विश्व गौरैया दिवस
विश्व गौरैया दिवस पर याद करना चाहिए कि माओभक्तों के लिए गौरैयाओं को मारना द ग्रेट लीप फ़ॉरवर्ड हुआ करता था। इतनी वैज्ञानिक सोच थी इन ईश्वर में अविश्वास से आधुनिकता स्वत:सिद्ध मान लेने वाले पुरोधाओं में – कि गौरैया अनाज खा जाती हैं।
जब भारत में कोरोना के विरुद्ध राष्ट्रीय एकजुटता के लिए थाली बजाने का कुछ मिनटों का एकदा प्रयोग हुआ था तब वामियों ने उसकी बड़ी हँसी उड़ाई थी पर इन्हीं लोगों द्वारा चीन में गौरैयाओं का महाहत्याकांड करने के लिए सुबह से शाम तक ढोल, थाली, पटाखे, मेगाफोन बजाए जाते थे। गौरैयाँ थककर जमीन पर गिर जाती थीं—उन्हें लाठियों से मार दिया जाता था। घोंसले तोड़े जाते, अंडे कुचले जाते, चूजे कुचले जाते। शहरों और गाँवों में ‘गौरैया सफाया मुख्यालय’ बने थे। अखबारों में सैन्य शैली के शीर्षक छपते थे—“गौरैया नाश सेना ने शानदार परिणाम दिए”। स्कूल, फैक्ट्रियाँ, कम्यून्स में हिस्सा लेना अनिवार्य था। वैज्ञानिक भी शामिल हुए। बीजिंग में पीपुल्स डेली ने निर्देश दिया—“सुबह और शाम 4 से 7:30 बजे तक गौरैयों को उनके घोंसलों से बाहर निकालकर मारो”। बच्चे स्कूल छोड़कर शामिल होते। सिचुआन में एक स्कूली बच्चे ने बाद में याद किया—“चार कीटों का सफाया मजेदार था। हम स्कूल से गौरैयों के घोंसले तोड़ने जाते, शाम को थाली बजाते”। 1958 की वसंत ऋतु में, चीन के विशाल इलाकों में लाखों-करोड़ों गौरैयाँ (Eurasian Tree Sparrow) आसमान से गिरकर मर रही थीं। ये मौतें बीमारी या मौसम की वजह से नहीं थीं, बल्कि थकान से। लोग—मर्द, औरतें, बच्चे और वैज्ञानिक तक—सुबह से शाम तक ढोल, थाली, तेल की डिब्बियाँ, पटाखे और झंडे लहराकर शोर मचा रहे थे। कुछ गौरैयाँ विदेशी दूतावासों में शरण लेने की कोशिश करतीं। पोलैंड दूतावास ने चीनी टीमों को अंदर नहीं आने दिया। बदले में दो दिन तक दूतावास को घेरकर शोर मचाया गया। जब लाशें साफ की गईं, तो दृश्य भयानक था।
आंकड़े भले बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए हों, लेकिन भयानक थे। 1958 में अधूरा आंकड़ा—20 करोड़ से ज्यादा गौरैयाँ मारी गईं। राष्ट्रीय समिति ने दावा किया—211 करोड़ गौरैयाँ, 150-190 करोड़ चूहे, करोड़ों किलो मक्खियाँ-मच्छर। 1959 तक एक अरब से ज्यादा गौरैयाँ मर चुकी थीं।
1958 के अंत तक कई प्रांतों में गौरैया विलुप्त हो गई। बिना प्राकृतिक शिकारी के, टिड्डियाँ, प्लांथॉपर और अन्य कीट बेकाबू हो गए। गौरैयाँ कीटों को खाती थीं—अब वे फसलों पर टूट पड़े। 1959 की वसंत में कुछ शहरों की सड़कें पत्तियों से साफ हो गईं। खेत सूखे या बाढ़ से बच भी जाते, तो कीट नष्ट कर देते।
हाल के अध्ययनों से पता चला कि गौरैया सफाया अकेले फसल उत्पादन में 20% गिरावट का कारण बना, जिससे करीब 20 लाख मौतें सीधी हुईं। अन्य कारण—भट्टियों से जंगल कटाई, सामूहिक खेती में प्रेरणा की कमी, झूठे आंकड़े, अनाज निर्यात—ने स्थिति और बिगाड़ी।
1959-1961 में चीन में भयानक अकाल पड़ा। आधिकारिक इतिहास ने इसे तीन वर्ष की प्राकृतिक आपदा’ कहा, लेकिन दस्तावेज बताते हैं कि यह मानव-निर्मित था। कैडर कोटा न पूरा करने वालों को पीटते। कैनिबलिज्म के हजारों मामले दर्ज हुए। माता-पिता बच्चों को खाते, बच्चे माता-पिता को। पत्रकार यांग जिशेंग की किताब ‘टॉम्बस्टोन’ (चीन में प्रतिबंधित) में 3.6 करोड़ मौतों का अनुमान किया गया था। अन्य अनुमान 1.5-5.5 करोड़ था।
गौरैया-प्रभावित इलाकों में मौतें ज्यादा थीं। पोस्टरों पर बच्चे गुलेल लिए खुश दिखाए जाते थे। नारे थे—“चूहे चालाक, गौरैया बुरी, मक्खी-मच्छर दक्षिणपंथी जैसे”। यह अभियान महान छलांग का हिस्सा था—‘मनुष्य प्रकृति को जीत सकता है’ (ren ding sheng tian)।
लोग खुले मैदानों, गाँवों, शहरों और खेतों में इकट्ठा होकर पॉट्स (बर्तन), पैन (कड़ाही), स्पून (चम्मच), वॉशबेसिन (टब), ढोल (drums), गोंग (घंटियाँ) और अन्य घरेलू बर्तनों को जोर-जोर से बजाते थे।यह “शोर की दीवार” बनाता था, जिससे गौरैयाँ डरकर जमीन पर नहीं उतर पाती थीं। वे लगातार उड़ती रहतीं, थक जातीं और अंत में थकान से गिरकर मर जातीं। कई जगहों पर यह हमला घंटों चलता था। पीपुल्स डेली (People’s Daily) अखबार ने स्पष्ट निर्देश दिए थे: सुबह के समय और शाम 4:00 बजे से 7:30 बजे तक, जब गौरैयाँ घोंसलों से बाहर होतीं या घोंसलों में लौट रही होतीं, तब हमला करना।इस समय पर पूरा देश एक साथ बर्तन बजाता था। स्कूल, फैक्ट्रियाँ और कम्यून्स में काम रोककर लोग इसमें शामिल होते थे। सरकार ने पोस्टर, गाने और जिंगल्स बनाए, जिनमें लोगों को बर्तन बजाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था।
और गौरैया की गिनती कीट/कृमि (pest) की तरह करना तो साम्यवाद का मास्टरस्ट्रोक था।
अब सोचिए इतने महान माओ के फोटो क्यों न लगाएं अपने कार्यालयों में भारत के ये माओजीवी।
क्यों ये माओजीवी माओ त्से-तुंग की 130वीं जयंती पर तीन वर्ष पूर्व उन्हें “महान क्रांतिकारी” न लिखें?
क्यों बीजिंग में माओ त्से-तुंग के मकबरे पर श्रद्धांजलि अर्पित न करें ये और भारत से गये प्रतिनिधिमंडल के सदस्य इसे “गहन भावुक अनुभव” न बतायें?
क्यों ये सप्ताह भर माओ-उत्सव मनाने और जन-मोबिलाइजेशन की अपील न करें कि जिसमें माओ की लंबी जनयुद्ध की विरासत को जारी रखने की बात की गई हो।
अब इनकी आई क्यू के प्रमाण वे गौरैया तो दे नहीं सकतीं जो मर गईं। पश्चिम बंगाल के एक विश्वविद्यालय के रेवोल्यूशनरी स्टूडेंट्स फ्रंट ने अभी कुछ वर्ष पहले माओ के “महान बलिदान” की प्रशंसा की थी। पर वह बलिदान इन करोड़ों गौरैयाओं का और उनके मरने से मरे करोड़ों चीनियों का था या इनके महान क्रांतिकारी नेता का?
कई लोगों ने उस विचारधारा के अनुयायियों के लिए कई नाम रखे हैं। कई euphemisms. मैंने उन्हें एक अलग नाम दिया है-चिड़ीमार।
विश्व गौरैया दिवस पर हमें पर्यावरण -इतिहास की उस महानतम मूर्खता को याद अवश्य करना चाहिए।
