लंबित फाइलों का गणराज्य एक आत्मा की सरकारी यात्रा?
लंबित फाइलों का गणराज्य एक आत्मा की सरकारी यात्रा?
व्यंग्य -राजेन्द्र सिंह जादौन
बरसों से कलेक्टर कार्यालय से लेकर उच्च अधिकारियों तक, प्रदेश से लेकर केंद्र तक शिकायतें लंबित पड़ी रहती हैं। आवेदन दिए जाते हैं, रसीदें संभाली जाती हैं, पोर्टल पर “सुबमिटटेड सुक्सीसफुल्ली” चमकता है, और फिर शुरू होता है प्रतीक्षा का अनंत काल। नागरिक उम्मीद करता है कि उसकी आवाज़ शासन तक पहुँचेगी, शासन सुनकर निर्णय लेगा, और निर्णय से न्याय निकलेगा। लेकिन अक्सर यह पूरी प्रक्रिया एक डिजिटल भूलभुलैया में फँस जाती है।
एक रात, जब मैं गहरी नींद में था, मेरी आत्मा शरीर से निकलकर सीधे कलेक्टर कार्यालय पहुँच गई। वहाँ का दृश्य किसी फाइल-समाधि स्थल से कम नहीं था। “मुख्यमंत्री भू-अधिकार” योजना के सैकड़ों आवेदन लंबित पड़े थे। कंप्यूटर की स्क्रीन पर हजारों ईमेल अनखुले पड़े थे जैसे हर ईमेल में एक किसान की उम्मीद, एक परिवार की चिंता, और एक बुजुर्ग की आखिरी आस कैद हो।
आत्मा ने एक कंप्यूटर स्क्रीन पर झाँका। इनबॉक्स में संख्या बढ़ती जा रही थी, लेकिन ‘रिप्लाई’ का बटन मानो जाम हो चुका था। फाइलें आगे बढ़ने की जगह ‘Forward’ होकर किसी और डेस्क पर जा अटकतीं, और फिर वहीं ठहर जातीं। डिजिटल इंडिया के इस युग में भी फाइलों की चाल बैलगाड़ी जैसी थी धीमी, थकी हुई और अनिश्चित।
