राजधानी में अपराध बेलगाम, कमिश्नर की सख्ती सिर्फ ट्रैफिक तक? भोपाल पुलिसिंग पर उठे बड़े सवाल

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*राजधानी में अपराध बेलगाम, कमिश्नर की सख्ती सिर्फ ट्रैफिक तक? भोपाल पुलिसिंग पर उठे बड़े सवाल*

 

*थानों में फरियादी परेशान, जुआ-सट्टा बेखौफ; निरीक्षण और सोशल मीडिया की चमक के बीच ज़मीनी हकीकत कटघरे में*

 

✍️ पंकज सिंह भदौरिया | ✍️

 

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में नए पुलिस कमिश्नर संजय कुमार के पदभार ग्रहण करते ही यह उम्मीद जगी थी कि बालाघाट में नक्सल नेटवर्क पर सख्त कार्रवाई करने वाले अफसर अब राजधानी में अपराधियों की कमर तोड़ देंगे। फरवरी 2026 में पदभार संभालते समय उन्होंने क्राइम कंट्रोल को पहली प्राथमिकता बताया भी था।

 

*जुआ-सट्टा बदस्तूर जारी*

 

लेकिन दो महीने के भीतर शहर की तस्वीर कुछ और कहानी कह रही है। सड़कों पर जाम जस का तस है, मोहल्लों में जुआ-सट्टा बदस्तूर जारी है, चोरी-लूट की वारदातों से लोग सहमे हैं और थानों में फरियादी आज भी आवेदन की रिसीविंग के लिए तरसते नजर आते हैं।

 

*पुलिसिंग सिर्फ निरीक्षण की फोटो तक सीमित रह गई है?*

 

पुलिस कमिश्नर की बैठकों, औचक निरीक्षणों और सोशल मीडिया पर लगातार दिख रही “एक्शन मोड” की तस्वीरों के बावजूद आम नागरिक पूछ रहे हैं—क्या राजधानी की पुलिसिंग सिर्फ निरीक्षण की फोटो तक सीमित रह गई है? हालिया बैठकों में ट्रैफिक और अपराध नियंत्रण पर सख्त निर्देश दिए गए थे, लेकिन जमीन पर असर अभी भी कमजोर दिखाई देता है।

 

*जुआ सट्टा तो आम बात है*

 

शहर के कई हिस्सों में जुआ और सट्टा अब “ओपन सीक्रेट” बन चुका है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि पुलिस की जानकारी के बिना यह नेटवर्क चलना मुश्किल है, फिर भी कार्रवाई केवल खानापूर्ति तक सिमट जाती है। नतीजा यह कि अपराधियों में कानून का डर कम और संरक्षण का भरोसा ज्यादा दिखता है।

 

*अवधपुरी थाने के हालत चिंताजनक*

 

सबसे चिंताजनक तस्वीर थानों की कार्यप्रणाली को लेकर सामने आती है। राजधानी के कई थानों में फरियादी को पहले खुद संदिग्ध पकड़ने, सीसीटीवी फुटेज जुटाने और सबूत लाने की मशक्कत करनी पड़ती है, तब कहीं पुलिस हरकत में आती है। अवधपुरी और एमपी नगर जैसे थाने में कई उदाहरण हैं इन थाने को लेकर जनता में नाराज़गी सबसे अधिक है।

 

*सिर्फ इवेंट आधारित पुलिसिंग से माहौल बनाया जा रहा है?*

 

कथित “शॉर्ट एनकाउंटर” भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। शहर में यह धारणा बन रही है कि अपराधी मुठभेड़ के बाद अस्पताल में आराम करते हैं, लेकिन अपराध की जड़ों तक पहुंचने वाली ठोस कार्रवाई कम नजर आती है। सवाल यह भी है कि क्या अपराधियों के नेटवर्क पर चोट हो रही है या सिर्फ इवेंट आधारित पुलिसिंग से माहौल बनाया जा रहा है?

भोपाल राजधानी है—यहां पुलिसिंग का पैमाना सिर्फ ट्रैफिक चालान, फ्लैग मार्च और निरीक्षण की तस्वीरें नहीं, बल्कि थानों में फरियादी का सम्मान, अपराधियों में भय और सड़कों पर सुरक्षा का भरोसा होना चाहिए।

 

*पुलिस कमिश्नर पर सबसे बड़ा सवाल**

बालाघाट में नक्सल मोर्चे पर सख्त छवि बनाने वाले कमिश्नर क्या भोपाल में भी अपराध के असली नेटवर्क पर चोट कर पाएंगे, या राजधानी की पुलिसिंग सोशल मीडिया पोस्ट और औचक निरीक्षण तक ही सीमित रहेगी?

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