तमिलनाडु को लेकर हंगामा
तमिलनाडु को लेकर हंगामा है। 10 मई को तमिलनाडु की विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो जाएगा। वह भंग हो जाएगी। उसके बाद अमित शाह सामने आएंगे। फिर शायद भाजपा के प्रभाव वाली सरकार का अभियान शुरू हो।
अभी अमित शाह बंगाल में व्यस्त हैं। ममता बनर्जी का नाटक समेट रहे हैं। वहां भी विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने का इंतजार किया। वह भंग हो गई। अधिसूचना जारी हो गई। तो ममता बनर्जी के इस्तीफा नहीं देने की बातें बेईमानी बन गई। वहां भाजपा की सरकार बनने की प्रक्रिया चल रही है। 9 मई को भाजपा का मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति में शपथ लेगा। फिर मंत्रिमंडल बनेगा और अमित शाह आपरेशन तमिलनाडु हाथ में ले लेंगे।
वहां कैसी चालें चलेंगी यह देखते जाइए। पर मैं कुछ बातें साफ करना चाहता हूं।
चुनाव के बाद राज्यपाल की भूमिका अहम हो जाती है।
प्रारंभ में राज्यपाल इंतजार करते हैं।
जिस दल को बहुमत मिलता है उसके विधायक दल का नेता राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करता है। राज्यपाल को भी जानकारी होती है कि किस पार्टी को बहुमत मिला है और उसके विधायक दल का नेता कौन चुना गया है।
यहां स्पष्ट तौर पर समझ लें कि बात निर्विवाद स्पष्ट बहुमत की हो रही है। इसलिए राज्यपाल उस नेता को सरकार बनाने को आमंत्रित करता है और उसे एक समय सीमा में विधानसभा में बहुमत साबित करने को कहता है।
लेकिन स्पष्ट बहुमत न हो, गठबंधन की बात हो तो राज्यपाल की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है और यहां राजनीतिक खेल की गुंजाइश भी निकल जाती है।
फिर राज्यपाल इंतजार करता है कि कोई दल या गठबंधन आकर सरकार बनाने का दावा पेश करे।
तब दल या गठबंधन राज्यपाल के पास जाकर दावा पेश करता है। वो चाहे तो बहुमत के कुछ प्रमाण भी रखता है। तब राज्यपाल चाहे तो उस दावे को तत्काल स्वीकार न कर समय मांग लेते हैंं।
राज्यपाल इंतजार करते हैं। यही राजनीति है। यहां कुछ और दल और गठबंधन भी सरकार बनाने का दावा पेश कर सकते हैं।
यहीं राजनीति है। राज्यपाल अपने विवेक पर किसी भी दल या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए बुला सकते हैं। एक और राजनीतिक पाइंट है कि जिसे बुलाते हैं उसे कितना समय दिया जाए इस पर संविधान, नियम, परंपरा चुप हैं। राज्यपाल तीन दिन से एक माह तक का समय दे सकते हैं। यह विधायक रूपी घोड़ों की खरीद फरोख्त के लिए काफी है। यहां विधायक नहीं, विधायक रुपी घोड़े बिकते हैं। यही राजनीतिक झोल है।
बस यहां राज्यपाल के हाथ एक मामले में बंधे हैं वह यह कि राज्यपाल के चहेते नामांकित मुख्यमंत्री को विधानसभा में बहुमत साबित करना पड़ता है। तब यह बात कोई मायने नहीं रखती कि राज्यपाल के चमचे मुख्यमंत्री ने कितने विधायकों के समर्थन का दावा किया था।
राज्यपाल की दी गई समय सीमा में नामांकित मुख्यमंत्री को विधानसभा में बहुमत साबित करना होता है। वह यह नहीं कर पाता है तो सरकार गिर जाती है और राज्यपाल को भी अपमानजनक बातें सुनने को मिलती हैं।
यह स्थिति भी सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टों के फैसलों के बाद बनी है। उसमें कहा गया है कि बहुमत राजभवन में नहीं विधानसभा में साबित करना होगा।
इन फैसलों के पहले तो इस बारे में भी जमकर राजनीति चलती थी।
इन सब बातों को बताने का मतलब यही है कि विधानसभा में चाहे जितनी सीटें जीत लो, सरकार बनाने के दावे पेश कर लो। सरकार बनाने को किसे आमंत्रित करना ह यह राज्यपाल का निर्विवाद संवैधानिक अधिकार है।
