कौन है डॉ. मोहन का सबसे ख़ास, कौन होगा गृहमंत्री और जनसंपर्क मंत्री?
*कौन है डॉ. मोहन का सबसे ख़ास, कौन होगा गृहमंत्री और जनसंपर्क मंत्री?*
व्यंग्य – राजेन्द्र सिंह जादौन
भोपाल की सियासत इन दिनों किसी रंगमंच से कम नहीं लग रही, जहाँ पर्दा गिरने से पहले ही कलाकारों के नाम बदलने लगे हैं। 14 अप्रैल की उस बहुचर्चित बैठक के बाद से जो “अंदर की खबर” बाहर आई है, उसने सत्ता के गलियारों में ऐसी हलचल मचाई है कि हर कोई खुद को सूत्र और सामने वाले को दर्शक मान बैठा है। सवाल वही पुराना, लेकिन अंदाज़ नया कौन है डॉ. मोहन का सबसे ख़ास?
मोहन यादव की राजनीति को समझना अब उतना आसान नहीं रहा जितना उनके मुख्यमंत्री बनने के शुरुआती दिनों में था। तब सब कुछ सीधा लगता था नई ऊर्जा, नया नेतृत्व, और नई उम्मीदें। लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीता, ये साफ होने लगा कि कुर्सी जितनी ऊँची होती है, उसके नीचे की जमीन उतनी ही खिसकती रहती है। और अब जब मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल की चर्चाएं तेज हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यही है कि मुख्यमंत्री अपने सबसे भरोसेमंद चेहरों के साथ क्या करने वाले हैं।
दिल्ली की दौड़ से लौटे मोहन यादव और हेमंत खंडेलवाल भले ही सामान्य दिखे हों, लेकिन उनके पीछे चल रही पटकथा में कई ट्विस्ट बताए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री अपने पास रखे दो अहम विभाग गृह और जनसंपर्क अब छोड़ने की तैयारी में हैं। ये वही विभाग हैं जिन्हें संभालने वाला व्यक्ति मुख्यमंत्री का “सबसे ख़ास” माना जाता रहा है। अब सवाल ये है कि क्या ये त्याग है, या फिर रणनीतिक दूरी?
गृह विभाग की बात करें तो ये सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं होता, ये सत्ता की नसों को नियंत्रित करने वाला केंद्र होता है। पुलिस से लेकर खुफिया तंत्र तक, हर धड़कन यहीं से संचालित होती है। ऐसे में अगर वाकई प्रदेश को एक महिला गृहमंत्री मिलने जा रही है, जैसा कि सूत्रों का दावा है, तो ये सिर्फ एक नियुक्ति नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश होगा। लेकिन राजनीति में हर संदेश के पीछे एक समीकरण छिपा होता है। क्या ये समीकरण संतुलन साधने के लिए है, या किसी को मजबूत करने के लिए ये आने वाला वक्त बताएगा।
अब जनसंपर्क विभाग की बात करें तो ये विभाग सरकार की “छवि” का आईना होता है। यहाँ से तय होता है कि जनता सरकार को कैसे देखेगी विकास के प्रतीक के रूप में या विवादों के केंद्र के रूप में। लेकिन इस बार ये विभाग चर्चा में इसलिए है क्योंकि इसे लेकर खुद सत्ता के भीतर ही असमंजस बताया जा रहा है। कोई इसे लेना नहीं चाहता, क्योंकि इसमें जिम्मेदारी ज्यादा है और श्रेय कम। और अगर कुछ गलत हो गया, तो सबसे पहले उंगली इसी विभाग पर उठती है।
जो विभाग कभी मुख्यमंत्री के सबसे करीबी के पास होता था, वही अब “रिस्क” क्यों बन गया? क्या इसलिए कि नीतियाँ उम्मीदों पर खरी नहीं उतरीं? या इसलिए कि अब मीडिया और जनता दोनों सवाल पूछने लगे हैं? क्योंकि आज का दौर सिर्फ प्रचार का नहीं, जवाबदेही का भी है। और जनसंपर्क विभाग इस जवाबदेही की पहली कतार में खड़ा होता है।
सूत्रों की दुनिया भी कम दिलचस्प नहीं होती। यहाँ हर खबर “पक्की” होती है, लेकिन उसकी जिम्मेदारी कोई नहीं लेता। कोई कहता है जुलाई तक संगठन में बड़े बदलाव होंगे, कोई कहता है साल के अंत तक खुद मोहन यादव की कुर्सी पर भी खतरा मंडरा सकता है। चार राज्यों में संभावित बदलावों की चर्चा में उनका नाम भी जोड़ा जा रहा है। अब ये चर्चा है या दबाव बनाने की रणनीति, ये समझना आसान नहीं।
राजनीति में “सबसे ख़ास” होना भी एक अजीब स्थिति है। आज आप मुख्यमंत्री के सबसे करीबी हैं, तो कल आप सबसे दूर भी हो सकते हैं। यहाँ रिश्ते स्थायी नहीं होते, परिस्थितियाँ स्थायी होती हैं। और जो इन परिस्थितियों को समझ लेता है, वही असली खिलाड़ी बनता है।
भोपाल के गलियारों में इन दिनों एक और दिलचस्प बात सुनने को मिल रही है“कैलाश-प्रहलाद को संगठन, नए चेहरों को शासन।” इसका मतलब साफ है कि पार्टी अब अनुभव और नवीनता के बीच संतुलन साधने की कोशिश में है। पुराने दिग्गजों को संगठन में मजबूत करना और नए चेहरों को सरकार में मौका देना ये रणनीति नई नहीं है, लेकिन हर बार इसका असर अलग होता है। लेकिन असली सवाल अब भी वहीं है कौन होगा गृहमंत्री? और जनसंपर्क किसके हाथ में जाएगा?
ये सवाल सिर्फ पदों के नहीं हैं, ये उस भरोसे के हैं जो मोहन यादव अपने सहयोगियों पर जताते हैं। क्योंकि सत्ता में सबसे बड़ा विभाग “विश्वास” होता है। अगर विश्वास मजबूत है, तो कोई भी विभाग संभाला जा सकता है। और अगर विश्वास डगमगा गया, तो सबसे मजबूत विभाग भी कमजोर पड़ जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम में एक और बात साफ नजर आती है राजनीति अब सिर्फ निर्णय लेने का खेल नहीं रही, बल्कि “धारणा” बनाने का खेल बन चुकी है। कौन किसके करीब है, कौन किससे दूर है, किसे क्या मिलने वाला है ये सब बातें अब उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई हैं जितनी कि असली फैसले।
शायद डॉ. मोहन का सबसे ख़ास वही है, जो अभी दिखाई नहीं दे रहा। शायद वही, जो पर्दे के पीछे बैठकर इस पूरी पटकथा को लिख रहा है। या फिर वही, जो सही समय आने पर सबसे आगे खड़ा होगा। क्योंकि राजनीति में सबसे बड़ा सच यही है कि यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं होता न पद, न प्रतिष्ठा, न ही “ख़ास” होने का दर्जा। बाकी सब तो बस अटकलें हैं, चर्चाएं हैं, और उन चर्चाओं के बीच चलती सियासत है…
*तो बोलो जय कन्हैया लाल की!*
