आज दिल्ली में इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र और अयोध्या न्यास के कार्यक्रम में- रामकिंकर उपाध्याय की दृष्टि में रामराज्य का भाव- विषय पर बोलते हुए- Manoj Shrivastava

आज दिल्ली में इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र और अयोध्या न्यास के कार्यक्रम में- रामकिंकर उपाध्याय की दृष्टि में रामराज्य का भाव- विषय पर बोलते हुए
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सबसे पहले मैं युग तुलसी कहे जाने वाले रामकिंकर उपाध्याय जी की स्मृति में अपनी प्रणति अर्पित कर लूँ। मुझे अपने विद्यार्थी काल की याद है जब रामकिंकर जी के प्रवचन को अपने गृहनगर भोपाल में सुनने का सुयोग मुझे मिला था। रामकिंकर जी हमारे मध्यप्रदेश के जबलपुर में ही जन्मे थे। संभवत: यह बचपन में ही उनकी भाव भागीरथी में ही स्नात होने का ही परिणाम रहा होगा कि आगे चलकर मुझे भी सुंदरकांड पर लिखने की प्रेरणा हुई। 18 ग्रंथ आए और 2012 में मुझे मंदाकिनी जी के हाथों से अयोध्या के संत समाज की ओर से रामकिंकर उपाध्याय पुरस्कार मिला। अभी दो दिन पहले हम लोगों ने प्रथम रामकिंकर हनुमान जी की जयन्ती मनाई है और आज हम नाम और काम दोनों से रामकिंकर जी का स्मरण कर रहे हैं। मेरा लेखन उस संन्यास वृत्ति का लेखन नहीं है जिसके दर्शन पूज्यपाद महाराज श्री के प्रवचनों में होते हैं। मैं तो अपनी प्रशासनिक भूमिकाओं का निर्वाह करते हुए लिख रहा था, इसलिए आज मैं विशेष प्रसन्न हूँ कि मुझे रामकिंकर उपाध्याय की दृष्टि में रामराज्य का भाव विषय पर बोलने को आमंत्रित किया गया है। प्रशासन में रहने के कारण मैं आधुनिक राज्य की प्रकृति के यथार्थ से भी परिचित हूँ और रामकिंकर जी की दृष्टि में रामराज्य के आदर्श से भी।
पता नहीं कैसे, पर मेरे पास रामकिंकर जी का एक विजिटिंग कार्ड है पर उससे जुड़ा कोई प्रसंग मुझे याद नहीं आता। यह जरूर याद है कि भोपाल में जब रामरस की भावमाधुरी में वे हमें विमुग्ध कर रहे थे तब उनका विषय शबरी पर था। शबरी को उन्होंने रामराज्य के प्रथम दो नागरिकों में से एक कहा है।उनके रामराज्य का प्रथम नागरिक केवट था और दूसरी शबरी। हम इसके बारे में आगे चर्चा करेंगे।
रामकिंकर जी के रामराज्य की अवधारणा प्राथमिक रूप से तुलसी के रामचरितमानस से प्रवाहित है। ध्यान दें कि मैं प्रभावित नहीं, प्रवाहित कह रहा हूँ। यानी यों तो रामराज्य की प्राचीनतम साहित्यिक परिकल्पना वाल्मीकीय रामायण वाले उत्तरकांड में मिलती है जहां राम के राज्याभिषेक के पश्चात् एक ऐसे राज्य का वर्णन है जहां कोई विधवा नहीं रोती, किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती, कोई चोरी नहीं होती, कोई व्याधि या पीड़ा भी नहीं है। कई लोग यूटोपिया से रामराज्य को संभ्रमित करते हैं. यूटोपिया की कल्पना विशुद्ध कल्पना है, रामकिंकरजी के जी के लिए रामराज्य एक ऐतिहासिक स्मृति। रामराज्य एक जीती जागती सच्चाई था. यह भारत के जन मानस का भी मानना रहा है। यह विश्वास ही उसे यूटोपिया से भिन्न करता है। यूटोपिया कभी नहीं है, कहीं नहीं है. 1516 में थामस मूर ने जब इस शब्द का प्रयोग किया था, तब इसका अर्थ था नो प्लेस। लेकिन रामराज्य का देश और काल दोनों रहा। यूटोपिया एक अप्राप्य स्वप्न है, लेकिन रामकिंकरजी रामराज को एक prescriptive ideal की तरह बरतते हैं. पाश्चात्य यूटोपिया संस्थानीकृत था, राज्य केंद्रित, रामराज्य की जैसी व्याख्या रामकिंकर उपाध्याय जी ने की, वह virtue ethics पर आधारित है। वहाँ institutional design की बात नहीं है, रामराज्य को पंडित जी जब तुलसी की पंक्ति का साक्ष्य लेकर जब नीरोग राज्य कहा तो यह भी कहा कि रामराज्य का तात्पर्य यह नहीं है कि जहाँ बहुत से औषधालय हों। जहाँ पर लोगों के लिए समस्त साधन उपलब्ध हों, वस्तुतः वह तो एक व्यवस्थित राज्य का लक्षण है, लेकिन रामराज्य का तात्पर्य है एक ऐसा राज्य जहाँ व्यवस्था की आवश्यकता ही नहीं हो।
रामराज्य को रामकिंकर जी ने एक सपने की तरह न देखकर एक स्मृति की तरह देखा। एक इतिहास की तरह, एक फ्लेश एंड ब्लड मेमोरी की तरह, हाड़ मांस के व्यतीत की तरह।
रामकिंकर जी ने कहा था कि रामराज्य की स्थापना केवल स्वर्ण सिंहासन पर बैठाकर तिलक कर देने मात्र से नहीं होगी। वह तो प्रेम-राज्य है जिसकी स्थापना समाज के प्रत्येक व्यक्ति के हृदय-सिंहासन पर होगी। उनकी इस पंक्ति को पढ़कर मुझे जिमी हेन्ड्रिक्स याद आते रहे कि जिनका मानना था कि अब प्रेम की सत्ता सत्ता के प्रेम को जीत लेगी तब दुनिया शांति को जान पाएगी।
याद कीजिए कैसे हनुमान ‘हृदय राखी कोसलपुर राजा’ चलते हैं क्योंकि हृदय पर ही राम का शासन है और उसके लिए औपचारिक रूप से वनवास से लौटकर राज्याभिषेक होना आवश्यक नहीं है।राम के राजत्व की एक नैसर्गिकता है। रामराज्य को इंजीनियर नहीं करना है, उसे प्लान नहीं करना है, वह कोई कृत्रिम यंत्र नहीं है। आपने विषय सही रखा रामराज्य का भाव। बात उसी भाव-शुद्धि की, भाव-साम्राज्य की है।
प्रायः हम लोग रामराज्य की संकल्पना को तुलसी के मानस के उत्तरकांड से जोड़ते हैं पर रामकिंकर जी की स्थापना यह थी कि राम-राज्य की स्थापना का श्रीगणेश वन में किया गया। अब यह बात मुझे यों अच्छी लगी कि रावण राज उपवन का, अशोक वाटिका का है। वन में सहजता है, उपवन मेनिक्योर्ड होता है। रामकिंकर जी ने यह भी कहा कि राम राज्य की नागरिकता का सौभाग्य पहले कोल भीलों को प्राप्त हो गया था. वे तुलसी के वर्णन से ही प्रमाण भी देते हैं:
राम बासु बन संपत्ति भ्राजा
सुखी प्रजा जनु पाई सुराजा
सचिव विराग विवेक नरेसु
विपिन सुहावन पावन देसु
भट जम नियम सैल रजधानी
सांति सुमति सुचि सुंदर रानी
जीति मोहु महिपाल दल सहित विवेक भुआलु
करत अकंटक राजु पुरै सुख संपदा सुकालु
शबरी को उन्होंने जो सत्कार दिया, वह अपने इसी राजधर्म के अनुसार था और रामकिंकर जी उसी की ओर ध्यान खींचते हैं। कि राम के राज में सिर्फ एक भक्ति का नाता है। जब शबरी कहती है कि
अधम ते अधम अधम अति नारी।
तिन्ह मँह मैं मतिमंद अधारी॥
तब राम कहते हैं कि
कह रघुपति सुनु भामिन बाता।
मानहुँ एक भगति कर नाता॥
और जिन नातों की रामराज में परवाह नहीं पाली जाती वे भी अगली पंक्ति में वे बता देते हैं-
जाति पाति कुल धरम बड़ाई।
धन बल परिजन गुनचतुराई॥
आज भारत में जिस तरह की क्रिटिकल रेस थियरी चल रही है उसे देखकर याद करें कि जाति पाति रामराज्य में नहीं है। ‘कुल’ शब्द में डाइनेस्टी का निषेध देखें। धन में एरिस्टोक्रेसी का। बल में माफिया राज का। इन सब शासन प्रकारों के समक्ष रामराज्य के इस पहलू को रखें।
रामराज्य में, रामकिंकर जी बताते हैं कि, राजा सेवा करने के लिए है, सेवा लेने के लिए नहीं । राज्याभिषेक के दिन राम को स्नान कराने, उनकी उलझी जटा सुलझाने और वस्त्राभूषणों से सुसज्जित करने की परंपरा थी जिसके लिए गुरु वशिष्ठ ने सेवकों को आदेश भी दिया था। पर राम नयी परंपरा करने की शुरुआत करते आये हैं तो यहां भी वही करते हैं:
राम कहा सेवकन्ह बुला ई
प्रथम सखन्ह अन्वावहु जाई
ध्यान दें, पहले मैत्री निभाना है कि पहले सेवक लोग राम के सखाओं को नहलाएँ। फिर बंधुत्व की बात है तो तीनों भाइयों को पहले स्वयं राम ही नहलाते हैं:
अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई
भगत बछल कृपाल रघुराई
और नई परंपरा स्थापित करते हुए भी गुरु की अवज्ञा का संकेत न जाए, इसलिए गुरु से आज्ञा मानकर स्वयं नहाते हैं बिना सेवक की मदद के। खुद ही अपनी जटाएँ सुलझाते हैं।
पुनि निज जटा राम विबराए
गुर अनुसासन मागि नहाए
इसलिए राम की लीडरशिप सर्विस है, पोज़ीशन नहीं है। उनका नेतृत्व आदेश देने की शक्ति पावर टु कमांड में नहीं है बल्कि वह सेवा करने का साहस है, करेज टु सर्व। जेम्स हंटर ने पूछा था कि who then is the greatest leader? और उसका उत्तर उसी ने यह दिया था कि The one who has served the most. राबर्ट ग्रीनलीफ की सर्वेंट लीडरशिय का सिद्धान्त राम के राजत्व में है।
