क्‍या कमलनाथ के यातायात सुधार विजन पर लग रहा ग्रहण?

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क्‍या कमलनाथ के यातायात सुधार विजन पर लग रहा ग्रहण?

मेट्रो का स्वप्न, आधुनिक मध्यप्रदेश की आधारशिला

देश में विकास पुरुष के रूप में बनी कमलनाथ की पहचान

क्‍या मोहन सरकार मेट्रो परियोजना में विफल रही?

आखिर क्‍यों घाटे का सौदा साबित हो रहा मेट्रो का संचालन?

विजया पाठक, एडिटर, जगत विजन
मध्‍यप्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री कमलनाथ को विशेष रूप से उस दूरदर्शी नेता के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने प्रदेश को आधुनिक शहरी परिवहन की दिशा में आगे बढ़ाने का साहसिक निर्णय लिया। उन्होंने इंदौर और भोपाल जैसे प्रमुख शहरों के लिए मेट्रो परियोजनाओं की आधारशिला रखी। इंदौर और भोपाल में मेट्रो परियोजना की शुरुआत केवल एक निर्माण कार्य नहीं थी, बल्कि यह प्रदेश को महानगरों की श्रेणी में स्थापित करने का प्रयास था। यह सोच थी कि बढ़ती आबादी, ट्रैफिक जाम और प्रदूषण की समस्या का स्थायी समाधान आधुनिक सार्वजनिक परिवहन प्रणाली से ही संभव है। कमलनाथ ने मेट्रो को केवल यातायात का साधन नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों को गति देने वाला इंजन माना। मेट्रो परियोजना के साथ रियल एस्टेट, व्यापार, सेवा क्षेत्र और रोजगार के नए अवसर स्वतः जुड़ते हैं। उन्होंने एक दीर्घकालिक योजना के तहत इन शहरों को स्मार्ट और व्यवस्थित शहरी ढांचे की दिशा में अग्रसर करने का प्रयास किया। लेकिन मौजूदा समय में मेट्रो परिवहन की दशा और दिशा देखने से लगता है कि इस महत्‍वपूर्ण योजना पर ग्रहण लग गया है। लागत में बढ़ौत्री के साथ कार्य की धीमी गति ने इसे अनुपयोगी बना दिया है।

मेट्रो के संचालन में हो रहा घाटा
इंदौर और भोपाल मेट्रो जैसी योजनाएँ समय-समय पर लागत में बढ़ोतरी, तकनीकी चुनौतियाँ और वित्तीय बाधाओं का सामना करती रहीं। उदाहरण के लिए इंदौर मेट्रो का कुल खर्च पहले 7,500 करोड़ के करीब था, बाद में यह बढ़कर करीब 12,000 करोड़ बताया गया। कमलनाथ ने इंदौर और भोपाल मेट्रो परियोजनाओं के लिए नींव रखी थी। इंदौर मेट्रो का फोकस खासकर यातायात सुधार और शहर के विस्तार को जोड़ने पर था। भोपाल मेट्रो का संचालन शुरू हुए दो महीना पूरा हो चुका है, लेकिन शुरुआती उत्साह के बाद इसकी आर्थिक सेहत चिंता का विषय बनती जा रही है। सुभाष नगर से एम्स तक करीब सात किलोमीटर लंबे प्रायोरिटी कॉरिडोर पर रोजाना मेट्रो चलाने में लगभग 08 लाख रुपये का खर्च आ रहा है, जबकि इसके मुकाबले आय महज 15 हजार रुपये के आसपास सिमटी हुई है। पहले जहां मेट्रो रोजाना 17 फेरे लगा रही थी, वहीं अब यह संख्या घटकर 13 रह गई है। इसके बावजूद आमदनी में कोई खास सुधार नहीं हो पाया है, जिससे प्रबंधन की चिंता और बढ़ गई है।

फेरे बढ़ाने पर मंथन, मगर सवाल बरकरार
भोपाल मेट्रो का मासिक संचालन खर्च करीब 2.5 करोड़ रुपये बताया जा रहा है। यानी हर दिन लाखों रुपये खर्च कर मेट्रो चलाई जा रही है, लेकिन यात्रियों की कमी के कारण आय उम्मीद के अनुरूप नहीं हो पा रही। घाटे से उबरने के लिए प्रबंधन फेरों को दो से तीन गुना बढ़ाने पर विचार कर रहा है, लेकिन सवाल यह है कि जब यात्री ही नहीं बढ़ रहे, तो क्या फेरे बढ़ाने से वाकई फायदा होगा? घाटे की भरपाई के लिए मेट्रो प्रबंधन वैकल्पिक आय स्रोतों पर भी नजरें गड़ा रहा है। इसके तहत प्रायोरिटी कॉरिडोर के आठ मेट्रो स्टेशनों पर विज्ञापन के लिए जगह लीज पर देने के टेंडर निकाले गए हैं। फिलहाल टेंडर खोले जाना बाकी हैं, लेकिन इनके जरिए मेट्रो की आय बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है। शुरुआत में जहां रोजाना करीब 07 हजार यात्री सफर कर रहे थे, वहीं अब यह संख्या घटकर महज 300 से 350 प्रतिदिन रह गई है। भोपाल मेट्रो के सामने सबसे बड़ी चुनौती यात्रियों का भरोसा और संख्या बढ़ाने की है, वरना यह आधुनिक परिवहन व्यवस्था घाटे की पटरी से उतरती नजर आ सकती है।

अधूरे विज़न और वर्तमान चुनौतियाँ
कमलनाथ का यह स्पष्ट स्वप्न था कि मेट्रो परियोजनाएँ सुविचारित योजना, वित्तीय अनुशासन और चरणबद्ध क्रियान्वयन के साथ संचालित हों। लेकिन उनके कार्यकाल के बाद परिस्थितियाँ बदलीं और वर्तमान सरकार के संचालन में कई प्रश्न खड़े हुए। मोहन यादव के नेतृत्व वाली सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन परियोजनाओं को प्रभावी ढंग से संचालित करने की रही है। भोपाल मेट्रो के निर्माण में 2500 करोड़ रुपये से अधिक की लागत लगने के बावजूद, पिछले तीन महीनों में 1 करोड़ रुपये का राजस्व भी प्राप्त न कर पाना चिंताजनक स्थिति को दर्शाता है। जिस परियोजना को कमलनाथ ने प्रदेश के विकास के प्रतीक के रूप में देखा था, वह यदि अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही है, तो यह निश्चि…

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