मोहन राज में “ज़मीन, ज़मीर और व्यवस्था का खेल”?
*मोहन राज में “ज़मीन, ज़मीर और व्यवस्था का खेल”?*
सम्पादकीय -राजेंद्र सिंह जादौन
मध्यप्रदेश की धरती को यूँ ही “समृद्ध” नहीं कहा जाता। यहाँ सब कुछ उपलब्ध है जंगल, पानी, खनिज, और सबसे अहम… “व्यवस्था”। बस फर्क इतना है कि ये व्यवस्था सबके लिए एक जैसी नहीं है। यह उस पुराने तराजू की तरह है, जिसमें बाट बदलते रहते हैं कभी पैसा भारी हो जाता है, कभी पहचान, और कभी सत्ता की छाया।
सरकार जब मंचों से बोलती है तो लगता है मानो प्रदेश निवेश का नया स्वर्ग बन चुका है। करोड़ों के एमओयू, लाखों रोजगार के वादे, और विकास के चमकदार आंकड़े। बाहर से आने वाले बड़े व्यापारी आते हैं, उनके स्वागत में रेड कार्पेट बिछाया जाता है। उन्हें जमीन चाहिए? मिल जाएगी। वो भी ऐसी कि देखकर आम आदमी की आँखें चौंधिया जाएँ। कागज़ी प्रक्रिया इतनी सरल हो जाती है कि जैसे सरकार खुद कह रही हो“बस आप निवेश का वादा कीजिए, बाकी हम संभाल लेंगे।”
और ये सब देखकर आम आदमी सोचता है वाह! क्या व्यवस्था है। लेकिन कहानी का दूसरा पन्ना पलटते ही सच्चाई का रंग बदल जाता है।
उसी प्रदेश में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो न तो करोड़ों का निवेश करते हैं और न ही सत्ता के गलियारों में उनकी कोई पहचान होती है। वे समाज के उस हिस्से के लिए काम करते हैं, जिसे देखना भी लोग पसंद नहीं करते लावारिश लाशें। जनसंवेदना जैसी संस्था उन शवों को कंधा देती है, जिन्हें कोई अपना कहने वाला नहीं होता। वो कफन देती है, अंतिम संस्कार करती है, और इंसानियत का वो कर्ज चुकाती है, जिसे समाज अक्सर भूल जाता है।
अब सोचिए, ऐसी संस्था अगर सरकार से 5000 स्क्वायर फीट जमीन माँग ले तो क्या होना चाहिए? सामान्य बुद्धि कहती है कि तुरंत मदद मिलनी चाहिए। लेकिन यहाँ सामान्य कुछ भी नहीं है। यहाँ फाइलें चलती नहीं, रेंगती हैं। और कई बार तो रेंगते-रेंगते रुक भी जाती हैं। विवेक पोरवाल जैसे अधिकारी उस फाइल पर ऐसे बैठ जाते हैं जैसे कोई बहुत बड़ा निर्णय लेना हो मानो 5000 स्क्वायर फीट जमीन नहीं, बल्कि पूरा प्रदेश दांव पर लगा हो।
फाइल इधर से उधर घूमती है, टिप्पणियाँ लिखी जाती हैं, स्पष्टीकरण माँगे जाते हैं, और अंत में… फाइल वहीं की वहीं। उधर, भोपाल की श्री कंठ समाज सेवा समिति कालिया श्रोत और केरवा जैसे पर्यावरणीय क्षेत्रों को बचाने के लिए प्रयास कर रही है। वृक्षारोपण करना चाहती है, प्रकृति को संवारना चाहती है। लेकिन उनकी सबसे बड़ी गलती ये है कि उनके पास न कोई राजनीतिक सिफारिश है, न कोई बड़ा आर्थिक प्रस्ताव।
