डबलस्पीक की मास्टरी इकतरफ़ा नहीं है।

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डबलस्पीक की मास्टरी इकतरफ़ा नहीं है।

छह हजार वर्ष पुरानी जिस सभ्यता और संस्कृति को इन्होंने 1300 वर्ष पहले त्याग दिया-मजबूरी में या नई नई कट्टरता में-आज दुनिया के सामने उसी की दुहाई दी जा रही है।

वह सभ्यता आक्रमण का शिकार हुई। वह सभ्यता कि जिसके बारे में उस मुल्क की ग्रेड ७ सोशल स्टडीज (२०२१-२२) में स्पष्ट लिखा है: “लगभग चार हजार वर्ष पहले कैस्पियन सागर के उत्तर से खानाबदोश लोग जिन्हें ‘आर्यन’ कहा जाता था, दक्षिण की ओर आए। आर्यनों ने ईरान में महान सरकारें बनाईं और सैकड़ों वर्षों तक शासन किया। तीन महान आर्यन जातियाँ थीं — मेद, पार्थियन और फारसी।इन्हें ईरानी एकता और साम्राज्य-निर्माण का आधार बताया गया है।

तब यह भी ध्यान रखें कि तत्कालीन ईरान में पशुबलि निषिद्ध थी।

अब यह स्वीकार करने में आपको दर्द होता था कि वे आर्य भारत से आये थे और उसी भारत से अब छह हजार वर्ष पुराने रिश्तों की बात की जा रही है। आर्य गुणसूत्र का दावा है। पर स्वयं ही पूछिए कि क्या वे गुण हैं, क्या वह सूत्र बचा कि जिसे परम्परा कहते हैं।

जिनके हाथों वह आर्य सभ्यता शिकार हुई वे अरब आक्रमणकारी थे। 633 ईस्वी में राशिदुन ख़लीफ़ा उमर के नेतृत्व में अरब सेनाएँ सासानिड साम्राज्य पर टूट पड़ीं। क़ादिसिया की लड़ाई (636 ईस्वी) निर्णायक साबित हुई। सन 642 में नहवंद में एक लाख ईरानियों का जनसंहार याद है? 651 ई का इस्तख्र का जनसंहार जिसमें 40,000 ईरानी मार डाले गये? इस्तख्र का फायर टेम्पल का नष्ट किया जाना एकदम से सोमनाथ की याद दिलाता है। कारकुया (Karkuya) फायर टेम्पल, ज़रंग (Sistan) हो या करियान (Kariyan) फायर टेम्पल सबका यही हाल हुआ। यह सब इस्लाम को ‘निमंत्रित’ करने में होता था? उमय्यद काल (661-750 ईस्वी) में आर्यों या जोरास्ट्रियनों पर अत्याचार बढ़े। उन्हें सरकारी पदों पर रोक का सामना करना पड़ा। नए मंदिर बनाने की मनाही थी। घोड़े-हथियार चलाने पर पाबंदी थी। अब्बासी काल में जज़िया और अधिक कठोर हुई। आग-मंदिरों को नष्ट किया गया या मस्जिदों में बदला गया। ज़ोरोएस्ट्रियन पुजारियों की हत्या हुई। तारीख़-ए-बुख़ारा में लिखा है कि विजेता ने “सभी आग-मंदिर नष्ट कर दिए”। लाखों ज़ोरोएस्ट्रियन भारत चले गए जिनके वंशज पारसी समुदाय आज भी भारत में हैं।

पर यह तो ईरान की ही पाठ्यपुस्तकें हैं जो अरब विजय के लिए आक्रमण शब्द का प्रयोग करने से बचती हैं और उसे “इस्लाम का निमंत्रण” या “ इस्लाम का स्वागत” कहती हैं। इस्लाम को अत्याचार से मुक्ति, तौहीद और सामाजिक न्याय लाने वाली शक्ति के रूप में चित्रित किया जाता है। सासानिड राजपरिवार को इस्लाम स्वीकार न करने और न्याय स्थापित न करने का दोष दिया जाता है। ख़ामेनेई ने पर्सेपोलिस को “अत्याचारी राजाओं की इमारतें” कहा। जिस साइरस का सिलिंडर (539 ईसा पूर्व) मानवाधिकारों का प्रथम लिखित प्रमाण माना जाता है, आयतुल्लाह ख़ुमैनी ने शाह के समय तक राष्ट्रीय नायक कहे जाने वाले उसी साइरस को “तानाशाही का प्रतीक” बताया। Religion and Life, (ग्रेड 12) पाठ्यपुस्तक में प्री-इस्लामिक काल को जाहिलियत का प्रतीक बताया जाता है — जैसे आधुनिक पश्चिमी “स्वतंत्रता” को “प्री-इस्लामिक अज्ञानता” की वापसी कहा जाता है।

और असली आत्मनाशी जाहिलियत के परिदृश्य तो अब सबको दिखाई पड़ रहे हैं।

वे ही अरब हैं और वही ईरान हैं

और असल जाहिलियत है।manoj shreevastava

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