। शाम के 8 बजे थे बुश रेडियो में गाने सुनते हुए काम चल रहा था । बाहर कुछ शोर था। अचानक किसी ने मेरा दरवाजा खटखटाया। मैंने दरवाजा खोला तो हाथ में डंडा लिए एक दर्जन पीएसी के जवान सामने। आव देखा न ताव। उनका एक डंडा सीधे बजते रेड़ियो पर चला देखत- देखते उसके 2 दुकड़े हो गये। बोले – ‘ऐनाउन्समैंट नहीं सुनते हो क्या ? सानडाइ है। ‘ हास्टल खाली करने का हुक्म है। यहाँ क्यों बैठे हो। एक जवान बोला,’ साले पुलिस पर पथराव करते हैं अभी गांधी बनकर बैठा है। ‘ रात तक कमरा खाली हो जाना चाहिए। सुबह तक दिखे तो बंद कर देंगे।कल गेट लाक हो जायेगा। अपनी तो सिट्टी- पिट्टी गुम। बाहर देखा तो एक दम सन्नाटा, सारी लाइटें बंद। मुझे यह तो पता था कि छात्रों और पुलिस के बीच भिड़ंत हुई है लेकिन राजा राम और भाभा के छत से पुलिस पर पथराव और सान डाइ की घोषणा की जानकारी नहीं थी। सान डाइ का मतलब अनिश्चित कालीन तालाबंदी। सामान्यतः हास्टल का चपरासी बिपता सब बता देता था इस बार शायद डर के मारे वह हास्टल ही नहीं आया होगा। रात के 9:30 बजे हास्टल के पीछे जाकर मेस का महराज( 𝗵𝗲𝗮𝗱 𝗰𝗼𝗼𝗸) से बात की उसने एक प्लास्टिक वाली सूटकेस के साथ साइकिल के डंडे पर बैठाकर लंका तक छोड़ दिया। फिर रिक्शे से नगवा रमेश जी के ठिकाने पहुचा। रेड़ियो के टुकड़े टुकड़े होने का मलाल तो था पर पीएसी की शिकायत की हिम्मत नहीं पड़ी। ‌लगभग 2 माह सानडाइ रही।
हमारे हास्टल का समय “सान डाई” ताला बंदी, विश्वविद्यालय प्रशासन बनाम छात्र संगठन, और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसी घटनाओं से अत्यधिक प्रभावित रहा। । इस दौर को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के इतिहास में “राजनीतिक संक्रमण का काल” कहा जाता है। उस दौर में पूर्व छात्र नेता चंचल, मजूमदार, मोहन प्रकाश भी बीएचयू की छात्र राजनीति में खासा दखल रखते थे। भरत सिंह, वीरेन्द्र सिंह, राजेश मिश्रा ,वीणा पाण्डेय, सुभाष त्रिपाठी , मनोज सिन्हा सुबेदार सिंह, इंदिरा तिवारी विभिन्न छात्र संगठनों के छात्र नेता थे। इनमें से अनेक प्रदेश की राजनीति में विभिन्न दलों में की सरकारों में मंत्री भी रहे।मनोज सिन्हा इंजिनियरिंग के छात्र थे एबीवीपी से उपाध्यक्ष बने आज जम्मू कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर हैं। उस दौर में बीएचयू छात्रसंघ के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और महामंत्री का चुनाव किसी विधान सभा या लोकसभा की चकाचौंध से कम नहीं था।
मैं पुनः राजाराम मोहन राय छात्रावास की तरफ लौटता हूं। विश्वविद्यालय का परिवेश जैसा भी रहा हो रहने को छत मिल गयी, पढ़ने को कैंपस मिल गया आकाश वृतिक को यापन के लिए फैलोशिप भी मिलती रही और चाहिए भी क्या था। महामना के इस भव्य मन्दिर में सब कुछ इतना सरल और सहज था कि हम जैसे निम्न मध्यम वर्ग के छात्रों के हौसलों को उड़ने के लिए पंख मिल गये। मुझे लगता है विपरीत परिस्थितियों में भी अपने लक्ष के प्रति एकाग्रता ही सफलता की कुंजी है। इन 110 वर्षों में महामना के सपनों के इस विश्वविद्यालय ने अनेक उतार चढ़ाव देखे हैं लेकिन मूलमंत्र
“यह तीन लोकों से न्यारी काशी। सुज्ञान सत्य और सत्यराशी ॥ बसी है गंगा के रम्य तट पर, यह सर्वविद्या की राजधानी। मधुर मनोहर अतीव सुन्दर, यह सर्वविद्या की राजधानी ॥” को हर प्रतिभागी ने हमेशा मूर्त रुप देने का प्रयास किया है।
डा गिरिजा किशोर पाठक
4 नवंबर 2025
37, देवलोक फार्म,भोपाल

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