धोती से सूट तक: सत्ता की अलमारी में छुपा देश का सच

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*“धोती से सूट तक: सत्ता की अलमारी में छुपा देश का सच”*

राजेन्द्र सिंह जादौन
विशेष व्यंग्य

आज़ादी के 79 साल बाद भी राजनीति का रंग बदलता रहा, पर सत्ता की भूख कभी नहीं बदली। आज के नेता कुर्सी को ऐसे चाहते हैं जैसे रेगिस्तान का यात्री पानी को—बस मिल जाए तो सब कुछ छोड़ दें, और न मिले तो पाने के लिए कुछ भी कर जाएं।

धोती-कुर्ता का दौर अब बीत चुका है। सत्ता के गलियारों में अब विदेशी ब्रांड का सूट, रेशमी टाई और महंगे परफ्यूम की खुशबू तैरती है। जनता की सेवा अब भाषणों में है, जबकि उद्योगपतियों की सेवा नीतियों में। घोटाले, महाघोटाले और विदेशी कंपनियों की दलाली—ये सब अब राजनैतिक फैशन का हिस्सा हैं।

पक्ष, विपक्ष, नौकरशाह—सब रुपयों के आगे झुक चुके हैं। और जो नेता धोती-कुर्ता पहनकर जनता के साथ खड़े होने की हिम्मत करते हैं, उन पर पूरी सरकारी मशीनरी चढ़ा दी जाती है।
लेकिन इतिहास गवाह है—जनता की असली ताकत ने सूट-बूटधारियों को कभी न कभी झुकाया है।

आज ज़रूरत है कि कम से कम आज़ादी के महापर्व पर नेता सूट-बूट छोड़कर धोती-कुर्ता पहनें। क्योंकि अगर जनता ने एक बार ठान लिया, तो सत्ता बचाने के लिए भी इन नेताओं को वापस भारतीय परिधान में लौटना पड़ेगा—चाहे मन से न हो, जान बचाने के लिए ही सही।

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