हमारे पुराणों में चार प्रकार के पुरुषार्थ को बताया गया है – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष
स्वजन प्रणाम
सुविचार
हमारे पुराणों में चार प्रकार के पुरुषार्थ को बताया गया है – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इसमें अर्थ (धन) का महत्वपूर्ण स्थान है। अर्थ का धर्म से भी संबंध है। श्रेय कल्याण मार्ग है और प्रेम भोग मार्ग है। श्रेय एवं प्रेम को प्राप्त करने के लिए अर्थ आवश्यक है। धर्म के अनुकूल धन का अर्जन और धर्मानुकूल धन का व्यय मोक्ष की प्राप्ति में किसी संबल से कम नहीं है। धन के उपार्जन में और सुरक्षा में अनेक कठिनाईयां आती हैं, परिश्रम से ही धनार्जन होता है। गलत ढंग से उपार्जित धन अनर्थ का कारण बनता है।श्रम से प्राप्त धन ही ‘दान’ फलदायक होता है। धर्म-कर्म से प्राप्त धन ही सच्चा और श्रेष्ठ माना गया है। न्याय से प्राप्त धन को न्याय पूर्वक वृद्धि करना ही श्रेयस्कर है। धन को धर्माथ कार्य में लगाना उत्कृष्ट माना गया है।
यह कहा गया है कि – जैसा ‘धन’ वैसा ‘अन्न’,जैसा अन्न वैसा ‘मन’, और जैसा ‘मन’ वैसा ‘तन’। इसीलिए व्यक्ति को ईमानदारी पूर्वक’ शुद्ध-सात्विक धन’ कमाना जिससे दुआएँ साथ में आये तथा खुशीयाँ और सेहत का सुख की प्राप्ति ईश्वर के कृपा से मिले। यह एक शाश्वत सत्य है।
जय हिन्द. 🌳🌳विजय राघव गढ़ 🌳🌳
