आबकारी में टेंडर का खेल शुरू, कमीशन के चक्कर में 60 प्रतिशत तक जा रहे टेंडर?

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*आबकारी में टेंडर का खेल शुरू, कमीशन के चक्कर में 60 प्रतिशत तक जा रहे टेंडर?*

 

राज्य के आबकारी विभाग में इन दिनों टेंडर प्रक्रिया को लेकर नई चर्चाएँ तेज हो गई हैं। विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि कई कार्यों के टेंडर अब गुणवत्ता और वास्तविक लागत से ज्यादा कमीशन के गणित पर तय होने लगे हैं। हालात ऐसे बन रहे हैं कि टेंडर 60 प्रतिशत तक कम रेट पर डाले जाने की बातें सामने आ रही हैं, जिसके पीछे कमीशन का खेल होने की आशंका जताई जा रही है।

 

आबकारी विभाग सरकार के उन विभागों में से एक है जहां हर साल करोड़ों रुपये के काम होते हैं। शराब दुकानों के प्रबंधन, गोदामों की व्यवस्था, परिवहन, सुरक्षा, आईटी सिस्टम, निर्माण और अन्य सेवाओं के लिए बड़े पैमाने पर टेंडर जारी किए जाते हैं। लेकिन अब आरोप लग रहे हैं कि इन टेंडरों की प्रक्रिया पारदर्शी कम और सेटिंग वाली ज्यादा होती जा रही है।

 

सूत्र बताते हैं कि टेंडर जारी होने के बाद कुछ चुनिंदा ठेकेदारों को पहले से ही जानकारी मिल जाती है कि कितना प्रतिशत कम रेट डालना है और किसे काम मिलना है। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि वास्तविक लागत से 50 से 60 प्रतिशत तक कम बोली लगाई जाती है। सवाल यह उठता है कि जब कोई ठेकेदार इतना कम रेट देता है तो वह काम की गुणवत्ता कैसे बनाए रखेगा।

 

विशेषज्ञों का मानना है कि जब टेंडर बहुत कम रेट पर दिए जाते हैं तो ठेकेदार बाद में लागत निकालने के लिए अलग-अलग रास्ते अपनाते हैं। कहीं घटिया सामग्री का उपयोग होता है, कहीं काम अधूरा छोड़ दिया जाता है और कहीं बिलों में हेरफेर कर नुकसान की भरपाई की जाती है। इसका सीधा असर सरकारी व्यवस्था और राजस्व पर पड़ता है।

 

आबकारी विभाग में पहले भी कई बार अनियमितताओं को लेकर सवाल उठते रहे हैं। शराब दुकानों के आवंटन से लेकर परिवहन व्यवस्था तक कई मामलों में जांच की मांग होती रही है। लेकिन हर बार मामला कुछ समय बाद ठंडे बस्ते में चला जाता है और व्यवस्था जस की तस बनी रहती है।

 

टेंडर प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी भी एक बड़ी समस्या मानी जा रही है। हालांकि सरकार ने ई-टेंडरिंग की व्यवस्था लागू कर दी है, लेकिन इसके बावजूद पर्दे के पीछे की सेटिंग और सांठगांठ खत्म नहीं हो पाई है। कई ठेकेदारों का कहना है कि अगर कोई बाहरी या नया व्यक्ति टेंडर में हिस्सा लेना चाहता है तो उसके लिए काम हासिल करना लगभग असंभव हो जाता है, क्योंकि पूरा सिस्टम पहले से तय रहता है।

 

विभाग के कुछ ईमानदार अधिकारियों का भी मानना है कि अगर टेंडर 60 प्रतिशत तक कम रेट पर जा रहे हैं तो यह अपने आप में एक बड़ा संकेत है कि कहीं न कहीं सिस्टम में गड़बड़ी है। क्योंकि कोई भी ठेकेदार बिना लाभ के काम नहीं करता। अगर वह इतना कम रेट दे रहा है तो उसके पीछे कोई न कोई गणित जरूर होता है।

सरकार बार-बार भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात करती है और पारदर्शिता लाने के लिए नई नीतियाँ बनाती है। लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अलग दिखाई देती है। आबकारी विभाग में टेंडर के नाम पर चल रहे इस कथित खेल ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर टेंडर 60 प्रतिशत तक कम रेट पर जा रहे हैं तो आखिर विभाग इसकी जांच क्यों नहीं करता। क्या अधिकारियों को इसकी जानकारी नहीं है या फिर सब कुछ जानते हुए भी अनदेखा किया जा रहा है।

 

अब जरूरत इस बात की है कि सरकार और उच्च स्तर के अधिकारी पूरे मामले की गंभीरता से जांच कराएं। अगर टेंडर प्रक्रिया में किसी भी तरह की अनियमितता या कमीशनखोरी सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। क्योंकि आखिरकार यह पैसा जनता का है और इसका सही उपयोग होना ही चाहिए।

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